Chapter 10 Shloka 30

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां काल: कलयतामहम्।

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।।३०।।

I am Prahlad amongst the demons;

I am Kaal or time amongst that

which can be enumerated;

I am the lion amongst quadrupeds

and Garud amongst the birds.

Chapter 10 Shloka 30

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां काल: कलयतामहम्।

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।।३०।।

Little one, now the compassionate Lord takes the mortal Arjuna by the hand and helps him to gain strength of conviction in the Lord’s Omnipresence.

I am Prahlad amongst the demons; I am Kaal or time amongst that which can be enumerated; I am the lion amongst quadrupeds and Garud amongst the birds.

A.  The Lord proclaims that He is Prahlad amongst the demons.

Prahlad was the noblest amongst the demon race. He was a great devotee of the Lord; despite being surrounded and threatened by wicked demons, he held an unshakeable faith in the Lord.

B.  The Lord says that He is Kaal or time amongst that which can be enumerated.

1. I am Time that pervades the universe.

2. Years and centuries and auspicious moments – I constitute all these.

3. I am Time without beginning and without end.

4. I constitute each moment that can be counted.

C.  The Lord then says that amongst the quadrapeds He is the lion, the king of all animals.

The lion is considered to be the strongest and the most fearless of all four-legged creatures. The Lord identifies Himself with the lion.

D.  “I am Garud amongst the birds.”

1. Garud is Lord Vishnu’s vehicle.

2. Garud is known for his immense speed and his mild nature.

3. Garud is regarded as a great devotee of the Lord.

Look little one, the Lord is not only enumerating all His principle divine manifestations, He is also explaining His Omnipresence to the mortal soul. He is making us realise that all that is, is the Atma.

Warning to the spiritual aspirant

Little one, understand this carefully. Why is the Lord identifying Himself with the varied forms of living creatures and animals of the world? He is identifying with all the qualities found in the world. He is demonstrating His unity with all that exists – living and inert.

He is equating Himself with the serpents on one hand and with Lord Vishnu and Lord Shiva on the other. Thus that compassionate Lover of His devotees is Himself:

a) endeavouring to free Arjuna from the body idea;

b) explaining His non-dual essence to Arjuna;

c) proclaiming through His own words “I constitute all these attributes and all these beings.”

Maybe you too, will now accept the Lord’s words to be true!


1. The Lord, identifying with His supreme Essence, imparts this knowledge to Arjuna.

2. The Lord, established in the Atma, explains His state.

3. The Lord exhibits His entirety within the Whole.

4. Thus the Lord is helping the spiritual aspirant to establish himself in the essential unity of the Atma.

5. The Lord is thus trying His best to explain the truth of the Atma and its non-dual essence to His devotee in every possible manner.

6. The Lord Himself says, “I am all.” He repeats this again and again. Accept what He says and practice it in your life. Only then will you truly believe it to be the truth. If you can adopt what He says in your life, it will be proof of your belief.

Little one, do not dismiss the Lord’s words as repetition. Nor should you consider His words to be merely theoretical knowledge. All that the Lord is saying here, transcends the realm of mere words. He is focusing on the substratum of the world – the secret behind the Indestructible, Indivisible Truth. He is throwing light on the essence of the Supreme Atma.

Do not let words delude you. Understand the essence that underlies them. It matters not what one was or who one was, you must only remember that all is the Lord.

Cease to identify yourself with your body for just a few moments. Little one, if you regard yourself as the Atma and try to perceive the world through the Lord’s eyes, you will benefit tremendously. Just put yourself in His place and look at the world with His eyes. Just study His words and practice what the Lord says, even momentarily. If for even a moment you consider your body to be dead, and yourself to be the Atma, you might be able to accomplish what you aim for.

1. Know that all are one in the Atma; it is only the attributes and the gross form that differ.

2. The Atma is unchangeable – all body forms are subject to change.

3. Only the Atma has any meaning – gross forms have no meaning.

अध्याय १०

प्रह्लादश्चास्मि दैत्यानां काल: कलयतामहम्।

मृगाणां च मृगेन्द्रोऽहं वैनतेयश्च पक्षिणाम्।।३०।।

नन्हीं! अब करुणापूर्ण भगवान जीव अर्जुन को परमात्मा की सर्वव्यापकता का अभ्यास करवाते हुए आगे कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. दैत्यों में मैं प्रह्लाद हूँ,

२. गिनती करने वालों में मैं काल हूँ,

३. मृगों में मैं मृगेन्द्र हूँ

४. और पक्षियों में मैं गरुड़ हूँ।

तत्व विस्तार :

क) भगवान कहते हैं, दैत्यों में वह प्रह्लाद हैं।

दैत्य कुल में सर्व श्रेष्ठ प्रह्लाद, भगवान आप हैं। प्रह्लाद असुरों से घिरे हुए होने पर भी भगवान के महान् भक्त थे और भगवान में अटल निष्ठा रखते थे।

ख) गिनती करने वालों में भगवान कहते हैं वह काल हैं।

भगवान कहते हैं कि :

1. सृष्टि में समय मैं ही हूँ।

2. जो वर्ष, शताब्दी, मुहूर्त हैं, सब मैं ही हूँ।

3. अनादि और अनन्त काल मैं ही हूँ।

4. जिस भी घड़ी या पल की गणना करो, वह मैं ही हूँ।

ग) भगवान कहते हैं, पशुओं में मृगराज सिंह वह ही हैं।

सिंह, जो सबसे अधिक बलवान और सबसे निर्भय पशु है, वह भगवान ही हैं।

घ) भगवान कहते है “पक्षियों में मैं गरुड़ हूँ”।

गरुड़ :

1. गरुड़ भगवान विष्णु की सवारी माने जाते हैं।

2. गरुड़ तीव्र गति वाले और सौम्य माने जाते हैं।

3. गरुड़ भगवान के भक्त भी माने जाते हैं।

देख नन्हीं! भगवान यहाँ श्रेष्ठतम विभूतियों को अपना रूप कह रहे हैं, किन्तु साथ ही जीव को अपनी पूर्णता भी समझा रहे हैं। जो है, केवल आत्मा ही है, इसका अभ्यास करवा रहे हैं।

साधक को चेतावनी :

नन्हीं! ज़रा ध्यान से समझ! भगवान यहाँ अपने आपको क्यों संसार की अनेकों जाति वाले लोगों के और जन्तुओं के तद्‌रूप किये जा रहे हैं। वह अपने को संसार के अनेकों उत्पन्न हुए गुणों के तद्‌रूप किये जा रहे हैं। जड़ चेतन, सभी से वह अपना एकत्व दर्शा रहे हैं।

वह भयंकर विषपूर्ण सर्प और विष्णु और शिव, सबके साथ एकरूपता से तद्‍रूप हो रहे हैं। नन्हीं! यहाँ तो भक्त वत्सल भगवान स्वयं,

1. अर्जुन को तनत्व भाव से उठाने के प्रयत्न कर रहे हैं।

2. अर्जुन को अद्वैत तत्व समझाने के प्रयत्न कर रहे हैं।

3. अपने मुखारविन्द से कह रहे हैं कि, ‘ये सब गुण मैं ही हूँ और ये सब लोग मैं ही हूँ।’

शायद आप भी मान लें कि भगवान सच ही कहते हैं।

देख नन्हीं जान्!

क) भगवान स्वयं मानो ब्रह्म तत्व के तद्‍रूप होकर ज्ञान दे रहे हैं।

ख) भगवान स्वयं मानो आत्मा में स्थित होकर अपनी स्थिति बता रहे हैं।

ग) भगवान स्वयं पूर्ण में पूर्ण होकर अपनी पूर्णता दिखा रहे हैं।

घ) भगवान स्वयं साधक को आत्मा के एकत्व तत्व में स्थित होने का अभ्यास करवा रहे हैं।

ङ) ऐसे लगता है भगवान स्वयं इतनी मेहनत कर रहे हैं कि किसी तरह उनका भक्त आत्मा को समझ ले और आत्मा का अद्वैत तत्व समझ ले।

च) भगवान स्वयं कह रहे हैं ‘सब मैं ही हूँ’ और फिर इसे बार बार कह रहे हैं। सो जो वह कह रहे हैं, उसे मान ले और जीवन में साथ साथ इसका अभ्यास करती जा; तब ही तो भगवान की बात को मान सकोगी। यही तो भगवान की बात को मानने का प्रमाण भी होगा, यदि आप जीवन में उसे ला सकें।

नन्हीं! बार बार भगवान वही बात कह रहे हैं, यह समझ कर उकता न जाना और यहाँ पर शब्द ज्ञान पर ही न रह जाना। यहाँ जो वह कह रहे हैं, शब्दों से परे की बात है। वह तो इस सम्पूर्णसृष्टि के पीछे जो सूत्रधारी है, उसकी बात कह रहे हैं। वह तो अखण्ड अक्षर तत्व का राज़ सुझा रहे हैं। वह तो परमात्मा के तत्व का राज़ सुझा रहे हैं।

नन्हीं! शब्दों में मत भरमा, तत्व सार समझ। कोई कौन था या क्या था, इसका कोई फ़र्क नहीं पड़ता। सब ही भगवान हैं, इसका निहित तत्व समझ।

नन्हीं, यदि कुछ पल के लिए तू अपने आप को तन न समझ कर आत्मा मान ले और कल्पना में ही भगवान के दृष्टिकोण से संसार को देखने का प्रयत्न करे तो तुझे बहुत लाभ हो जायेगा। भगवान की आँखो में बैठ कर देख तो सही! आत्मा के तद्‌रूप  होकर भगवान की कथनी का भगवान के शब्दों के साथ साथ पल भर के लिए अभ्यास तो कर ले।

यदि तुम पल भर के लिए अपने तन को मृतक ही मान लो और अपने को आत्मा समझ लो, तब भी काम बन जाये।

1. आत्म रूप में सब एक हैं, गुण तथा स्थूल रूप फ़र्क हैं।

2. आत्मा अक्षर है, रूप परिवर्तनशील है।

3. आत्मा ही अर्थ रखता है, रूप कोई अर्थ नहीं रखता।

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