Chapter 12 Shloka 16

अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय:।।१६।।

He who is impartial, pure, shrewd,

detached from self, devoid of distress

and who does not initiate any undertaking,

that devotee of Mine is extremely dear to Me.

Chapter 12 Shloka 16

अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय:।।१६।।

The Lord continues:

He who is impartial, pure, shrewd, detached from self, devoid of distress and who does not initiate any undertaking, that devotee of Mine is extremely dear to Me.

Anapeksha (अनपेक्ष)

Little one, first understand the meaning of the word ‘Anapeksha’. It connotes impartiality; one who does not take sides; one who is unaffected by all.

The Lord says:

1. One who is indifferent to sense objects;

2. He who is satiated with whatever he receives;

3. He who has not even the slightest attachment to any sense objects;

4. He whose mind is completely devoid of any trace of desire or craving;

– that devotee is dear to Me.

Shuchi (शुचिः)

Little one, the Lord states that one who is ‘Shuchi’ is dear to Him.

1. Those whose mind-stuff is pure;

2. Whose mind is free from the conglomeration of conflicting tendencies;

3. Those who act for the benefit of all beings;

4. Those who engage in deeds of yagya, tapas and daan;

– all such devotees are infinitely pure and extremely dear to the Lord.

Little one, do not think that those who give wealth are necessarily pure.

1. In spirituality, daan has to be devoid of any desire for personal gain.

2. In spirituality, the gift of the body in the service of the other is considered to be a worthy daan.

3. Gifting one’s intellect for the others’ benefit is a worthy ‘daan’.

To employ one’s intellect and body in the establishment of the other is considered to be a much greater daan than the gift of wealth.

When one’s life becomes a constant practice of establishing the other through the employment of one’s intellect, true yagya takes root. The Lord says that such a devotee truly pleases Him.

Daksha (दक्ष)

Daksha’ is a term used for one who is clever, vigilant, able, dextrous, and ever alert.

Little one, the Lord’s devotee will inevitably be ‘daksha’ because:

a) He has to fulfil varied tasks of various people.

b) He performs deeds for the benefit of all.

c) He believes that the entire universe is the Lord’s cosmic manifestation.

d) He believes everybody to be manifestations of the Self.

Forgetful of himself, he engages in deeds for the other, believing all tasks to be the Lord’s own tasks. Vigilant and ever endeavouring, he performs everybody’s tasks with a selfless attitude.

When he performs deeds for others, the latter are often suspicious of him; they suspect his intentions when they perceive his complete identification in the performance of their tasks with an excellence that far surpasses their own.

Udaseen (उदासीन)

The connotation of this word is sometimes difficult to define and understand. Udaseen means devoid of any desire, impartial, detached. Udaseen is often translated as ‘indifferent’ in English.

Several questions arise:

1. How can a universal well wisher be detached?

2. How can one who is Love Itself be deemed as indifferent?

3. How can one who is compassionate and merciful be impartial?

4. How can one who is the lover of all devotees of the Lord be indifferent?

5. Can one who engages in selfless deeds be called ‘Udaseen’?

6. If he performs the tasks of all with shrewdness, how can he be indifferent?

Little one!

a) A sadhak must be indifferent towards his own body self.

b) The sadhak’s aim is to renounce his body idea.

c) The sadhak has to distance himself from the countless desires of the mind.

d) The sadhak has to be indifferent towards his own intellect.

e) He has to gain detachment towards his varied concepts and beliefs.

The Lord says, “That devotee of Mine, who leaves himself to Me and engages himself selflessly in the service of My Cosmic Form, that ‘udaseen bhakta’ is infinitely dear to Me.”

Gatvyatha (गतव्यथ)

Little one, the devotee of the Lord will inevitably be devoid of all sorrow. The Lord’s love abides in his heart, then how can he be affected by any grief?

Little one, understand one fact:

1. Sorrow is a quality of the mind.

2. Sorrow arises out of the ruminations of the mind.

3. If you do not give your mind any time to think, you can never be affected by sorrow.

If the mind is immersed in grief, it becomes sorrowful. If on the other hand you distract your mind from the objects that cause pain and fix it in objects that give happiness, you cannot ever be affected by sorrow. If your mind is fixed on the Lord, sorrow can never touch you. This is what the Lord is trying to explain.

Happiness and sorrow frequent each one’s door; however, the one who is not sorrowful even when beset by every kind of problem and pain, that devotee is infinitely dear to the Lord.

Sarvarambha Parityagi (सर्वारम्भपरित्यागी)

The Lord states that the ‘Sarvarambha Parityagi’ or one who refrains from initiating any new undertaking, is dear to Him. Little one, the Lord has earlier said that it is imperative for the aspirant to engage himself in deeds that are devoid of selfish motive. Then how can one become a Sarvarambha Parityagi?

Little one, such people:

a) do not themselves initiate any new undertakings;

b) do not initiate any actions for personal benefit;

c) do not perform any action for fulfilment of personal desires;

d) do nothing for the establishment of their body self.

No matter what they do in life, they merely fulfil the dreams of others; they work for the fulfilment of others’ desires; others are the recipients of the fruits of their deeds. Such a one protects the honour of every individual who seeks his aid. He renders help to anyone who seeks it. Such a devotee, whilst fulfilling the other’s dreams and aspirations, works only for the establishment of the other.

The Lord states, “Such a devotee is dear to Me.”

अध्याय १२

अनपेक्ष: शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथ:।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्त: स मे प्रिय:।।१६।।

भगवान आगे कहने लगे :

शब्दार्थ :

१. जो पुरुष अनपेक्ष, पवित्र, दक्ष, उदासीन, और व्यथा रहित है,

२. वह सर्वारम्भ परित्यागी,

३. मेरा भक्त मुझको प्रिय है।

तत्त्व विस्तार :

नन्हूं लाडली! सर्व प्रथम ‘अनपेक्ष’ का अर्थ समझ ले।


अनपेक्ष का अर्थ है, निष्पक्ष होना, असम्बद्ध होना, सबके प्रति उदासीन होना।

भगवान कहते हैं :

1. जो विषयों के प्रति बेपरवाह है,

2. जो यदृच्छा लाभ में सन्तुष्ट रहता है,

3. जो विषयों से किंचित् मात्र भी संग नहीं करता,

4. जिसके मन में किंचित् मात्र भी कामना या स्पृहा नहीं है, वह भक्त मुझे प्रिय है।

पवित्र :

नन्हीं! भगवान को पवित्र लोग प्रिय हैं!

क) जिनका चित्त शुद्ध हो,

ख) जिनके मन में वृत्तियों के झमेले न लगे हों,

ग) जो लोग मन से सर्वभूत हितकर हों,

घ) जो यज्ञ, तप तथा दान करने वाले लोग हैं,

वे पवित्र हैं और भगवान को प्रिय हैं।

नन्हीं! दान से यह न समझ लेना कि जो धन का दान देते हैं, वे पवित्र लोग होते हैं।

– अध्यात्म में निष्काम दान ही श्रेष्ठ माना जाता है।

– अध्यात्म में तनो दान ही श्रेष्ठ माना जाता है।

– अध्यात्म में बुद्धि दान ही श्रेष्ठ माना जाता है।

अपनी बुद्धि और अपना तन लगा कर दूसरों को स्थापित कर देना धन के दान से कहीं श्रेष्ठ है।

अपनी बुद्धि लगा कर दूसरों को स्थापित करने के लिए जब जीवन में निरन्तर अभ्यास होने लग जाता है, तब ही वास्तविक यज्ञ आरम्भ होता है। भगवान कहते हैं ऐसे भक्त उनको भाते हैं!

दक्ष :

दक्ष का अर्थ है चतुर, सावधान, योग्य, कार्य कुशल, नित्य होशियार।

नन्हीं! भगवान का भक्त तो दक्ष होगा ही क्योंकि :

क) उसे तो अनेकों लोगों के तथा अनेकों प्रकार के काम करने होते हैं।

ख) वह तो सर्वभूत हितकर होता है।

ग) वह तो सम्पूर्ण विश्व को भगवान का विराट रूप मानता है।

घ) वह तो सम्पूर्ण जीवों को आत्म स्वरूप ही मानता है।

वह अपने आपको भूल कर, सबके कार्य भगवान के कार्य मान कर, अति सावधान हुआ और पूर्ण यत्न लगा कर निष्काम भाव से करता है। जब वह दूसरों के काज करता है, तो अनेकों बार लोगों को उस पर शक़ हो जाता है, क्योंकि वह अपने आप को भूल कर, दूसरे के तद्‌रूप होकर, जिसका काम है, उससे भी अच्छी तरह कार्य करता है।

उदासीन :

नन्हीं! यह जो उदासीनता का शब्द है, इसे अनेकों बार समझना कठिन हो जाता है। उदासीनता का अर्थ है नि:स्पृह:, निष्पक्ष, संग रहित।

अब यह देखना है कि :

1. सर्व भूतहित करने वाला उदासीन कैसे है?

2. प्रेम स्वरूप उदासीन कैसे है?

3. करुणापूर्ण, दयापूर्ण उदासीन कैसे है?

4. भक्त वत्सल उदासीन कैसे हो सकता है?

5. निष्काम कर्म करने वाला उदासीन कैसे हो सकता है?

6. दक्षता पूर्ण सबके काम करे तो उदासीन कैसे हो सकता है?


क) साधक को अपने तन के प्रति उदासीन होना है।

ख) साधक ने तो अपना तनत्व भाव छोड़ना है।

ग) साधक ने तो अपने मन की अनेकों चाहनाओं के प्रति उदासीन होना है।

घ) साधक ने तो अपनी बुद्धि के प्रति उदासीन होना है।

ङ) साधक ने तो अपनी ही मान्यताओं के प्रति उदासीन होना है।

भगवान कहते हैं, ‘जो मेरा भक्त अपने आप को मुझपे छोड़ कर मेरे विश्व रूप के लिए निष्काम भाव से कार्य करता है, वह उदासीन भक्त मुझे प्रिय है।’

गतव्यथ :

नन्हीं! भगवान का भक्त व्यथा रहित होगा ही। जिसके हृदय में भगवान का प्रेम बसता है, वह दु:खों से प्रभावित नहीं हो सकता।

नन्हीं! यहाँ एक बात समझ!

1. दु:ख मन को होता है।

2. दु:ख मन के सोचने पर होता है।

3. यदि आप अपने मन को सोचने का समय ही न दें तो आप दु:खी नहीं होंगे।

मन यदि दु:ख में खो जाये तो दु:खी होता है।

यदि आप अपना ध्यान दु:ख देने वाले विषय से हटा कर, सुख देने वाले विषय पर टिका देंगे तो आप दु:खी नहीं होंगे यदि आपका ध्यान भगवान में लगा हुआ होगा तो आप कभी भी दु:खी नहीं हो सकते। यही भगवान यहाँ कह रहे हैं।

दु:ख सुख तो आते ही रहते हैं, किन्तु जो सम्पूर्ण दु:ख होते हुए भी दु:खी नही होता, वह भक्त भगवान का प्रिय है।

सर्वारम्भपरित्यागी :

भगवान कहते हैं कि उन्हें ‘सर्वारम्भपरित्यागी’ पसन्द है।

नन्हीं ! भगवान कहते हैं निष्काम कर्म करने ही चाहियें। निष्काम कर्म का आरम्भ तो कहीं होगा ही। तो फिर कोई सर्वारम्भपरित्यागी कैसे होगा?

नन्हूं! ऐसे लोग :

क) अपने आप कुछ आरम्भ नहीं करते।

ख) अपने लिए कुछ आरम्भ नहीं करते।

ग) अपने काम्य कर्म तो करते ही नहीं।

घ) अपने तन की स्थापना के लिए कुछ भी आरम्भ नहीं करते।

ये जीवन में जो भी काम करते हैं, वह किसी और का स्वप्न होता है, वह किसी और की चाहना होती है, उसका फल किसी और को मिलता है। इनकी शरण में जो आये, ये उसकी लाज निभा देते हैं। यदि इनसे कोई सहायता मांगे, ये उसको सहायता दे देते हैं। ये तो केवल औरों के स्वप्न पूर्ण करते हुए उन्हें ही स्थापित करते हैं।

भगवान कहते हैं, ‘ऐसे भक्त मुझे प्रिय हैं।’

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