Chapter 15 Shloka 18

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।१८।।

Now Bhagwan speaks about Himself:

Since I transcend the perishable matter

and surpass the imperishable soul,

I am renowned in the world

and in the Vedas as Purushottam.

Chapter 15 Shloka 18

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।१८।।

Now Bhagwan speaks about Himself:

Since I transcend the perishable matter and surpass the imperishable soul, I am renowned in the world and in the Vedas as Purushottam.

Little one, the Lord is speaking here about Himself. Remember:

a) One who has donned a body is speaking to an embodied soul.

b) A warrior is being addressed by his colleague and friend.

c) A seemingly ordinary person is speaking.

Hear what He says! “Since I transcend the perishable and since I surpass the imperishable, therefore I am known as Purushottam’ in this mortal world and in the Vedas.”

Understand this carefully little one!

1. The Lord is completely removed and far beyond the body idea.

2. There is no attachment with the body even in dreams.

3. There is no identification with the body even in dreams.

4. He is devoid of the intellect which is subjugated to the body.

5. He does not consider the body to be His.

6. He transcends both name and form.

7. He transcends the qualities of the body.

8. He completely transcends the aberrations of the mind and all other qualifications and attributes.

The Supreme Lord lies beyond even the jivatma which is an integral part of the Supreme and which cannot be destroyed at the time of death.

The Lord says that He is known as Purushottam even whilst he interacts in the world.

Little one, just as the state of the jivatma transcends the dream state as well as the state of deep sleep, so also, the Paramatma lies far beyond the states of imperishable consciousness as well as the perishable state. He is beyond description.

a) Everything exists there, yet nothing exists.

b) In that state, there is neither duality nor non-duality.

c) Such a One is neither this nor that. He simply is.

Little one, such a One is unborn yet He stands before us in embodied form. He is not subject to death – yet He appears as a mortal. The jivatma dwells with a living being, but here there is no mortal entity, then how can we speak of Him as the jivatma?

The embodied soul who stood before Arjuna was a divine and unique creation. Lord Krishna is the essence of Brahm – the epitome of knowledge.

1. He is the master of all attributes yet He is ever a gunatit for he is devoid of attributes Himself.

2. He is the indivisible, non-dual entity; He is the divine luminescence.

3. That Supreme Purusha – that One is the foremost of all Purushas, He is the Supreme Essence – Brahm Himself.

4. He is the indestructible and immutable that cannot be brought within the confines of thought.

5. He is unknowable, incomparable, unsurpassable and without limits.

Little one, therefore it is said that He transcends both the perishable embodied Purusha as well as the jivatma Purusha who is but a segment of the Supreme.

अध्याय १५

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः।

अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः।।१८।।

भगवान अब अपने विषय में बता रहे हैं।

शब्दार्थ :

१. क्योंकि मैं क्षर से अतीत हूँ,

२. और अक्षर से भी उत्तम हूँ,

३. इसलिये लोक में और वेद में,

४. मैं पुरुषोत्तम (नाम से) प्रसिद्ध हूँ।

तत्त्व विस्तार :

नन्हूं लाडली! यहाँ भगवान अपनी ही बात कर रहे हैं। ध्यान रहे!

– एक तन धारी, एक तनधारी से बातें कर रहा है।

– एक योद्धा से उसका साथी मित्र बातें कर रहा है।

– एक साधारण सा दिखने वाला जीव बातें कर रहा है।

और देख क्या कहते हैं! “क्योंकि मैं क्षर से अतीत हूँ और अक्षर से भी उत्तम हूँ, इस कारण जीव लोक में तथा वेद में मुझे पुरुषोत्तम नाम से पुकारते हैं।”

ध्यान से समझ नन्हीं जान्!

1. भगवान तनत्व भाव से सदा अतीत हैं।

2. वह स्वप्न में भी तन से संग नहीं करते।

3. वह स्वप्न में भी तन के तद्‍रूप नहीं होते।

4. उनके पास देहात्म बुद्धि होती ही नहीं।

5. वह अपने तन को अपना तन मानते ही नहीं।

6. वह तो नाम और रूप से सर्वथा अतीत होते हैं।

7. वह तो तन के गुणों से भी सर्वथा अतीत होते हैं।

8. वह तो मनो विकार तथा उपाधियों से भी सर्वथा अतीत होते हैं।

फिर जीवात्मा, जो परम का चेतन अंश है, मृत्यु इत्यादि से भी जिसका नाश नहीं होता, भगवान तो इससे भी परे हैं।

भगवान कहते हैं कि वह लोक में लोक व्यवहार करते हुए भी पुरुषोत्तम ही कहलाते हैं।

नन्हूं! ज्यों जीवात्मा सुषुप्ति तथा स्वप्न अवस्था से भिन्न है त्यों ही परमात्मा चेतन तथा क्षर से भिन्न है। इस परम पुरुष पुरुषोत्तम की स्थिति का कोई कैसे वर्णन करे?

वहाँ तो :

क) सब कुछ है भी और कुछ भी नहीं है।

ख) न एकत्व है, न द्वैत ही है।

ग) न ‘यह’ है और न ही ‘वह’ है, बस ‘है’।

नन्हूं! उनका तो जन्म ही नहीं होता, फिर भी वह तन धर कर सम्मुख खड़े हैं। जिनकी मृत्यु का सवाल ही नहीं उठता, वह मृत्यु धर्मा बन कर सम्मुख खड़े हैं। जीवात्मा तो जीव के साथ ही रह जाता है, वहाँ जीव ही नहीं, तो जीवात्मा कहाँ रहे?

जो तन अर्जुन के सम्मुख खड़ा था, वह तो एक दिव्य अलौकिक रचना थी। कृष्ण तो ब्रह्म स्वरूप ज्ञानघन आप हैं। वह तो,

1. अखिल गुण पति, नित्य गुणातीत, निर्गुण स्वरूप आप हैं।

2. अखण्ड, अद्वैत तत्त्व, दिव्य प्रकाश स्वरूप आप हैं।

3. परम पुरुष पुरुषोत्तम, परम तत्त्व, ब्रह्म स्वरूप आप हैं।

4. नित्य अविनाशी, अप्रमेय, अचिन्तय स्वरूप आप हैं।

5. अज्ञेय, अनुपम, अप्रतिम, असीम तत्त्व आप हैं।

नन्हूं! इस कारण वह प्राकृतिक, क्षर, तनो रूप पुरुष, तथा परमात्म अंश जीवात्म पुरुष, दोनों से उत्तम हैं, इनसे बहुत परे हैं।

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