Chapter 16 Shloka 15

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।

यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ।।१५।।

The Lord now says to Arjuna, that swollen with pride, such

demonic people claim: ‘I am rich and of noble birth.

Who can equal me? I will perform sacrifice,

I will give charity, I will rejoice and revel

in the pleasurable.’ Such are the beliefs

of people who are deluded by ignorance.

Chapter 16 Shloka 15

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।

यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः।।१५।।

The Lord now says to Arjuna, that swollen with pride, such demonic people claim:

‘I am rich and of noble birth. Who can equal me? I will perform sacrifice, I will give charity, I will rejoice and revel in the pleasurable.’ Such are the beliefs of people who are deluded by ignorance.

Such people are convinced that they are incomparable on account of their great wealth and superior lineage.

1. “I am the greatest.

2. I am the most intelligent and knowledgeable.

3. Only I am worthy of respect and veneration.

4. Who can equal my family and my background?

5. There is none like me!”

Believing that they cannot be overshadowed by anyone, thanks to their wealth, knowledge, renown, background, superior intellect, power, job, business or status as leader etc., such people perform great sacrifices and bestow ample charities. They give because of their pride in their superior status, they give considering themselves to be akin to God! Thus they belittle and humiliate the other, believing him to be low and despicable.

They perform sacrifices and give charity only in order to establish their own superiority. They build hospitals and do other ‘good works’ in pursuance of this same goal.

No matter what they do, they are basically motivated by ego, pride, and attachment to the body, by the idea of doership and enjoyership, by moha and ignorance.

Since they do not consider the other to be a human being, there is no question of any charitable thoughts, of love, compassion, generosity, magnanimity, forgiveness, or Truth. They have no sympathy or fellow feeling for anyone. Such people incur sin and increase sinfulness in the world. Neither are they pure themselves, nor do they appreciate purity in others.

1. They are greedy.

2. They perpetrate hatred.

3. They seek revenge.

4. They are boastful.

5. They harbour venomous feelings.

6. They have contempt for others.

7. They indulge in criticism.

8. They believe the other to be petty and insignificant.

9. They are crooked and devious.

10. They are hard hearted and merciless.

11. They are evil doers who revel in deceit and duplicity.

In short, they possess the whole store of demonic qualities.

अध्याय १६

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया ।

यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ।।१५।।

भगवान आगे कहते हैं अर्जुन से, कि देख यह आसुरी सम्पदा सम्पन्न लोग गुमान करते हुए कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. मैं महा धनी हूँ,

२. मैं महा कुलीन हूँ,

३. मेरे समान दूसरा कौन है?

४. मैं यज्ञ करूँगा,

५. मैं दान करूँगा,

६. मैं मौज करूँगा, हर्षित होऊँगा,

७. अज्ञान से मोहित होने वाले लोग इस प्रकार मानते हैं।

तत्त्व विस्तार :

आसुरी लोगों की बात करते हुए भगवान कहते हैं कि ऐसे लोग मानते हैं, ‘मैं महाधनी हूँ और मैं ही कुलीन हूँ, मेरे समान दूसरा कौन है?’ यानि,

क) ‘मैं ही सर्वश्रेष्ठ हूँ।

ख) मैं ही सर्व बुद्धि सम्पन्न हूँ।

ग) केवल मैं ही पूज्य हूँ।

घ) केवल मैं ही मान पाने के योग्य हूँ।

ङ) हमारे कुल का मुकाबला कौन कर सकता है?

च) मेरे समान और कोई कहीं है ही नहीं।’

वह सोचता है, ‘मेरे सामने कोई ठहर ही कैसे सकता है? मेरे पास धन, ज्ञान, मान, कुल, बुद्धि, राज्य, नौकरी, व्यापार और नेतापन आदि सभी का बल है।’

ये बल गुमानी बहुत यज्ञ भी करते हैं और दान भी करते हैं, परन्तु ये अपनी श्रेष्ठता के गुमानी होते हैं। ये अपने को श्रेष्ठ मान कर दान देते हैं, अपने को भगवान मान कर दान देते हैं। यानि, दूसरे को ये निकृष्ट मान कर उसे गिराते हैं।

अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने को ये यज्ञ और दान करते हैं। अस्पताल इत्यादि बनवा कर शुभ कर्म करते हैं।

भाई! ये लोग जो भी करते हैं, इसके पीछे प्रेरणा उनका अहंकार, दर्प, तनो संग, कर्तृत्व भाव, भोक्तृत्व भाव, मोह और अज्ञान ही होता है।

जब वे दूसरे को इन्सान ही नहीं मानते तो सद्भावना का, प्रेम का, करुणा का, उदारता का, दया या क्षमा शीलता का, सत्यता का, जीवन को यज्ञमय बनाने का प्रश्न ही नहीं उठता। इन्हें किसी से सहानुभूति नहीं होती। यह लोग पाप विमोचक नहीं होते, बल्कि पाप वर्धक होते हैं। न ये स्वयं ही पावन हैं, न ये पावनता पसन्द करते हैं।

ये तो,

1. लोभी लोग हैं।

2. द्वेष करने वाले लोग हैं।

3. बदला लेने वाले लोग हैं।

4. शेखी मारने वाले लोग हैं।

5. वैमनस्यपूर्ण लोग हैं।

6. दूसरे को गिरा हुआ मानते हैं।

7. दूसरों की आलोचना करते हैं।

8. दूसरों को तुच्छ समझते हैं।

9. कुटिलता पूर्ण होते हैं।

10. कठोर, निर्दयी होते हैं।

11. कुकर्मी, छल तथा कपटपूर्ण लोग हैं।

यानि, आसुरी सम्पदा पूर्ण हैं ये लोग।

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