Chapter 17 Shlokas 5, 6

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।

दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।५।।

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।

मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्।।६।।

Those who are full of arrogance, ego, desire,

attachment and vigour, and who perform tapas

which is contrary to scriptural injunction, crush Me

and other divine deities abiding in the body. Know these

ignorant beings to be possessed of demonic resolve.

Chapter 17 Shlokas 5, 6

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।

दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।५।।

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।

मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्।।६।।

The Lord says, “Arjuna, listen! I shall now tell you of tapas – forbearance.”

Those who are full of arrogance, ego, desire, attachment and vigour, and who perform tapas which is contrary to scriptural injunction, crush Me and other divine deities abiding in the body. Know these ignorant beings to be possessed of demonic resolve.

The Lord has elucidated here on the tapas which is contrary to scriptural injunction. But first of all, understand the basic meaning of tapas.


a) The energy produced in the truthful individual as a result of his attachment with the Truth, which enables him to endure with forbearance.

b) To be able to smilingly endure the adversity that life brings is the consequence of tapas.

c) Tapas is in reality the augmentation of the individual’s capacity to endure.

d) There is no tapas which is greater than adherence to the Truth.

e) Silence is the innate state of the tapasvi or one who endures.

1. Tapas is not inherently painful.

2. Tapas cannot have a vestige of deceit.

3. Tapas does not connote futile bodily torture.

4. Tapas can only be practised in normal day to day life.

5. Tapas occurs naturally in the course of performing one’s duty.

6. To tread the path of Truth is a great tapas.

7. To live a life of yagya is a continual, unbroken channel of tapas.

8. The flow of divine qualities is a characteristic of the tapasvi.

9. The practice of divine qualities is also a divine tapas.

The Lord says, “Those filled with hypocrisy, ego, desire, attachment and pride of strength also practice great austerities.”

1. They subject the bodily faculties to futile torture.

2. They continually starve first one limb of the body, then another.

3. They stand steeped in cold water in the thick of winter and in the blistering sun in the midst of summer.

4. They try to walk on thorns and make great efforts to gain bodily prowess.

The Lord says that thus they:

a) torture the body and the five ‘hamlets’ of the sense faculties;

b) debilitate even Me who dwells within them as the epitome of Truth;

c) act in a manner which is contrary to the truthful code of conduct;

d) act in direct contradiction of scriptural decree.

These are the works of demonic souls.

1. Their stubborn decisions are demonic in nature.

2. Their stubborn decisions are full of arrogance, ego, desire and attachment.

3. This is due to the predominance of their tamsic attribute.

4. These people are not equipped with the intellect of Truth – and hence they do whatever comes to their mind.

5. They do not understand the connotation of scriptural tenets and attribute meanings to those tenets in consonance with their own nature and comfort.

This too is true Kamla! If our intellect abided in Truth, we would have been the Lord Himself! Here ‘Truth’ is taken to mean that which is in conformity with the Scriptures. The intellect attains its elevated status only when the mind begins to accept the dictates of the intellect in toto. So measure your intellect. If it has not attained the state of the sthit pragya, then:

a) take recourse to the Scriptures;

b) make the Lord’s Word the mainstay of your life;

c) try to understand the Lord’s Word through the example of His life.

If you cannot do this either, you are a veritable hypocrite. If you believe the decisions of your own intellect to be the most superior, who can be more foolish than you? The tapas of such ignoramuses is contrary to the supreme good. Their knowledge is not aimed at the welfare of all beings – it is used only for selfish desire attainment.

Remember, when the individual begins his sadhana or spiritual practice, he automatically becomes beneficial for his associates:

1. when you begin to practice the divine qualities;

2. when you begin to practice transcending all attributes to become a gunatit;

3. when you begin your sadhana or spiritual practice;

– your associates will inevitably benefit. As they begin to receive benefits from you, they will seek even more advantages. They will also feel free to be suspicious about your hidden intentions! They will consider you to be greedy and avaricious. Compassion towards such people and their negative tendencies is indeed tapas.

Endurance, patience, steadiness, fortitude, self-control, self-abnegation – these are the natural qualities of the tapasvi. If these are present in the sadhak’s daily life, then his life becomes a fire of devotional sacrifice – a veritable tapas. But if he abandons his normal life and feigns these qualities, they exude nothing but hypocrisy and ego.

Karshyant (कर्षयन्त) – Emaciate

The Lord proclaims that those who undertake harsh and difficult penances harm only Me, they torment only me. They are of demonic resolve and are only killing themselves. They debilitate Me who abides in them.

अध्याय १७

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।

दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः।।५।।

कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।

मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्।।६।।

भगवान कहते हैं, सुन अर्जुन! अब तुझे तप के विषय में कहता हूँ।

शब्दार्थ :

१. जो लोग,

२. दम्भ, अहंकार, काम, राग और बल से युक्त होकर,

३. शरीर में स्थित भूतों के समूह को

४. और ऐसे ही शरीर में स्थित मुझको,

५. दुर्बल करते हुए,

६. शास्त्र विरुद्ध घोर तप करते हैं,

७. उन अज्ञानियों को तू आसुरी निश्चय वाला जान।

तत्त्व विस्तार :

भगवान यहाँ शास्त्र विरुद्ध तप समझाते हैं। पर प्रथम तू तप समझ ले!

तप :

क) असत् पूर्ण जीव में, सत् से संग के परिणाम स्वरूप जो सहने की शक्ति उत्पन्न होती है, उसे तप कहते हैं।

ख) जीवन में विपरीतता पर मुसकराना तप का परिणाम है।

ग) तप वास्तव में सहन शक्ति और उसके वर्धन को कहते हैं।

घ) सत् के बराबर और कोई तप नहीं है।

ङ) मौन ही तपस्वी का स्वरूप है।

यदि यह सच है तो :

1. तप में स्वयं आरोपित कष्ट नहीं होते।

2. तप में धोखा हो ही नहीं सकता।

3. तप में नाहक शारीरिक कष्ट हो ही नहीं सकता।

4. तप तो सहज जीवन मे ही हो सकता है।

5. तप कर्तव्य करते करते हो ही जाता है।

6. भाई! सत् पथ का अनुसरण एक महा तप है।

7. यज्ञमय जीवन एक अखण्ड तप है।

8. दैवी सम्पदा का बहाव तपस्वी का ही गुण है।

9. दैवी सम्पदा का अभ्यास एक महा तप है।

भगवान कहते हैं, ‘दम्भ, अहंकार, काम, राग तथा बल गुमानी, मूर्ख लोग घोर तप करते हैं।’ यानि,

क) नाहक शरीर की इन्द्रियों को दुःख देते हैं।

ख) कभी किसी इन्द्रिय को सुखाने के यत्न करते हैं और कभी किसी और को।

ग) सर्दी में ठण्डे पानी में खडे होते हैं, तो गर्मी में धूप में।

घ) कांटों पर चलना चाहते हैं और अनेकों प्रकार के शारीरिक बल की प्राप्ति के यत्न करते हैं।

भगवान कहते हैं कि इस विधि वे :

1. शरीर को भी तंग करते हैं और पंच ग्राम रूप इन्द्रियों को भी तंग करते हैं।

2. इनके आन्तर में सत् रूप में जो मैं बैठा हूँ, मुझे भी वे निर्बल करते हैं।

3. सत् पथ के विरुद्ध कार्य करते हैं।

4. शास्त्र विधि के विमुख कार्य करते हैं।

ये सब वास्तव में आसुरी गुण पूर्ण लोग करते हैं।

क) उनके हठ पूर्ण निश्चय आसुरी हैं।

ख) उनके हठ पूर्ण निश्चय दम्भ, अहंकार, कामना और राग युक्त होते हैं।

ग) यह उनका तमो प्रधान गुण है।

घ) ये लोग सत् पूर्ण बुद्धि से युक्त नहीं होते, जो मन में आये, वही करने लग जाते हैं।

ङ) शास्त्र की व्याख्या ये लोग नहीं समझते, बल्कि अपने स्वभावानुकूल शास्त्र की व्याख्या कर लेते हैं।

यह बात भी सच ही है कमला! अपनी बुद्धि गर सत्मय होती तो हम स्वयं भगवान जैसे होते! यहाँ ‘सत्मय’ से अर्थ शास्त्र रूपा समझ लो। इसे बुद्धि तब मानो जब आपका मन आपकी बुद्धि की बात अक्षरशः मान ले। अपनी बुद्धि को तोल तो लो! गर स्थित प्रज्ञ नहीं हुए तो :

– शास्त्र का आसरा लो।

– भगवान के कथन का आसरा लो।

– भगवान के जीवन को प्रमाण मान कर समझने के प्रयत्न करो।

गर आप यह नहीं करते तो आप मिथ्याचारी हैं। गर आप अपनी बुद्धि के निर्णय को ही सर्व श्रेष्ठ मानते हो तो आप जैसा मूर्ख कौन है?

नन्हूं! ऐसे मूर्ख लोगों का तप परम श्रेय के विरुद्ध होता है। ऐसे मूर्ख लोगों का ज्ञान सर्वभूत हित करने के कारण नहीं बल्कि स्वार्थ पूर्ति हेतु होता है।

एक बात का ध्यान रहे नन्हूं! जीव ज्यों साधना आरम्भ करता है, उसके सहवासियों को फ़ायदा होने लगता है।

नन्हूं! जब आप :

1. दैवी गुणों का अभ्यास करेंगे,

2. गुणातीत बनने का अभ्यास करेंगे,

3. स्थित प्रज्ञ बनने का अभ्यास करेंगे,

यानि, जब आप साधना आरम्भ करेंगे, आपके सहवासियों को लाभ होगा ही ! उन्हें जितना लाभ होगा, वे आपसे उतना ही अधिक लाभ चाहेंगे। उन्हें आप पर शक भी पड़ेगा कि आपकी कोई निहित कामना होगी। वे आपको लोभी भी मानेंगे। जब लोग आप पर संशय करें तो उन संशयों के और संशय करने वालों के प्रति करुणा दृष्टि, तप है।

सहिष्णुता, धैर्य, धृति, तितिक्षा, आत्म संयम, आत्म त्याग, ये सब तपस्वी के सहज गुण हैं। यदि ये सहज जीवन में हों तो जीवन यज्ञ रूपा अग्न का तप है और यदि ये सहज जीवन को त्याग कर, अपने पर आरोपित किये गए हों, तो यह दम्भ और अहंकार है।

कर्षयन्त :

भगवान कहते हैं, जो ऐसे घोर तप करते हैं, वे मुझे ही क्षति पहुंचाते हैं। वे मुझे ही पीड़ित करते हैं। वे आत्म हत्या करते हैं और आसुरी निश्चय वाले होते हैं। वे मुझे दुर्बल करते हैं।

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