Chapter 17 Shloka 11

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।

यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स सात्त्विकः।।११।।

That being, who performs yagya in accordance with

scriptural decree and without any desire for its fruit

and with the conviction that this is

the form of worship that must be practised,

that one performs the sattvic yagya.

Chapter 17 Shloka 11

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।

यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स सात्त्विकः।।११।।

Bhagwan says:

That being, who performs yagya in accordance with scriptural decree and without any desire for its fruit and with the conviction that this is the form of worship that must be practised, that one performs the sattvic yagya.

Sattvic yagya is in conformity with scriptural methodology.

1. It is performed keeping in view the mode of conduct as prescribed in the Scriptures.

2. It is performed keeping in mind the code of duty as described in the Scriptures.

3. It is performed after having witnessed the flow of the qualities of the Supreme in life.

Such yagya is performed after having known and understood the method prescribed by the Scriptures that enable the aspirant:

a) to become an embodiment of the Scriptures;

b) to translate each shloka of the Scriptures into his life, making it a mantra that helps him apply the knowledge of the Truth in life;

c) to become the embodiment of each tenet of the Scriptures.

He who understands the Scriptures in this manner, deems it his duty to translate those tenets into his life.

One who abides in sattva, performs his duty as is prescribed in the Scriptures.

Those who are predominantly sattvic apply the scriptural tenets in their lives as their duty. Even though they may be devoid of any personal desire, they still perform their duty diligently and transform their lives into a garland of yagya without any selfish axe to grind. They are devotees of the qualities of the Supreme and therefore obey the Scriptures word for word. They do not seek self-establishment – they merely seek to establish others.

They constantly endeavour to give of their body, mind and intellect to the Lord. They seek nothing, even from Him. “To live a life of yagya is my duty and I must do it” – such is their conviction and thus they fulfil their dutiful obligations. Little one, in the Gita, the Lord Himself has clarified what constitutes duty.

The duty of a human being

1. To renounce attachment, desire and craving.

2. To relinquish selfish action and engage in selfless deeds.

3. To endeavour to practice the Lord’s dharma in his own life.

4. To engage in actions knowing that only dutiful actions must be performed.

5. To be a sthit pragya.

6. To become replete with the treasure of divine qualities.

7. To remain unaffected by all qualities.

8. To cease blaming anyone, knowing that all are bound by the qualities and the interaction of those qualities.

9. To endeavour to become an Atmavaan.

Just as the Lord is unmanifest even whilst He is manifest, the Lord’s devotee is similarly unmanifest. He remains inconspicuous despite manifesting divine attributes.

To accept all this in life on the practical plane is the greatest yagya any living being can perform. Any life based on these principles and this knowledge is verily the greatest yagya and also man’s highest duty. The sattvic being lives these truths in his life knowing it to be his duty to do so.

1. The actions of such a one are selfless.

2. The worship of such a one is devoid of any thought for self.

3. His knowledge too, is devoid of any selfish motive.

Yagya in accordance with the Scriptures

Such people conduct their lives in accordance with the injunctions inscribed in the Gita.

1. Thus do they live their lives.

2. Thus they fulfil their duty even whilst performing selfless deeds.

3. Thus they endeavour to attain yoga or unison with the Supreme.

4. Thus they endeavour to acquire the appropriate qualities.

5. Thus they strive to be established in equanimity.

Kamla! This is the duty of man. This is the method whereby man can merge in the Supreme. These are the paths, travelling which, man can attain the Lord. Therefore man must conduct his life in a similar manner, confident that “This is my duty, therefore I must do it – no matter what the outcome.”

Who acts in accordance with the tenets of the Scriptures?

It is only the one who has unflinching faith in the Lord who can say, “I must act in this manner because it is my duty.”

a) One who eternally keeps the Lord before himself as his witness,

b) One who obeys the injunctions of the Scriptures,

c) One who truly gives his body-self to the Lord,

d) One who truly gives his mind and intellect to the Lord,

– only such a one can say this.

Those who perform sattvic yagya:

a) are oblivious to their desire and perform their duties diligently;

b) forget themselves and perform their duty;

c) are impervious to the possible effects of the performance of duties on them;

d) perform their duties since they live only for the well-being and welfare of all.

­­–  Their duty lies towards the Lord’s divine qualities.

­­–  Their duty lies towards the Self, and towards their own spiritual progress.

The oblations of divine qualities are offered into the yagya of life. This is what the sattvic being practises in his own life. Such a one renounces all desire for the fruits of his deeds and offers oblations for the welfare of all.

The attribute of sattva causes attachment with knowledge and light

However, it is important to remember that the attribute of sattva causes one to be attached to knowledge and light. Those who are ridden with pride of their virtue, their divine qualities and their knowledge, are indeed far from being perfect souls. They are aspirants on this path.

अध्याय १७

अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।

यष्टव्यमेवेति मन: समाधाय स सात्त्विकः।।११।।

भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. जो यह (शास्त्र) विधि देख कर,

२. फल की चाहना रहित पुरुष,

३. ‘ऐसा पूजन करना ही चाहिये’,

४. इस धारणा को मन में लिये यज्ञ करता है,

५. वह यज्ञ सात्त्विक होता है।

तत्त्व विस्तार :

सात्त्विक यज्ञ :

सात्त्विक यज्ञ शास्त्रोक्त विधि देख कर किया जाता है। यानि, शास्त्र निर्माणित:

क) जीवन रूप यज्ञ विधि देख कर किया जाता है।

ख) जीवन रूप कर्तव्य विधि देख कर किया जाता है।

ग) परम गुण बहाव रूपा विधि देख कर किया जाता है। यानि,

– जो साधक को शास्त्र की प्रतिमा बना दे,

– जो शास्त्र के हर श्लोक को मन्त्र बना दे,

– जो शास्त्र के हर श्लोक को (सामने) मूर्तिमान कर दे,

ऐसी शास्त्र की विधि जान कर किया जाता है, उसे समझ कर किया जाता है। जो इसे जान लेता है, वह इसे अपना कर्तव्य मानता है।

सतोगुणी शास्त्र कथित कर्तव्य करता है।

सत्त्व गुण सम्पन्न जीव शास्त्र कथित महा वाक्यों को अपना कर्तव्य मानकर निभाते हैं। चाहे उनकी अपनी कामना कुछ भी नहीं होती, तब भी वे कर्तव्य निभाते हैं। उनका अपना प्रयोजन कुछ भी नहीं होता, तब भी वे जीवन कर्तव्य किये जाते हैं। वे केवल परम गुणों के भक्त होने के कारण शास्त्र विधि का अक्षरशः अनुसरण करते हैं। उन्हें स्वयं स्थापित नहीं होना होता, वे औरों को स्थापित करते रहते हैं।

वे तो अपने तन, मन, बुद्धि को भी भगवान को देने में लगे हुए होते हैं। उन्हें तो भगवान से भी कुछ नहीं चाहिये। ‘यज्ञमय जीवन ही कर्तव्य है और यह करना ही चाहिये’, उनकी ऐसी मान्यता होती है। ‘करना ही चाहिये,’ ऐसी धारणा मन में धरे वे यज्ञ करते हैं।

देख मेरी जान्! भगवान ने गीता में स्वयं कहा कि जीव का कर्तव्य क्या है!

जीव का कर्तव्य :

जीव का कर्तव्य है कि वह :

1. संग, कामना और तृष्णा छोड़ दे।

2. सकाम कर्म छोड़ कर निष्काम कर्म करे।

3. भगवान जैसे धर्म वाला बनने का प्रयत्न करे।

4. कर्तव्य ही करने योग्य है, यह जान कर कर्म करे।

5. स्थित प्रज्ञ बने।

6. दैवी सम्पदा पूर्ण होने के प्रयत्न करे।

7. गुणों से प्रभावित न हो।

8. गुण ही गुणों में वर्तते हैं, ऐसा जान कर किसी को दोष न लगाये।

9. आत्मवान् बनने के प्रयत्न करे।

जैसे भगवान साकार होते हुए भी निराकार हैं, भक्त भी साकार होते हुए निराकार हैं, इत्यादि।

भाई! यह सब जीवन में व्यावहारिक स्तर पर मान लेना ही जीवन का महा श्रेष्ठ यज्ञ है। इसी ज्ञान के आसरे, उस पर आधारित जीवन ही यज्ञमय जीवन है और यही जीव का कर्तव्य है। सात्त्विक गुण पूर्ण लोग इसे ही कर्तव्य मानकर करते हैं।

– उनके कर्म निष्काम होते हैं,

– उनकी उपासना निष्काम होती है, (विस्तार के लिए श्लोक ९/१४ देखिए)

– उनका ज्ञान निष्काम होता है।

सात्त्विक लोग शास्त्र विधि देख कर यज्ञ करते हैं।

शास्त्रानुसार यज्ञ :

ऐसे लोग गीता कथित आदेशानुसार ही :

क) जीवन में विचरते हैं।

ख) निष्काम कर्म करते हुए, अपने कर्तव्य का पालन करते हैं।

ग) योग करने के यत्न करते हैं।

घ) गुण उपार्जित करने के यत्न करते हैं।

ङ) स्थित प्रज्ञता जीवन में लाते हैं; इत्यादि।

कमला! यही कर्तव्य है जीव का! यही जीव को परम में लीन करा सकता है। इसी का अनुसरण करके जीव भगवान को पाता है। उसका भाव यही होता है कि ‘यह कर्तव्य है, इसलिए करना ही है, परिणाम चाहे कुछ भी हो।’

शास्त्र विहित कर्तव्य कौन करता है?

परम में गहन निष्ठावान् ही ऐसा कह सकता है ‘कि कर्तव्य ही है, सो करना ही है।’

1. परम को नित्य साक्षी बना कर चलने वाला,

2. शास्त्र को परम आदेश मानने वाला,

3. जीवन में सच ही अपना तन भगवान को देने वाला,

4. जीवन में सच ही अपना मन, अपनी बुद्धि भगवान को देने वाला ही,

यह कह सकता है।

सात्त्विक यज्ञ करने वाले,

क) अपनी कामना को भूल कर अपना कर्तव्य निभाते हैं।

ख) अपने आपको भूल कर अपना कर्तव्य निभाते हैं।

ग) कर्तव्य करते हुए अपने पर इसका क्या प्रभाव होगा, इसका ध्यान नहीं धरते।

घ) सर्वभूतहितकर होने के नाते वे कर्तव्य ही करते हैं।

– कर्तव्य भगवान के गुण के प्रति होता है।

– कर्तव्य अपने स्वरूप, अपनी श्रेष्ठता के प्रति होता है।

जीवन यज्ञ में भागवत् गुणों की आहुतियाँ डाली जाती हैं और सत्त्व गुण पूर्ण लोग इसका अभ्यास करते हैं। वे फल की चाहना छोड़ कर सबके कल्याण अर्थ आहुतियाँ देते रहते हैं इस यज्ञ में।

सतो गुण ज्ञान और प्रकाश से संग करवाता है।

किन्तु याद रहे नन्हूं! सतोगुण ज्ञान और प्रकाश से संग को उत्पन्न करता है। जिन लोगों को अपने सतीत्व का, दैवी गुणों का और ज्ञान का गुमान होता है, वे सिद्ध लोग नहीं हैं, वे अभी साधक हैं।

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