Chapter 16 Shloka 19

तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।१९।।

The Lord says, O Arjuna:

I repeatedly cast these people who harbour malice,

these evil doers and vile performers of cruel deeds,

into the degraded demonic species of the world.

Chapter 16 Shloka 19

तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।१९।।

The Lord says, O Arjuna:

I repeatedly cast these people who harbour malice, these evil doers and vile performers of cruel deeds, into the degraded demonic species of the world.

Individuals who are fit for the demonic species

The Lord says, I repeatedly throw into the degraded demonic wombs:

a) those who have strayed from the path of Truth;

b) those who escape from their duties;

c) those degraded, stubborn souls who bode evil;

d) those who are of a fiery temperament.

1. The ever discontented, infuriated and quick tempered people receive the demonic wombs.

2. Those who turn away from the Truth attain diabolical wombs susceptible to the throes of rebirth and death.

3. Crazed and attachment ridden souls attain wombs which furnish only sorrow, and the repeated prospect of birth and death.

4. Egoistic, proud and arrogant people only attain demonic wombs.

5. Those whose actions are contrary to the code prescribed by the Scriptures attain demonic wombs.

6. Those inveterate sinners who act contrary to humane values attain painful and sorrowful wombs trapped in the cycle of birth and death. The tyrannical and the wicked attain demonic wombs.

Little one, such demonic souls:

a) cause great agony to the parents;

b) cause distress to husband and wife;

c) oppress their brothers and sisters;

d) render their children orphans;

e) are a blot on the nation’s fair name;

f) collect wealth through deceitful and improper means;

g) rob others of their livelihood and even their life;

h) steal the good name of others;

i)  are an eternal cause of sorrow to others;

j)  live only for the satiation of their desires;

k) exist only for self-establishment and tell any number of lies in order to ensure it;

l)  pressurise and subjugate those abiding in the Truth in order to safeguard their own lie!

In order to protect their wealth and their repute, such people constantly:

a) cause the ruin of others;

b) find fault with others;

c) trouble others.

These ungrateful, selfish, hard hearted people, who take recourse to deceitful means to attain what they seek, are capable only of criticism.

These sinful people are veritable demons. They are murderers. The Lord says, “I cast such people repeatedly into demonic wombs.” Such demons receive the support and association of other like souls through each birth.

Now understand what the Lord means when He claims that it is He who repeatedly throws these people into the pit of demonic births.

The seed of the fruit of action sprouts:

a) in the presence and under the authority of Truth;

b) by the justice rendered by Truth;

c) when it receives the fruit of vice and virtue bestowed by the Supreme Truth.

The measure of an individual’s deeds is the Gita, in other words it is:

a) a life is imbued with the injunctions of the Gita;

b) a life lived in accordance with the Word of the Gita;

c) a life moulded by the dharma propounded by the Gita.

You can either be the Gita embodied and the epitome of all that the Gita propounds, or else you are at complete variance with the path of Truth.

In that case, one is neither established in the Truth, nor even a pilgrim on the path of the Truth. The Gita is Lord Krishna Himself. It is a clear exposition of His true being. Gita is Truth Itself. It is the scale by which the individual is measured and becomes the recipient of the appropriate fruits of action.

1. The Gita elucidates on the nature of Brahm.

2. The Gita propounds His true Essence.

3. The Gita describes His dharma.

4. The Gita lays down His Universal Law.

5. The Gita illustrates His basic core.

6. The Gita describes His mode of governance.

7. The Gita is a description of the manifest form of dharma in His life.

8. The Gita is an exposition on His justice.

9. The Gita is a description of His constitution.

Thus the Gita contains His irrevocable law. The Gita is that Truth whereby the individual can weigh himself and his life. From this point of view it could be said that the essence of Lord Krishna bestows the fruits of action.

Through the decree of That Supreme Justice and in the presidency of That Truth, the seeds of action attain varied wombs. The fruits are in accordance with the actions performed. How this cycle of action is perpetrated has been discussed earlier in detail.

अध्याय १६

तानहं द्विषत: क्रूरान्संसारेषु नराधमान्।

क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु।।१९।।

भगवान कहते हैं कि अर्जुन!

शब्दार्थ :

१. इन द्वेष करने वाले,

२. अशुभ कर्म करने वाले,

३. क्रूर कर्मी व नर अधमों को,

४. मैं संसार में बार बार आसुरी योनियों में गिराता हूँ।

तत्त्व विस्तार :

आसुरी योनियों का पात्र जीव:

भगवान कहते हैं उन,

क) पथ भ्रष्ट लोगों को,

ख) कर्तव्य विमुख लोगों को,

ग) ज़िद्दी और दुराग्रही लोगों को,

घ) तीखे मिजाज़ वाले लोगों को,

वह बार बार आसुरी योनियों में गिराते हैं।

1. नित्य कुपित तथा शीघ्र क्रोध से उत्तेजित होने वालों को आसुरी योनियाँ मिलती हैं।

2. सत् विमुख लोगों को जन्म मृत्यु पूर्ण आसुरी योनियाँ मिलती हैं।

3. विभ्रान्त तथा मोह युक्त लोगों को दुःख, दर्द, जन्म, मृत्यु पूर्ण योनियाँ मिलती हैं।

4. अहंकार, अभिमान तथा दर्प पूर्ण लोगों को आसुरी योनियाँ मिलती हैं।

5. नियम विरुद्ध वर्तन करने वाले लोगों को आसुरी योनियाँ मिलती हैं।

6. इन्सानियत के विरुद्ध चलने वालों को तथा पापचारी लोगों को दुःख, दर्द, जन्म, मृत्यु पूर्ण आसुरी योनियाँ मिलती हैं। अत्याचारी तथा क्रूर कर्मी लोगों को आसुरी योनियाँ मिलती हैं।

नन्हूं! आसुरी वृत्ति वाले लोग :

1. माँ बाप को तड़पाते हैं।

2. पति या पत्नी को तड़पाते हैं।

3. भाई, बहिन पर अत्याचार करते हैं।

4. बच्चों को यतीम बना देते हैं।

5. देश पर कलंक लगा देते हैं।

6. झूठी तथा अनुचित विधि से धन उपार्जित करते हैं।

7. दूसरे की जान तथा आजीविका हरते हैं।

8. दूसरे का मान हरते हैं।

9. दूसरे को निरन्तर दुःख देते हैं।

10. वे केवल काम उपभोग के कारण जीते हैं।

11. वे कवल अपनी स्थापति के लिये जीते हैं और झूठ बोलते हैं।

12. वे अपना झूठ बचाने के लिये सच बोलने वाले को दबाते हैं।

वे अपना मान और धन बचाने के लिये :

क) दूसरे को गिराते हैं।

ख) दूसरे पर दोषारोपण करते हैं।

ग) दूसरे को तंग करते हैं।

वे कृतघ्न, स्वार्थी, कठोर, छल कपट का आसरा लेने वाले तथा केवल आलोचना करने वाले होते हैं।

भाई ये सब पापी गण असुर होते हैं। यही राक्षस और खूनी होते हैं। भगवान कहते हैं, ‘ऐसे लोगों को मैं बार बार आसुरी योनि में गिराता हूँ, बार बार आसुरी योनि में जन्म देता हूँ।’

ये असुर पुन: पुन: नव जन्मों में असुर संयोग ही पाते हैं।

अब समझ! जब भगवान कहते हैं, ‘मैं इन्हें आसुरी योनि में गिराता हूँ,’ तो इससे क्या तात्पर्य है?

देख! कर्म फल बीज जो बनता है, वह मानो :

1. सत् की अध्यक्षता में बनता है।

2. सत् के न्याय से बनता है।

3. पाप पुण्य का फल परम सत् के राही मिलता है।

यूं कहो जीव के कर्म की तुला गीता है, यानि,

– गीतामय जीवन है।

– गीता कथित जीवन है।

–   गीता प्रतिपादित धर्म है।

या आप गीता की प्रतिमा हैं और गीता आपकी वाङ्मय प्रतिमा है, वरना आप सत् पथ से विमुख ही हैं।

यानि, न आप सत् स्थित हो और न ही सत् पथिक हो। गीता ही मानो भगवान कृष्ण हैं। गीता ही मानो भगवान कृष्ण का वाङ्मय दर्शन है। गीता ही सत् है। गीता राही ही तुल कर मानो जीव को कर्म फल मलता है।

गीता में ही ब्रह्म का,

1. स्वभाव प्रतिपादित है।

2. स्वरूप प्रतिपादित है।

3. धर्म प्रतिपादित है।

4. विधान प्रतिपादित है।

5. मूल तत्त्व प्रतिपादित है।

6. शासन प्रणाली वर्णित है।

7. जीवन में निश्चित नियम धर्म की प्रदर्शनी है।

8. न्याय शास्त्र है।

9. संविधान सम्बन्धी रचना है।

यानि, गीता में ही ब्रह्म का कानून है। गीता ही वह सत् है, जिससे जीव का जीवन तोला जाता है। इस नाते कह लो, कृष्ण तत्त्व ही कर्म फल प्रदान करता है।

उस परम सत् से न्याय पाकर, परम आत्म की अध्यक्षता में कर्म फल रूप बीज पुनः विभिन्न योनियाँ पाते हैं। यानि, जीव, जैसा कर्म करते हैं, वैसा फल पा लेते हैं। इस कर्म चक्र को सत् कैसे रचता है, यह पहले ही कह कर आये हैं।

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