Chapter 17 Shloka 19

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तप:।

परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।१९।।

That tapas which involves inflicting

severe distress upon oneself

impelled by a deluded understanding,

and that which is performed to

do harm to another, is tamsic tapas.

Chapter 17 Shloka 19

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तप:।

परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।१९।।

Now Bhagwan speaks of tamsic tapas.

That tapas which involves inflicting severe distress upon oneself impelled by a deluded understanding, and that which is performed to do harm to another, is tamsic tapas.

Moodh Aagrah (मूढ़ आग्रह)

1. Impelled by foolish and false principles.

2. Rooted in the unreal.

3. After taking erroneous yet stubborn decisions.

4. Having confidence in dubious resolutions.

5. Bound by debased tendencies.

6. Faith in concepts that negate duty.

Those people whose intellects have been led astray by their wayward and stubborn convictions can be said to possess moodh aagrah. The inflexible decisions of the lost pilgrim on the spiritual path are often inspired by such moodh aagrah.

He who abides in the ego and thinks only of injuring, uprooting or destroying others, in short, inflicting all manner of sorrows upon another, such a one is only capable of causing agony to others and suffering agony himself. Such a one suffers from moodh aagrah.

Tamsic Tapas

The forbearance of such people is tamsic in nature. They seek revenge even by imputing false charges against the other; they will not even hesitate to resort to murder, even at the risk of losing their own lives. Their desire to take revenge is not necessarily based on actual facts – in fact, it is usually an attempt to conceal their own falsehood or lie which is exposed by another. This is enough cause to want to destroy the other.

Truth or lies are of no consequence for the tamsic individual. He only takes pride in his body-self and is blinded by ignorance. He seeks only establishment of the self.

1. How can such a depraved soul know even the basic rudiments of dharma?

2. How can one with such degenerate conduct understand the first principles of courtesy and decorum?

3. How can such an ignoramus be acquainted with the basics of truthful conduct?

4. How can such a deceitful person understand the Truth?

5. How can such an evil-minded soul recognise his duty?

6. How can one so far removed from the path of Truth understand love?

Such people consider themselves to be godlike and speak as though the Lord belongs only to them!

1. The basis of their tapas is the downfall and destruction of the other.

2. Their decisions are based on a lie.

3. They become upset and agitated without cause.

4. If someone tells the truth, they get upset and flare up.

5. If someone reminds them of their duties, they get extremely upset and angry.

6. If someone turns against them, they consider them to be eternal enemies.

This upsetting, this resentment and innate rancour can cause tremendous hostility and a lifetime of deep enmity. Lifelong fighting and even the severing of relationships leads to duties being totally neglected.

Such people have in fact turned their backs on God for the rest of their lives. Thus they have been diverted from the path of Truth for many a lifetime.

Such quarrels generally take place:

a) with those whom one considers to be one’s own;

b) with one’s relations and close associates;

c) when friendships break up.

In fact, such enmities are often a front for the dereliction of duty.

अध्याय १७

मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तप:।

परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्।।१९।।

और अब सुन! भगवान तामसिक तप की बताते हैं,

शब्दार्थ :

१. जो तप मूर्खता पूर्ण आग्रह से,

२. अपने आपको पीड़ा देकर

३. और दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है,

४. वह तामसिक तप है।

तत्त्व विस्तार :

मूढ़ आग्रह पूर्ण लोग कैसे होते हैं, यह समझ ले।

1. मूर्खता पूर्ण झूठे सिद्धान्तों को अपनाए हुए,

2. अवास्तविकता पर आश्रित,

3. विभ्रान्ति पूर्ण दृढ़ निश्चय किये हुए,

4. संशय पूर्ण निर्णय पर विश्वास किए हुए,

5. भ्रष्टात्मक वृत्ति से बन्धे हुए,

6. कर्तव्य विमुख धारणा में निष्ठा वाले,

7. बहकी बुद्धि वालों की दृढ़ ज़िद्द वाले लोग मूढ़ आग्रह पूर्ण होते हैं।

पथ भ्रष्ट का अपरिवर्तनशील निश्चय मूढ़ आग्रह होता है।

जो केवल अहंकार में बैठ कर दूसरे को मारने का, तड़पाने का, तबाह करने और उजाड़ने का निश्चय करते हैं अर्थात् केवल दुःख देने का निश्चय करते हैं; वे इस निश्चय की पूर्ति अर्थ दूसरे को भी पीड़ा देते हैं, बहुत कष्ट देते हैं और स्वयं भी बहुत कष्ट सहते हैं। ये मूढ़ाग्रही होते हैं।

तामसिक तप :

ऐसे लोगों का तप भी तामसिक होता है। ये बदला लेना चाहते हैं, चाहे दूजे पर झूठा ही दोष सिद्ध करने के प्रयत्न करें; चाहे उसे मार कर स्वयं भी मारे जायें। बदला लेने का भाव ज़रूरी नहीं कि सच्चाई पर आधारित हो। ये शायद अपना झूठ ही छिपाना चाहते हों, जिसे दूसरे ने प्रकट कर दिया, या प्रकट कर सकता है; बस इस कारण उसे तबाह कर देते हैं।

भाई! तमोगुणी को सच और झूठ से क्या? वे तो देहाभिमानी होते हैं, अज्ञान पूर्ण अन्धे होते हैं। वे तो केवल अपनी स्थापति चाहते हैं।

क) वे धर्म भ्रष्ट, धर्म को क्या जानें?

ख) वे आचार भ्रष्ट, शिष्टाचार को क्या जानें?

ग) वे मनोमूढ़, सत्मय व्यवहार को क्या जानें?

घ) वे कपटी, यथार्थता को क्या जानें?

ङ) वे दुर्मति, कर्तव्य को क्या जानें?

च) वे सत्य से गुमराह, प्यार को क्या जानें?

अपने आपको वे ख़ुदा मानते हैं और बातें भी ऐसी करते हैं, मानो ख़ुदा उन्हीं का हो।

1. उनके तप की प्रेरक वृत्ति का आधार दूसरे को गिराना और उसका नाश करना है।

2. इनके निर्णय झूठ पर आधारित हैं।

3. कोई बात ही नहीं होती पर ये बिगड़ जाते हैं और भड़क जाते हैं।

4. किसी ने सच कह दिया तो बिगड़ गये और भड़क गये।

5. किसी ने कर्तव्य करने को कह दिया तो बिगड़ गये और भड़क गये।

6. किसी ने मुखड़ा मोड़ लिया तो दुश्मन बन गये।

यह बिगड़ना, यह गिला, यह दुश्मनी, यह शिकवा, महा वैमनस्य का रूप धर लेते हैं और इनकी दुश्मनी जीवन भर की बन जाती है। उम्र भर के लिये लड़ाई छिड़ जाती है, उम्र भर के लिये नाते टूट जाते हैं और कर्तव्य छूट जाते हैं।

क्यों न कहें मेरी जान्! उम्र भर के लिये ये भगवान से रूठ जाते हैं। इस विधि जन्म जन्म के लिए सत् की राह से जीव छूट जाते हैं। ये झगड़े अधिकांश,

क) अपनों में ही होते हैं।

ख) नाते बन्धुओं से ही होते हैं।

ग) मित्रता टूटने पर ही होते हैं।

क्यों न कहें, कर्तव्य विमुख होने का यह एक बहाना है।

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