Chapter 17 Shloka 12

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।

इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।।१२।।

That yagya which is performed

with an expectation of result

and merely for vain display,

is rajsic.

Chapter 17 Shloka 12

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।

इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।।१२।।

The Lord says, Look Arjuna!

That yagya which is performed with an expectation of result and merely for vain display, is rajsic.

Kamla, first consider once again, the basic attributes of the rajsic individual. Then it will be easier to understand the rajsic yagya.

The attribute of rajas

1. Rajsic beings are attached to their desires and worldly indulgences.

2. They are ever unsatisfied and greedy.

3. They are hypocrites.

4. They are full of deceitful, fraudulent tendencies and impudence.

5. They are selfish and they are perpetrators of evil deeds.

Such people are impelled into action only by the urge to satiate their selfish desires. You can therefore surmise as to what theiryagya will be like.

Rajsic Yagya

People who perform rajsic yagya are infested with demonic qualities.

1. Such people consider themselves to be the most superior.

2. They consider themselves to be the wisest.

3. They consider themselves to be the strongest.

4. They are full of desire, anger and immeasurable greed.

Lobh – Greed

Greed can be for recognition, respect, power and wealth. In every facet of life, such people seek the supremacy of the ‘I’ – towards this end they perform yagya. Their sole endeavour is self-establishment and the expansion of the ego. Even their service is not devoid of selfish desire. Their love and their friendship is also not free of desire. Any support they might offer and their visible deeds are also ridden with a similar appetite for self-establishment. Their desire could be for wealth or for recognition. The ultimate aim of their craving is the establishment of the ‘I’.

Let us first dwell on the basic desire and view point of the demonic and divine beings.

The demonic being

The divine being

1. Seeks only to establish the ‘I’. 1. Seeks to establish the Truth in place of the ‘I’.
2. Is not only a worshipper of the body-self, this idol of clay – he becomes a lifeless image himself – identified as he is with the inanimate body self. 2. No matter what name he takes – Ram or Om, he is constantly endeavouring to usher the Lord into his life, and to renounce worship of the body-self. In fact he aims at severing all ties with the body and seeks to establish a relationship with the Supreme.
3. Desires something from everyone since his goal is the establishment of the body-self. He desires to gain whatever he likes in order to satiate his mind and to gain recognition for his intellect as the most superior. 3. Seeks to lay his all – his body, mind and intellect, at the Lord’s feet.
4. Desires recognition from the world. 4. He endeavours only to glorify the Lord.
5. Seeks loyalty from others. 5. He is loyal only to the Lord.
6. Seeks love from the world. 6. The Lord’s love flows from him perpetually.
7. Finds it impossible to forgive. 7. He is forgiveness itself.
8. Does not know the meaning of duty. 8. Duty is his very life.
9. Rejects all human beings. 9. Strives to enhance the other’s positive qualities to increase people’s respect for the other.
10. Can be purchased by wealth. 10. He is indeed priceless.
11. Remains ever dissatisfied, because his life revolves around desire and hatred. 11. Detached and indifferent to self, such a one is ever satiated.
12. Is replete with moha and ignorance. 12. Lives eternally in Knowledge and Light.
13. The Truth is ever concealed from him and such a one is full of impurities. 13. Replete with qualities of the Supreme, such a one is blameless.
14. He is the cause of agony to
14. He brings peace to all.
15. He remains a lifelong beggar. 15. He is the bestower of boons.
16. He is arrogant and proud. 16. All respect and acclaim belongs to the Lord.
17. He can never forget his name and form. 17. His name and form belong to his Lord – he is established in this conviction.
18. He burns with anger and consumes others in its intensity as well. 18. He is always at peace having given his very being to the Lord.
19. His mind is coloured by grudges and hostilities of the past which he can never forget. 19. He forgets any attack by his enemy and harbours no enmity within himself – thus he does not subject his mind-stuff to impurities.
20. His past rules his present; therefore he is ever dominated by a stale mind and a stale intellect which constantly emit a foul stench. 20. He dwells in the present and is unaffected by all his yesterdays. He is thus not polluted by the stench of stale thoughts or by the aberrations of past opposition.
21. He is a veritable demon who constantly feeds on other human beings. 21. Such a one is a godly, He transforms even demons into human beings.

The rajsic being performs yagya only for the fulfilment of his desires and not for self-purification or for imbibing virtuous qualities. He performs yagya to gain recognition from the world as a great and virtuous soul. The greedy and those ridden with desire indulge in this rajsic yagya.

अध्याय १७

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्।

इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम्।।१२।।

भगवान कहते हैं, देख अर्जुन!

शब्दार्थ :

१. जो यज्ञ

२. फल को लक्ष्य बना कर

३. और केवल दम्भ अर्थ किया जाता है,

४. उस यज्ञ को तू राजस जान।

तत्त्व विस्तार :

कमला! पुनः राजसिक गुण सम्पन्न के मौलिक गुणों पर ध्यान लगा। तब यह राजसिक यज्ञ भी समझ आ जायेगा।

राजस वृत्ति :

राजसिक गुण सम्पन्न लोग,

क) कामोपभोग आसक्त होते हैं।

ख) नित्य अतृप्त, लोभी गण होते हैं।

ग) दम्भ पूर्ण लोग होते हैं।

घ) छल, कपट, धृष्टतापूर्ण होते हैं।

ङ) स्वार्थ पूर्ण तथा दुराचारी होते हैं, इत्यादि।

ऐसे लोग केवल अपने मतलब को सिद्ध करने के लिए ही कार्य प्रेरित करते हैं। उनका यज्ञ क्या और कैसा होगा, यह तुम स्वयं सोच लो!

राजस यज्ञ :

भाई! वे तो आसुरी सम्पदा सम्पन्न होते हैं।

– वे तो अपने को सर्वश्रेष्ठ मानते हैं।

– वे अपने को बुद्धिमान मानते हैं।

– वे तो अपने आपको बलवान् मानते हैं।

– वे काम, क्रोध और अगाध लोभपूर्ण होते हैं।

लोभ :

लोभ मान का भी होता है, बल और धन का भी होता है। भाई! जीवन के हर पहलू में ये लोग ‘मैं’ की प्रधानता चाहते हैं, ये यज्ञ भी इसी कारण करते हैं। यानि, केवल अपने को स्थापित करने के यत्न करते हैं, अपना अहंकार वर्धन करने के यत्न करते हैं। यानि, उनकी सेवा भी कामना शून्य नहीं होती। उनका प्रेम, उनकी दोस्ती भी कामना शून्य नहीं होती। उनका सहयोग, उनका दृष्ट कर्म भी कामना शून्य नहीं होता।

चाहे कामना धन की हो या मान की, जैसी भी कामना है, वह ‘मैं’ के वर्धन की ही है। पहले आसुरी और दैवी गुण पूर्ण की निहित चाह और दृष्टिकोण देख ले।

आसुरी सम्पदा पूर्ण 

दैवी सम्पदा सम्पन्न

1. केवल ‘मैं’ को स्थापित करना चाहता है। 1. ‘मैं’ की जगह पर सत् को स्थापित करना चाहते हैं।
2. तनो उपासक ही नहीं, यानि मूर्ति उपासक ही नहीं, ये बुत स्वयं ही हो गये होते हैं, बुत तद्‍रूप जो हो गये। 2. बाह्य नाम, राम या ओम् कहो, या भगवान को मूर्तिमान् करके अपने तनो बुत उपासना छोड़ देते हैं। वे तो निज तन से भी नाता तोड़ रहे हैं और परम से नाता जोड़ रहे हैं।
3. इनको तो सबसे कुछ लेना है, क्योंकि निज तन स्थापित जो करना है, रुचिकर पाकर मन रिझाना है, बुद्धि को भी श्रेष्ठ कहलवाना है। 3. इन्होंने तो अपना सर्वस्व भगवान को ही देना है, यानि तन भी भगवान को देना है, मन और बुद्धि भी भगवान को देने हैं।
4. इन्हें जग से भी मान पाना है। 4. इन्हें तो भगवान को मान देना है।
5. जग से वफ़ा ये चाहते हैं। 5. ये भगवान से वफ़ा निभाते हैं।
6. जग से प्रेम ये चाहते हैं। 6. ये भागवद् प्रेम बहाते हैं।
7. ये क्षमा नहीं कर पाते हैं। 7. ये क्षमा स्वरूप बन जाते हैं।
8. कर्तव्य का नाम ये नहीं जानते। 8. कर्तव्य ही इनका जीवन है।
9. इन्सान को ये ठुकराते हैं। 9. ये दूजे के मानपूर्ण गुण बढ़ाते हैं।
10. ये धन पे बिक जाते हैं। 10. ये स्वयं अनमोल बन जाते हैं।
11. द्वेष पूर्ण काम पर आश्रित हैं ये, नित्य अतृप्त ही रहते हैं। 11. निरासक्त ये उदासीन, नित्य तृप्त ही रहते हैं।
12. ये मोह पूर्ण और अज्ञान से भरे होते हैं। 12. ये नित्य ज्ञान और प्रकाश में रहते हैं।
13. ये आवरण पूर्ण और दोषों से भरे होते हैं। 13. ये परम गुण पूर्ण निर्दोष होते हैं।
14. दूजे को ये नित्य व्याकुल करते हैं। 14. ये सबके लिए शान्तिप्रद होते हैं।
15. जीवन भर ये भिखारी रहते हैं। 15. ये वर देने वाले दाता ही होते हैं।
16. ये महा गुमानी गण होते हैं। 16. यहाँ तो मान सब राम का होता है।
17. निज नाम रूप ये नहीं भूल सकते। 17. यहाँ नाम रूप भगवान का है, इसमें ही स्थित होना चाहते हैं।
18. क्रोध से ये नित्य जला करते हैं और दूसरों को भी जलाते हैं। 18. अपना आप ही भगवान को देकर ये शान्त हो जाते हैं।
19. बीते हुए गिले शिकवे इनको आवृत किये रहते हैं, ये उन्हें भूलते ही नहीं। 19. दुश्मन के प्रहार को भी ये भूल जाते हैं, यानि अपने चित्त में नहीं रखते। ये अपना चित्त अशुद्ध नहीं करते।
20. आधुनिक पर, या कहें इनका जो भी आज है, उस पर कल जो बीत चुका है, उसका राज्य है; यानि, बासी बुद्धि और बासी मन है – उसमें बासी दुर्गन्ध होती है। 20. ये आज की बात करते हैं, जो कल बीत गया, उससे प्रभावित नहीं होते। बासी बातों की गन्ध इनमें नहीं होती। इनके मन में पुराने प्रतिद्वन्द्वों के विकार नहीं होते।
21. भाई! ये असुर हैं, इन्सान को खाते हैं। 21. ये देवता हैं, असुरों को भी इन्सान बनाते हैं।

राजसिक लोग तो केवल कामना पूर्ति के लिए यज्ञ करते हैं। अपनी चित्त शुद्धि के अर्थ ये यज्ञ नहीं करते, अपने में सद्गुण लाने के लिए ये यज्ञ नहीं करते, लोगों में धर्मात्मा कहलाने के लिए ये यज्ञ करते हैं। राजसिक यज्ञ, लोभी और कामना पूर्ण लोग करते हैं।

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