Chapter 12 Shlokas 6, 7

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परा: ।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ।।६।।

तेषामहं समुद्धर्त्ता मृत्युसंसारसागरात् ।

भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ।।७।।

They who offer all actions unto Me

and are devoted to Me; who are unswervingly

united with Me and meditate upon Me alone,

I speedily redeem those whose mind is thus fixed in Me

from this world which is but an ocean of death.

Chapter 12 Shlokas 6, 7

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परा: ।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ।।६।।

तेषामहं समुद्धर्त्ता मृत्युसंसारसागरात् ।

भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ।।७।।

The Lord says, “Listen Arjuna!”

They who offer all actions unto Me and are devoted to Me; who are unswervingly united with Me and meditate upon Me alone, I speedily redeem those whose mind is thus fixed in Me from this world which is but an ocean of death.

The state of the unwavering devotee striving to become an Atmavaan

The Lord says:

1. Those who are devoted to Me and offer all their actions in the service of My cosmic, universal form;

2. Those who, having sought refuge in Me, interact within My universal sphere, using My qualities;

3. Those who remain ever immersed in Me and perceive Me in all beings;

4. Those who perform all actions in My refuge;

5. Those who partake of My qualities and nourish and sustain those very attributes;

6. Those who welcome me with salutations, in other words, who welcome My universal form;

7. Those who consider Me to be the most superior, even greater than their own ‘I’;

8. Those who embrace only Me in their ordinary lives;

9. Those who accept only Me in their day to day lives;

10. Those who dedicate their every deed to Me;

11. Those who interact with all only in My Name;

12. Those who act only for My sake;

13. Those who utilise only My attributes in life and perform actions for the benefit of all;

14. Those who welcome Me and offer My qualities for the service of others; in other words, those who perform deeds as the Lord Himself would have done;

– such devotees deal only in Me.

a) They do everything without desiring anything for their own benefit.

b) They have no eye upon the fruits of actions.

c) Their actions are spontaneously selfless and without the stamp of their own name.

d) They are not attached to their deeds for they are ever immersed in My Name. Their mind is eternally concentrated on Me.

The Lord assures us, “I Myself am a witness to such a one; I dwell in his mind; I abide upon his lips, his hands are My hands, his feet My feet, his deeds My deeds.” The Lord then says, “I speedily emancipate such a one who is thus ever absorbed in Me, from the ocean of birth and death.”

Look Kamla, the path of true love is indeed unique.

The aspirant in love with Lord Ram
Dwells in duality;
All the negative qualities he possesses are his own;
All his excellence, he attributes to His Lord.

How can he offer those deeds to his Lord
Which he does not consider worthy of Him?
Yet all superior deeds that he performs
He regards as the Lord’s own!

Thus does he mentally divide all deeds,
Even as he performs them –
The noble deeds are apportioned to the Lord,
The imperfect actions are accepted as his own.

All this he does with Lord Ram as his witness;
Wherever he roams, his Lord goes with him.
Lord Ram is the director of his life,
Then how can any negativity remain?

He loves his Lord,
He converses with Him.
His Lord is ever present with him –
How can he ever be afraid?

Gradually, his love grows and he forgets even himself. No longer consciously aware of himself, it is as if, in the presence of the Lord, his body has been given to the world.

The milestones of sadhana

At first the Lord seems far away and the sadhak longs for union with Him. Gradually, the distance seems to decrease and the Lord seems more like his very own. Then one day there remains no distance between him and the Lord. The sadhak has forgotten his very self; and the world discovers the Lord Himself reincarnated in that devotee. The two become one.

My dear friend, listen! Understand once more the essence of exclusive devotion. What happens when the sadhak falls in love with his Lord?

Having taken the name of Lord Ram, his Lord becomes his witness in all that he does. Each action performed in the presence of his Lord is offered at His feet.

You could say he has given his very life to his Lord. His body, along with all its potential, is gifted to Him.

Each limb is coloured in the hues of his Lord Ram; his very life breath, too, belongs to his Lord. When every pore belongs to the Lord, then the body, too, is His. Of what significance is his own name when that too belongs to his Lord?

His hands, mind, intellect, body, everything belongs to his Beloved Lord. Why should he go elsewhere to search for His Lord when all that he sees is naught but his Lord?

When his body is the Lord’s, then who is calling out to whom? What can the Lord say to the Lord when duality is annihilated and only the Lord remains?

Little one, in this manner, that sadhak finds unison in the Lord’s Indivisible Essence. That Atma merges in Its own Essence.

Now understand this from the point of view of the Unmanifest.

1. The complete extermination of the body-based intellect takes place effortlessly in the worship of the Manifest Divinity.

2. Once he has given his every pore to the Lord, then even though the body performs all deeds, that exalted devotee is no longer aware of himself or his bodily needs.

3. He no longer claims the body as his own – it belongs to his Lord; therefore he ceases to repeat the name of his Lord – for one does not repeat one’s own name oneself!

4. His life is hued in the colours of his Lord.

5. He is then completely asleep towards his body, mind and intellect.

It could be said that:

a) He becomes the Eternal Unmanifest.

b) He becomes Eternal Silence.

c) He becomes one with that Indestructible Essence.

d) He is indivisibly united with that Indivisible Whole.

e) All that remains is the essence and the form of Adhyatam Itself – the nature of Brahm.

अध्याय १२

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परा: ।

अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ।।६।।

तेषामहं समुद्धर्त्ता मृत्युसंसारसागरात् ।

भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ।।७।।

भगवान कहते हैं, अर्जुन सुन!

शब्दार्थ :

१. जो सारे कर्म मुझमें अर्पित करके,

२. मेरे परायण हुए,

३. अनन्य योग से मुझको ध्याते हैं

४. और मेरी उपासना करते हैं,

५. उन मुझ में चित्त लगाए हुओं को मैं शीघ्र ही, 

६. मृत्यु रूप संसार सागर से तार देता हूँ।

तत्त्व विस्तार :  

आत्मवान् बनने के यत्न करते हुए अनन्य भक्त, साधक की स्थिति :

भगवान कहते हैं :

क) जो मेरे परायण होकर मेरे विश्व रूप पर सम्पूर्ण कर्म अर्पित करते हैं,

ख) जो मेरे शरणागत होकर मेरे गुणों से मेरे विश्व रूप में वर्तते हैं,

ग) जो मेरे में ही निरन्तर निमग्न रह कर सबमें मुझे ही देखते हैं,

घ) जो मेरे आश्रय में ही सब करते हैं,

ङ) जो मेरा ही उपभोग करते हैं, यानि मेरे ही गुणों का मानो उपभोग करके उन्हें और भी पुष्टित करते हैं,

च) जो मेरा सत्कार करते हैं, यानि मेरे विश्व रूप का सत्कार करते हैं,

छ) जो मुझे ही सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, यानि मुझे अपनी ‘मैं’ से श्रेष्ठ मानते हैं,

ज) जो मुझे ही अंगीकार करते हैं सहज जीवन में,

झ) जो मुझे ही स्वीकार करते हैं सहज जीवन में,

ञ) जो हर कर्म मुझ में ही अर्पित कर देते हैं,

ट) जो सम्पूर्ण व्यवहार मेरे नाम पर ही करते हैं,

ठ) जो मेरे लिए ही सब कर्म करते हैं,

ड) जो मेरे गुणों का अनुसरण करते हैं,

ढ) जो मेरे गुण जीवन में लाकर सब लोगों के हित में इस्तेमाल करते हैं,

ण) जो मेरे गुणों का अनुगमन करते हैं,

त) जो मेरे गुणों को औरों के लिए प्रस्तुत करते हैं,

यानि जो भगवान के समान सब कुछ करते हैं, भगवान कहते हैं वे तो मेरा ही इस्तेमाल करते हैं।

1. वे सब करके भी कुछ नहीं चाहते,

2. फल की बात का ध्यान ही नहीं रहता ऐसे लोगों को,

3. निष्काम कर्म वहाँ स्वत: होते हैं, जहाँ कर्ता का नाम ही न हो,

4. उसका कर्म से संग कभी नहीं होता, क्योंकि वह तो मेरे नाम में मग्न रहता है। निरन्तर उसका मन तो मुझमें ही लगा रहता है।

 भगवान आश्वासन देते हैं कि, ‘ऐसे का साक्षी मैं ही हूँ, ऐसे के मन में मैं ही हूँ, ऐसे के लब पे मैं ही बसता हूँ, ऐसे के कर मेरे ही कर होते हैं, ऐसे के चरण मेरे ही चरण हो जाते हैं, ऐसे के कर्म मेरे ही कर्म हो जाते हैं।’ भगवान कह रहे हैं कि ऐसे नित्य निमग्न को वह जल्द ही तार देते हैं। मृत्यु रूप संसार से वे तर जाते हैं।

देखो कमला! बात भी बिलकुल ठीक है। प्रेम का पथ ही कुछ निराला है।

साधक का राम से हुआ प्रेम,

एक से दो वह हो गये।

दुर्गुण उसका अपना रहा,

सद्गुण भगवान के हो गये।।

कर्म वह अर्पित कैसे करे,

जिसे श्रेष्ठ नहीं वह मानता।

जो अपने कर्म कुछ भले लगें,

भगवान कर्म उन्हें मानता।।

सब कर्म स्वयं वह कर कर के,

विभाजित करता रहता है।

सुन्दर औ’ श्रेष्ठ भगवान को दे,

न्यून कर्म अपनाता है।।

पर राम साक्षित्व में सब करे,

जित जाये राम वा संग चले।

अध्यक्ष राम भये जीवन में,

कुटिल कर्म कस कर सके?

भगवान से प्रेम उसका है,

भगवान से बातें करता है।

भगवान का साथ है नित्य वहाँ,

वह कब किसी से डरता है?

शनै: शनै: यह प्रेम और बढ़ जाता है, वह अपने आप को भूलने लगता है, वह अपनी सुध बुध खोने लगता है। उसका तन राम साक्षित्व में मानो जग का होने लगता है।

साधना के पड़ाव:

पहले प्रियतम थे दूर खड़े,

मिलन को जी तड़पता था।

फिर प्रियतम पास कुछ आने लगे,

कुछ अपने अपने लगने लगे।।

फिर :

वे अपना आप ही हो गये।

साधक अपने को भूल गया,

जग के लिए वहाँ राम रहे।

देख सखी सुन! अनन्य भक्ति सार को फिर से समझ ले। जब साधक का भगवान से प्रेम हो गया, तो क्या हुआ?

राम का उसने नाम लिया,

और साक्षी राम बना लिया।

वा साक्षित्व में कर्म किया,

और राम चरण में चढ़ा दिया।।

कहना है तो तुम कह लो,

जीवन दिया उस भगवान को।

शनै: शनै: अपना भी तन,

कर्म सहित दिया राम को।।

कहना है तो तुम कह लो,

जीवन दिया उस राम को।

अंग अंग वा राम रंगा,

प्राण भी दे दिये राम को।।

जब रोम रोम भया राम का,

तो तन भया भगवान का।

अपने नाम की बात गई,

वा नाम भया भगवान का।।

कर राम के मन राम का,

सर राम का तन राम का।

राम हेरन् क्या जायें,

जब दर्शन रहा बस राम का।।

किसको कौन पुकारे अब,

राम का ही तन रह गया।

राम राम से क्या कहे,

जब केवल राम ही रह गया।।

नन्हीं! इस विधि वह साधक भगवान के अखण्ड तत्त्व से एकरूपता पा लेता है; वह आत्म तत्त्व में विलीन हो जाता है।

अब इसे निराकार के दृष्टिकोण से समझ!

1. देहात्म बुद्धि का नितान्त अभाव साकार उपासना में सहज में हो जाता है।

2. भगवान को जब अपना रोम रोम दे दिया, तब, चाहे शरीर सब कुछ करता रहता है, किन्तु उस अनन्य भक्त को अपना देह अनुसंधान ही नहीं रहता।

3. जब वह अपना तन अपना न मान कर राम का मानने लग जाता है, तब राम राम कहना वह स्वत: बन्द कर देता है, क्योंकि अपना नाम स्वयं कौन लेता है?

4. तब उसका जीवन स्वत: ही राम मय हो जाता है।

5. तब वह पूर्ण रूप से अपने तन, मन, बुद्धि के प्रति सो जाता है। कहना है तो तुम कह लो कि,

क) वह नित्य निराकार हो जाता है।

ख) वह नित्य मौन स्वरूप हो जाता है।

ग) वह नित्य अक्षर में अक्षर हो जाता है।

घ) वह अखण्ड में अखण्डता पा जाता है।

ङ) वहाँ केवल अध्यात्म स्वरूप तथा रूप रह जाता है।

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