Chapter 15 Shloka 3, 4

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।

अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।३।।

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।

तमेव चाद्यं पुरूषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी।।४।।

This form (of the tree) is not visible, for it has no beginning, nor end, nor is its mainstay here. Cutting asunder its firmly entrenched roots with the formidable weapon of dispassion, one should earnestly seek that elevated state of dharma, reaching which one never returns. I seek the refuge of That Primal Purusha, from whom this ancient flow of creation has emanated.

Chapter 15 Shloka 3, 4

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।

अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।३।।

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।

तमेव चाद्यं पुरूषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी।।४।।

Elucidating on the tree of the universe, the Lord says:

This form (of the tree) is not visible, for it has no beginning, nor end, nor is its mainstay here. Cutting asunder its firmly entrenched roots with the formidable weapon of dispassion, one should earnestly seek that elevated state of dharma, reaching which one never returns. I seek the refuge of That Primal Purusha, from whom this ancient flow of creation has emanated.

Listen my dear one! Hear what the Lord has to say.

Eradication of attachment

He urges us, “Renounce attachment!” It is only the indomitable weapon of detachment that can cut asunder these fetters of the world.

a) It is attachment that distances us from our true essence.

b) It is attachment that is the root of ignorance.

c) After ridding oneself of attachment one must search for That Supreme One who is the source and origin of this entire creation.

Listen to what the Lord says! He says, “I too, seek the refuge of that Eternal Essence.”

Further, the Lord says that the sadhak must make every effort to know the Atma Self:

1. Endeavour to know that Supreme Essence.

2. Endeavour to travel on that path alone.

3. Only That One is worthy of attainment.

4. Only That One is worthy of being known.

5. Knowing Him, one no longer has to return to this worldly sphere.

6. Knowing Him, the bondage of the cycle of birth and death ceases to exist.

One cannot know the beginning of this creation nor its end.

a) Who can know what happened where and why?

b) Who is to know when which quality will attract one to whom and where?

c) Why did we meet? Why did we have to part? Who can answer all these questions?

d) What came before us – what lies ahead, who is to know?

It is so difficult to understand even a single individual – then how could one ever understand the cause of this entire worldly phenomenon? When it is so difficult to even know oneself, how could one ever understand the millions of other human beings in this world?

Thus the Lord explains:

1. It is qualities that interact with other qualities.

2. You must simply renounce attachment.

3. Perceive the world as an objective witness.

4. Travel through the world unattached and uninfluenced.

5. Do what Brahm Himself would have done and thus imbibe the qualities of divinity.

6. Brahm’s nature is Adhyatam. Adopt His divine nature as your own.

7. Seek only That One.

8. You must follow only His path.

Adhyatam is the nature of Brahm. To adopt His nature in one’s life is the practice of Adhyatam.

Look Kamla, the Lord advises us to forget all else. It is only the Supreme One who is worthy of attainment – make every effort to attain Him.

Little one, listen to what the Lord says next. He says that He too, seeks the refuge of that Ancient Purusha – the Supreme Essence; knowing this, the sadhak too must seek to attain that Supreme Essence. One must seek only That divine Essence, for only That One is worthy of being sought.

My little aspirant of the Atma, Abha! First understand the connotation of the Lord’s words “I Myself seek the refuge of that Ancient Purusha!”

That Ancient Purusha is:

1. The Kshetragya – the knower of the Kshetra.

2. The indestructible Atma.

3. The essence of that immutable Brahm.

4. The ever uninfluenced epitome of silence.

All else is inanimate.

a) Identifying Himself with that Divine Essence, the Lord has claimed all beings to be the Atma embodied.

b) He has thus dubbed this entire creation as Atma manifested.

The Lord is saying to Arjuna, “You too must do the same.” Little one, you too are the Atma in essence. You too are essentially blemishless. It is attachment which gives rise to ignorance. Renounce attachment.

अध्याय १५

न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा।

अश्वत्थमेनं सुविरूढमूलमसंगशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा।।३।।

ततः पदं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः।

तमेव चाद्यं पुरूषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी।।४।।

भगवान कहते हैं, देख!

शब्दार्थ :

१. इस (संसार वृक्ष) का यहाँ वैसा रूप नहीं पाया जाता है, (क्योंकि)

२. न (तो इसका) अन्त, न आदि, न आधार स्थान ही है।

३. इस जमी हुई जड़ वाले (संसार रूपी पीपल के) वृक्ष को,

४. दृढ़ असंग शस्त्र से काट कर,

५. फिर उस धर्म पद को अच्छी प्रकार ढूँढना चाहिये,

६. जहाँ पहुँचकर फिर वापस नहीं लौटते हैं।

७. उसी आदि पुरुष की मैं शरण लेता हूँ,

८. जिससे यह पुरातन प्रकृति फैली हुई है।

तत्त्व विस्तार :

सुन मेरी प्रिय! देख भगवान क्या कह रहे हैं!

संग अभाव :

वह कहते हैं, ‘संग छोड़ दे।’

दृढ़ असंग रूपा शस्त्र ही संग रूपा संसार बंधन को काट सकता है।

क) संग ही हमें स्वरूप से दूर करवाता है।

ख) संग ही अज्ञानता का कारण है।

ग) संग अभाव के पश्चात् उस परम को ढूँढ, जो पूर्ण सृष्टि का आदि कारण है।

सुन भगवान ने क्या कहा! वह कहते हैं, ‘मैं भी उस आदि तत्त्व की शरण में हूँ।’ भगवान कहते हैं कि साधक को आत्म तत्त्व जानने के यत्न करने चाहियें।

1. उसी परम तत्त्व को जानने के यत्न कर।

2. उसी पथ पर चलने के यत्न कर।

3. केवल वही प्राप्तव्य है।

4. केवल वही ज्ञातव्य है।

5. उसे जान कर पुन: जग में लौटना नहीं होता।

6. उसे जान कर पुन: जन्म मरण के चक्र का बंधन नहीं रहता।

इस संसार का न तो आदि और न अन्त ही जाना जा सकता है।

क) यहाँ कब क्या हुआ, क्यों हुआ, कौन जान सकता है?

ख) कौन गुण कब, कहाँ पर खेंच कर ले जाये, कौन जान सकता है?

ग) क्यों मिले, क्यों बिछुड़ गये, यह सब कौन जान सकता है?

घ) आगे पीछे क्या है, कौन जान सकता है?

भाई एक जीव को भी जानना इतना कठिन है तो इतने बड़े संसार को कौन जान सकता है?

अपने आप को ही जानना कठिन है, दूसरे करोड़ों जीवों को कौन जान सकता है?

इस कारण यहाँ भगवान समझा रहे हैं कि :

1. देख! गुण गुणों में वर्त रहे हैं।

2. तू संग छोड़ दे।

3. दृष्टा बन कर जहान को देख।

4. निसंग निर्लिप्त होकर जहान में विचरण कर।

5. वही कर, जो ब्रह्म करते हैं, तू भगवान के गुण अपना ले।

6. ब्रह्म स्वभाव ही अध्यात्म है, वह अपना स्वभाव बना ले।

7. केवल उसी को खोजना चाहिये।

8. केवल उसी के पथ का अनुसरण करना चाहिये।

अध्यात्म ब्रह्म का स्वभाव है। ब्रह्म के स्वभाव का अनुसरण ही अध्यात्म है।

देख कमला! भगवान यहाँ बस इतना ही कहते हैं, सब भूल जा, केवल परम ही प्राप्तव्य है, उसी को पाने के प्रयत्न कर।

नन्हूं देख! फिर भगवान क्या कह रहे हैं? वह कहते हैं कि उस आदि पुरुष यानि परम पद स्वरूप, परम आत्मा की शरण में भगवान स्वयं रहते हैं, ऐसा मान कर, साधक निरन्तर परम तत्त्व को पाने के प्रयत्न करे।

नन्हूं! केवल उस तत्त्व को खोजना चाहिये। केवल वह तत्त्व ही खोजने योग्य है। मेरी नन्हीं आत्म अभिलाषी, आत्म स्वरूपा आभा! ‘मैं स्वयं उस आदि पुरुष की शरण में रहता हूं,’ यह स्वयं भगवान ने कहा है। प्रथम इसे समझ!

वह आदि पुरुष ही,

क) क्षेत्रज्ञ है।

ख) अखण्ड आत्मा है।

ग) अखण्ड ब्रह्म स्वरूप है।

घ) नित्य निर्लिप्त, मौन स्वरूप हैं। बाक़ी सब जड़ है।

इसी तत्त्व के एक रूप होकर भगवान ने,

1. पूर्ण जीवों को आत्म स्वरूप कहा है।

2. पूर्ण सृष्टि को आत्म रूप कहा है।

भगवान अर्जुन से कह रहे हैं, ‘तू भी यही कर।’

नन्हीं! तू भी वास्तव में आत्मा ही है। तू भी वास्तव में नित्य निर्दोष है। केवल संग ही अज्ञानता है, इसे छोड़ दे।

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