Chapter 13 Shloka 14

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।

असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।१४।।

That One empowers the attributes of all the senses,

(but in actual fact) is devoid of all sense faculties.

That One is devoid of attachment and all qualities.

(Despite this) That One is the sustainer and nourisher

of all and also the enjoyer of all attributes.

Chapter 13 Shloka 14

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।

असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।१४।।

Now Bhagwan elucidates on the manifest Brahm with attributes and the unmanifest Brahm and their essential unity.

That One empowers the attributes of all the senses, (but in actual fact) is devoid of all sense faculties. That One is devoid of attachment and all qualities. (Despite this) That One is the sustainer and nourisher of all and also the enjoyer of all attributes.

Little one, the Lord has just explained that He Himself comprises all the sense faculties. Now He says that He is the knower of all the objects of the senses – yet He is devoid of all sense faculties.

Understand this once again with the example of the dream witness. All sense faculties function with His authority. He Himself is the mainstay of those sense faculties. It is He who comprises all those faculties of sense within His Omnipresent Whole. However, that Atma is devoid of all the senses.

a) He is the Lord of the senses;

b) He constitutes all the senses;

c) He is the power behind all the senses;

– yet He is not those senses Himself.

He knows all those sense objects that the sense faculties partake of. Even though it is He who pervades all manifest forms, He is not in fact restricted to those forms. Just as there is naught but the dream witness in the dream, so also there is naught but the essence of That Brahm in this entirety. However, just as the dream world is nothing but the one who witnesses it and yet it remains only a dream, so also, even though this entire creation is pervaded by Brahm, it is not Brahm.

The Lord now says that, That One is devoid of attachment. Despite His detachment, it is He who sustains all. Despite the fact that He is devoid of attachment:

1. He creates the entire universe.

2. He sustains the entire universe.

3. He controls the universe.

4. He supports and upholds this entire creation.

5. It is He who nourishes this entirety.

6. He is the mainstay of all.

Little one, even though the Lord is the well-wisher of the humble and fulfils everyone’s tasks:

1. He seeks nothing from anyone.

2. He fulfils the desires of all without any expectations.

3. He seeks no fruits of any action whatsoever.

He fulfils the tasks of all beings irrespective of whether they accept or reject Him. No matter if those individuals pay any heed to Him, He gives them all. He is devoid of qualities, yet He is the enjoyer of all qualities, this means:

1. He transcends all qualities.

2. He is completely distant from all qualities.

3. He is uninfluenced by all qualities.

4. He is untouched by qualities.

Little one, without any qualities, yet possessing all qualities, He is the Master of all qualities and also their enjoyer.

The interplay of qualities takes place within His authority. He is the supreme witness of all, yet distant from and beyond all. When conjoined with Prakriti He enjoys all, yet in essence He is a non-participant.

Although that Brahm is equipped with all qualifying attributes, yet He is devoid of all attributes. The dream belongs to the dreamer, but the dreamer is not the dream. That dream witness is the mainstay of the dream, yet he is still not the dream. It would be sheer foolishness to attribute the characteristics of the dream participants to the dream witness. The dream witness is himself the support of the dream participant – from that point of view, he enjoys all the events of the dream. However, since that dream witness is not attached to the dream, he is ever a ‘non-enjoyer’.

अध्याय १३

सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।

असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च।।१४।।

भगवान यहाँ सगुण ब्रह्म और निर्गुण ब्रह्म की एकता का निरूपण कर रहे हैं और कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. उसमें सम्पूर्ण इन्द्रियों के गुणों का आभास है,

२. (परन्तु वह वास्तव में) सब इन्द्रियों से रहित है,

३. (तथा) आसक्ति रहित और निर्गुण है,

४. (ऐसा होते हुए भी), वह सबको धारण पोषण करने वाला

५. और गुणों को भोगने वाला है।

तत्त्व विस्तार :

नन्हूं! अभी भगवान ने कहा कि वह अखिल इन्द्रिय हैं। अब कह रहे हैं कि वह सब इन्द्रियों के विषयों को जानने वाले हैं किन्तु वह इन्द्रिय रहित हैं।

स्वप्न दृष्टा के दृष्टान्त से सम तुलना करके समझ कि सम्पूर्ण इन्द्रियाँ उन्हीं की सत्ता में काम करती हैं। इन्द्रियों का आधार वह आप ही हैं। उस पूर्ण की पूर्णता में अखिल इन्द्रिय भी वह आप ही हैं, किन्तु वह आत्मा, इन्द्रिय रहित है।

क)इन्द्रिय पति तो वह है,

ख)अखिल इन्द्रिय तो वह है,

ग)अखिल शक्ति तो वह है,

किन्तु इन्द्रिय वह आप नहीं है।

अखिल इन्द्रियाँ जिसे ग्रहण करती हैं, वह उस सबको जानता है। चाहे वह स्वयं ही अखिल रूप धरता है, किन्तु नन्हूं, वे रूप वह आप नहीं है। ज्यों स्वप्न में स्वप्न द्रष्टा के सिवा कुछ भी नहीं होता, त्यों संसार में ब्रह्म तत्त्व के सिवा कुछ भी नहीं होता। ज्यों स्वप्न संसार में सब कुछ स्वप्न दृष्टा होते हुए भी सब कुछ स्वप्न ही है, दृष्टा नहीं, त्यों ही संसार में सब कुछ ब्रह्म होते हुए भी संसार ब्रह्म नहीं है।

फिर भगवान कहते हैं कि वह असंग है यानि, संग रहित होते हुए भी सबका भरण कर्ता है। यानि, नित्य निरासक्त होते हुए भी वह :

1. पूर्ण सृष्टि की रचना करते हैं,

2. पूर्ण सृष्टि का पालन करते हैं,

3. पूर्ण सृष्टि का नियमन करते हैं,

4. पूर्ण सृष्टि को धारण करते हैं,

5. पूर्ण सृष्टि का ईषण करने वाले हैं,

6. पूर्ण सृष्टि का आधार भूत हैं।

नन्हीं! भगवान झुके हुए के सुहृद् और सबका काम करने वाले होते हुए भी,

क)किसी से कुछ नहीं चाहते।

ख)बिन प्रयोजन सब कुछ करते हैं।

ग)अपने किसी कर्म का भी फल नहीं चाहते।

जीव उन्हें अपनायें या ठुकरायें, वह फिर भी उनके काम करते हैं। जीव उन्हें ध्यायें या न ध्यायें, वह फिर भी उन्हें सब कुछ देते हैं। वह निर्गुण और अखिल गुण भोक्ता भी हैं, यानि:

1. वह गुणों से सर्वथा अतीत हैं।

2. वह गुणों से सर्वथा परे हैं।

3. वह गुणों से सर्वथा अप्रभावित हैं।

4. वह गुणों से सर्वथा निर्लिप्त हैं।

नन्हीं! वह नित्य निर्गुण होते हुए भी अखिल गुण पूर्ण हैं, अखिल पति भी हैं और अखिल गुण भोक्ता भी हैं।

नन्हीं! सम्पूर्ण गुणों का खिलवाड़ भी उसी में हो रहा है। ब्रह्म सबका साक्षी भी है, किन्तु सबसे सर्वथा अतीत भी है। प्रकृति के सम्बन्ध से वह अखिल भोक्ता भी है और नित्य अभोक्ता भी है।

नन्हीं! वह ब्रह्म अखिल उपाधियों युक्त होता हुआ भी, उपाधि रहित है। स्वप्न, स्वप्न दृष्टा का तो है, किन्तु स्वप्न दृष्टा स्वप्न नहीं है। स्वप्न का आधार स्वप्न दृष्टा तो है, किन्तु स्वप्न दृष्टा स्वप्न नहीं है। स्वप्न नट की उपाधियाँ स्वप्न दृष्टा पर आरोपित करना मूर्खता होगी। स्वप्न नट का आधार स्वप्न दृष्टा स्वयं है, इस नाते स्वप्न के सम्पूर्ण भोगों का भोक्ता वह स्वयं है, किन्तु स्वप्न से उसका संग न होने के कारण वह नित्य अभोक्ता है।

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