Chapter 17 Shloka 22

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।

असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।

A gift made to the unworthy,

at an improper time or place,

without due respect, and

with a disdainful attitude,

that daan is classified as tamsic.

Chapter 17 Shloka 22

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।

असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।

Now the Lord speaks of tamsic daan.

A gift made to the unworthy, at an improper time or place, without due respect, and with a disdainful attitude, that daan is classified as tamsic.

Tamsic Daan

Tamsic daan is one that is made:

a) without considering the other’s position;

b) without considering the appropriate place;

c) without any regard for the present situation;

d) without reverence;

e) regarding the other as inferior;

f) without due respect;

g) to degrade the other;

h) to ridicule the other;

i)  in an insulting manner;

j)  with a merciless heart;

k) accompanied by taunts and sarcasm.

That charity which is given blindly is tamsic in nature.

In such charity:

a) the recipient is made to look small;

b) the recipient is made out to be degraded;

c) the donor has repulsion for the recipient;

d) the donor is filled with pride, thinking himself to be a great philanthropist.

Those who abide in tamas are fraught with moha and ignorance. They are ridden with demonic tendencies and misuse their wealth.

Kamla, listen! Those who are full of moha and attachment, give charity only where they are attached or to the object of their moha. Only infrequently will they give charity to sages and saints. They generally deride and denounce saintly souls and institutions involved in the service of people. However, if they are assured of increment in business through such charity, they consider it favourably. Then they are also capable of giving charity anonymously.

Little one, listen carefully!

1. The tamsic are full of attachments and ignorance, and live in illusion.

2. The tamsic are stubborn, causing injury to others even at the cost of suffering great pain themselves.

3. The tamsic are faithless, hardhearted, merciless people who engage in evil deeds.

4. Those who are tamsic are corrupt people, engaging in actions opposed to dharma.

Kamla, consider, why would such people give any charity to others?

1. They do not submit to another’s pressure.

2. They are not likely to change their stance because of another’s desire.

3. They themselves possess all the nefarious traits of thieves, dacoits, liars and swindlers.

4. They are used to destroying happy homes.

5. They will rob others of their honour and reputation.

Who could possibly extract any love, wealth or respect from such people who are fettered by the darkness of moha and ignorance? The only people who can approach them are those who are objects of their moha and attachment.

Such people are attached to their children, who invariably become veritable tyrants. They and their children engage in nefarious and evil deeds.

1. All parents expect goodness and honour in their children.

2. They wish to see their children devoted to duty.

3. No matter what they themselves are, they wish their children to be like Shravan Kumar who was known for his filial devotion to his parents.

4. Attachment to one’s offspring is a natural trait.

It is thus only their children who can extract their wealth from them, even if it be for the purpose of misusing it. Such people often despise their children, and behave insultingly towards them – yet the latter become the sole inheritors of their parent’s wealth.

Kamla, every individual possesses a mixture of sattvic, rajsic and tamsic tendencies. What has to be seen is, which is the attribute that predominates.


You ask about the gunatit. If an individual becomes a gunatit, his intellect will no longer be influenced by any attributes.

How much one can change one’s inherent attributes depends on one’s basic values. It is these values that determine a man’s internal disposition. The gunatit and the sthit pragya invariably use their attributes for the well-being of the other. Such elevated souls use their qualities in accordance with the need of the situation and the person who stands before them.

1. However, their intellect is ever uninfluenced.

2. They are devoid of desire, craving and greed.

3. They are devoid of ignorance, corruption and attachment.

4. They are not attached even to light and knowledge.

5. They give generously and freely to all – as does the Lord Himself.

अध्याय १७

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।

असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्।।२२।।

अब तामसिक दान की कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. जो दान बिना देश काल के,

२. बिना सत्कार किए,

३. तिरस्कार पूर्वक

४. और कुपात्रों को दिया जाता है,

५. वह तामसिक कहा गया है।

तत्त्व विस्तार :

तामसिक दान :

तामसिक दान वह है जो,

क) दूसरे की स्थिति देखे बिना,

ख) दूसरे की जगह देखे बिना,

ग) आधुनिक परिस्थिति देखे बिना,

ङ) दूसरे को तुच्छ मान कर,

च) आदर रहित दिया जाये,

छ) जिस दान से दूसरे की गिरावट हो,

ज) यानि, उपहास करके जो दान दिया जाये,

झ) अपमान करके जो दान दिया जाये,

ञ) कटुता पूर्ण भाव से जो दान दिया जाये,

ट) कटाक्ष सहित जो दान दिया जाये, वह तामसिक दान है।

जो आप अन्धों की तरह देते हैं, उस दान को आप तामसिक जानिये।

उस दान में,

– पात्र को नीचा दिखाया जाता है।

– पात्र को निकृष्ट बताया जाता है।

– पात्र के प्रति घृणा होती है देने वाले की।

– देने वाला दातृत्व भाव गुमानी होता है।

तमोगुणी लोग मोह पूर्ण तथा अज्ञानी होते हैं। ये लोग आसुरी सम्पदा सम्पन्न होते हैं और धन का दुरुपयोग करते हैं।

कमला देख! जहाँ मोह होगा, मोह पूर्ण लोग वहाँ दान देंगे। साधु सन्तों को तो ये कम ही दान देंगे। वास्तविक साधु सन्तों, लोक सेवक संस्थाओं का ये निरादर और तिरस्कार ही करते हैं, किन्तु यदि वहाँ से व्यापार में नाम और लाभ मिल जाये तो ये गुप्त दान भी दे देते हैं।

नन्हूं! ज़रा ध्यान से सुन।

1. मोह पूर्ण, अज्ञानमय तथा मिथ्यात्व रमणी तमोगुणी लोग होते हैं।

2. महा हठीले, बहु पीड़ा सह कर दूसरों का अनिष्ट करने वाले तमोगुणी होते हैं।

3. श्रद्धारहित, कठोर, कुकर्मी व निष्ठुर तमोगुणी होते हैं।

4. धर्म विरुद्ध आचरण पूर्ण, भ्रष्टाचारी तमोगुणी होते हैं।

कमला! ज़रा सोच लो ये लोग किसको क्यों पैसे देंगे?

5. किसी के दबाव में तो ये आने वाले नहीं हैं।

6. किसी की सामना से ये रुख बदलने वाले नहीं हैं।

7. चोर, डाकू, झूठे, बेईमान तो ये स्वयं हैं।

8. हरे भरे घर उजाड़ने वाले ये स्वयं हैं।

9. लोगों की आबरू लूटने वाले तो ये स्वयं हैं।

इन मोह तथा अज्ञान रूप अंधकार से बन्धे लोगों से मान, प्रेम या धन, कौन निकलवा सकता है? यह तो वहीं हो सकता है, जहाँ इनका मोह हो, जहाँ ये संग कर बैठें।

भाई! इन्हें मोह अपने बच्चों से होता है। इन लोगों के बच्चे अधिकांश दुराचारी होते हैं। ये लोग और इनके बच्चे व्यभिचारी होते हैं।

क) अपने बच्चों से सभी श्रेष्ठता की उम्मीद रखते हैं।

ख) अपने बच्चों को सभी कर्तव्य परायण बनाना चाहते हैं।

ग) स्वयं वे जैसे भी हों, बच्चे श्रवणकुमार जैसे ही चाहियें।

घ) बच्चों से मोह सहज ही हो जाता है।

ये बच्चे ही इन लोगों का धन निकलवा सकते हैं और फिर उस धन का दुरुपयोग करते हैं। ये लोग बच्चों का तिरस्कार भी करते हैं, ये लोग बच्चों का निरादर भी करते हैं, पर धन भी उन्हीं को देते हैं।

कमला! हर जीव में सात्त्विक, राजसिक और तामसिक अंश होते हैं। देखना तो यह है कि प्रधानतय: वह क्या है?

गुणातीत :

गुणातीत की क्या पूछते हो! यदि गुणातीत हो जाये, तो उसकी बुद्धि गुणों से प्रभावित नहीं होगी।

गुण कितने बदलेंगे, यह तो भाव पर आधारित है। भाव से ही स्वभाव बनता है। एक बात तो निश्चित है कि गुणातीत और स्थित प्रज्ञ अपने सम्पूर्ण गुण दूसरों के लिए इस्तेमाल करेंगे। कौन, कब, कैसा आ जाये, कौन, कब, कैसी परिस्थिति आ जाये, जैसी ज़रूरत हो, वे उसी गुण को इस्तेमाल करते हैं। किन्तु,

1. उनकी बुद्धि नित्य निर्लिप्त रहती है।

2. वे कामना, तृष्णा, लोभ रहित होते हैं।

3. वे अज्ञान, अप्रकाश, मोह रहित होते हैं।

4. वे प्रकाश और ज्ञान से भी संग नहीं करते।

5. वे तो भगवान की तरह सबको देते हैं।

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