Chapter 12 Shloka 8

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय:।।८।।

Fix your mind in Me;

affiliate your intellect with Me;

thereafter, you will eternally dwell in Me;

of this there is no doubt.

Chapter 12 Shloka 8

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय:।।८।।

Bhagwan says:

Fix your mind in Me; affiliate your intellect with Me; thereafter, you will eternally dwell in Me; of this there is no doubt.

The consequence of love for the Lord

Look little one, the Lord says, if you truly love the Lord, your mind will belong to Him. Your intellect will be engaged in the Lord’s works and the body will be His – of this there is no doubt.

Love with the Lord means attachment with Him. Such attachment with the Lord results in detachment with the body self. Thus such a one’s moha with the body will be quelled and knowledge will take birth within. When moha is eradicated only love remains. Love is the practice of non-duality – the path to union with the Supreme. Love is the essence of the mind; love is the Lord made manifest. Love is the mainstay of tapas or endurance and the essence of devotion to the Lord.

The handmaidens of love for the Lord are the divine qualities. Selfless deeds and selfless knowledge are the natural outcome of such devotion. Indeed selflessness is born naturally of devotion to the Lord. One who loves the Lord dwells on Him with devotion and is devoid of any desire for self.

Only one purpose remains – to return to the Lord what is His. He who truly takes the Lord’s Name, does so without any desire for any gain. He seeks only to give of himself to his Beloved Lord, seating himself in the palanquin* of devotion (*a wooden compartment borne by four bearers that traditionally carried the Indian bride to the home of her beloved). The four bearers of the devotee are yagya, tapas, daan and love, and the devotee is fanned by the customary ‘chanwar’* of spiritual practice (* the chanwar is the whisk traditionally used to fan the deity in devotional worship). Thus does the devotee travel to meet with his Beloved Ram – unconcerned as to who is travelling on the same or opposite path.

It is also difficult to say whether Lord Ram travels to meet with His loved one or whether the devotee covers the distance between himself and his Divine Beloved! However, of this there is no doubt that ultimately the seeker and the Sought One are united. They verily become one.

“Let your intellect rest in Me,” says the Lord. Little one, now understand the connotation of this injunction.

1. Affix your intellect in the universal form of the Lord and serve His cosmic manifestation.

2. Use your intellect in the selfless service of others.

3. Use your intellect to establish others rather than in the fulfilment of personal desire.

4. Use the intellect to fulfil the heartfelt dreams of others.

5. Do not make your intellect subservient to the mind; use it instead to renounce the body idea.

6. It is on the basis of the intellect that you condemn the other as foolish. Relinquish this intellectual ego.

7. Cultivate in your intellect a worshipful attitude towards the Lord.

8. Use your intellect to eradicate the suffering of others.

9. Use your intellect for the protection and victory of others.

10. Your intellect must never clash with anyone else’s intellect.

If all are manifestations of the Lord Himself, let your intellect be used in the service of all people and hence serve the Lord. In this manner the sadhak gifts his intellect and his body to the world.

a) Once you have offered your body selflessly in the service of the Lord’s cosmic form, complement it with the gift of your intellect.

b) Your body will perform service for the other with a selfless attitude and your intellect will dedicate itself to fulfilling the other’s desires and dreams.

c) A sadhak never uses his intellect for personal protection. Eradication of the body idea and of the body related intellect is impossible without gifting one’s intellect to others.

The Lord therefore enjoins, “Affix your intellect in Me. You will then constantly dwell in Me – of this there is no doubt.”

Little one, this does not mean that one ceases to use the intellect. In fact, the intellect becomes sharper and shrewder when used in the service of others.

1. For then, you become another’s lawyer.

2. You employ your intellect to bring the tasks of others to successful fruition.

3. You will try to discover ways and means to fulfil the dreams of others.

Your intellect has so far engaged itself only in the procurement of your own desires and likes. Once you offer your intellect in the service of others, you will have to employ it in subjects that you have disliked so far. You will have to do for the other what you may never have done for yourself.

You may never have brought yourself to earn for your personal self, but you will now earn for others. You may have never deigned to employ any means for self-establishment – now you will think of several ways to establish others.

अध्याय १२

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।

निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशय:।।८।।

भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. मुझमें ही मन स्थापन कर,

२. मुझमें ही बुद्धि को लगा,

३. इसके उपरान्त निरन्तर तू मुझमें ही वास करेगा,

४. इसमें कोई संशय नहीं है।

तत्त्व विस्तार :

भगवान से प्रेम का परिणाम :

देख नन्हीं! भगवान कहते हैं कि :

गर प्रेम राम से हो गया,

तो मन उसका हो जायेगा।

बुद्धि राम के काज करे,

तो तन उसका हो जायेगा।।

भगवान कहते हैं इसमें कोई संशय नहीं!

गर राम से प्रेम हो गया,

तो संग वहीं हो जायेगा।

आसक्ति राम से हो गई,

विरक्त स्वत: हो जायेगा।।

अपने तन से मोह जो था,

वह स्वत: मिट जायेगा।

मोह जब मिट ही गया,

तो ज्ञान स्वत: आ जायेगा।।

मोह गया फिर प्रेम रहा,

पर याद रहे है राम प्रेम ।

अद्वैत का है अभ्यास प्रेम,

परम मिलन की है राह प्रेम।।

मन का है स्वरूप प्रेम,

भगवान का है रूप प्रेम।

तप का है आधार प्रेम,

परम प्रेम का सार प्रेम।।

परम प्रेम की चेरी जान,

दैवी सम्पदा होती है।

निष्काम कर्म निष्काम ज्ञान,

परम प्रेम ही होती है।।

या यूँ कह लो जब प्रेम हो,

परिणाम निष्कामता होती है।

उपासना भी तब हो निष्काम,

कोई चाहना जो नहीं होती है।।

इक प्रयोजन रह जाता है,

बस तेरा तुझको देना है।

जिसने राम का नाम लिया,

उसको कुछ नहीं लेना है।।

वह अपने आप को देने चला,

बैठ भक्ति की डोली।

यज्ञ, तप, दान, और प्रेम,

चार कहार उठायें डोली।।

विज्ञान चंवर झुलाये तब,

राम को मिलने जा रहा।

मेरी प्रिय कौन जाने यहाँ,

कौन जा रहा कौन आ रहा।।

राम मिलने आ रहे या साधक मिलने जा रहा; यह भी कुछ पता नहीं चलता। किन्तु साधक! तब साधक और साध्य एक हो जाते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।

नन्हीं! भगवान ने यहाँ कहा है कि बुद्धि को मुझमें लगा। इसको ज़रा ध्यान से समझ ले!

क) बुद्धि को भगवान के विश्व रूप में लगा और विराट रूप की सेवा कर।

ख) निष्काम कर्म करते हुए बुद्धि को औरों के लिए इस्तेमाल करो।

ग) बुद्धि को अपनी कामना पूर्ति के लिये इस्तेमाल करने की जगह पर दूसरों को स्थापित करने में लगाओ।

घ) बुद्धि को दूसरों के हार्दिक स्वप्नों की पूर्ति के लिए लगाओ।

ङ) बुद्धि को अपने मन का चाकर न बनाओ। अपना तनत्व भाव छोड़ने के लिए बुद्धि इस्तेमाल करो

च) अपनी बुद्धि के बल पर ही आप लोगों को मूर्ख कहते हैं, यह बुद्धि अहंकार छोड़ दो।

छ) अपनी बुद्धि में भगवान के प्रति पूजा भाव उत्पन्न करो।

ज) औरों के दु:ख हरने के लिए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करो।

झ) औरों की विजय के लिए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करो।

ञ) औरों के बचाव के लिए अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करो।

ट) आपकी बुद्धि की किसी की बुद्धि से टक्कर नहीं होनी चाहिये।

यदि सब भगवान रूप हैं तो आपकी बुद्धि उन्हीं के काम आएगी। परम स्थित या स्वरूप स्थित की बुद्धि तो लोग इस्तेमाल करते हैं, साधक अपनी बुद्धि सहित, अपना तन दान करते हैं।

ठ) जब आपने अपना तन निष्काम भाव से विश्व रूप भगवान को दे ही दिया, तो उसे अपनी बुद्धि के सहित दो।

ड) जब तन दूसरे के कार्य निष्काम भाव से करने लगेगा तो आपकी बुद्धि दूसरों की चाहनाओं और स्वप्नों के अधीन हो जाएगी।

ढ) साधक आपकी बुद्धि को अपने बचाव के लिए इस्तेमाल नहीं करते। बुद्धि का दान किये बिना तनत्व भाव का अभाव असम्भव है। बुद्धि का दान दिये बिना देहात्म बुद्धि का नाश नहीं हो सकता।

इस कारण भगवान यहाँ कह रहे हैं कि ‘मुझमें बुद्धि लगा, फिर तू निरन्तर मुझमें ही वास करेगा, इसमें कोई संशय नहीं हैं।’

नन्हीं! बुद्धि का इस्तेमाल करना बन्द नहीं करना। बुद्धि तो और भी चतुर और दक्ष हो जायेगी, जब आप

1. औरों के वकील बनेंगे।

2. औरों के कर्म सफल करवाने में लग जायेंगे।

3. औरों के स्वप्न पूरे करने के ढंग पर विचार करने लग जायेंगे।

अभी तक आपकी बुद्धि आपके रुचिकर विषयों पर ही सोचती रही है, जब बुद्धि अर्पण करोगे तो आपको अरुचिकर विषयों पर भी ध्यान लगाना पड़ेगा। जो आप अपने लिए कभी नहीं करते, वह आप दूसरों के लिए कर दोगे।

आप अपने लिए चाहे धन कभी न कमाते, पर दूसरों के लिए कमा दोगे। आप अपनी स्थापना के लिए चाहे कुछ न करते, किन्तु दूसरों को स्थापित कर दोगे।

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