Chapter 9 Shloka 1

श्री भगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।

ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१।।

The Lord says to Arjuna:

I shall elucidate that Supreme mystical knowledge

along with its practical experience to you,

who are devoid of a carping vision;

knowing it, you shall be free from all evil.

Chapter 9 Shloka 1

श्री भगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।

ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१।।

The Lord says to Arjuna:

I shall elucidate that Supreme mystical knowledge along with its practical experience to you, who are devoid of a carping vision; knowing it, you shall be free from all evil.

Little one, notice the Lord’s compassion towards His devotees! How lovingly He imparts knowledge of the Truth to eliminate the moha that has beset his friend who seeks refuge in his Lord! He explains to him the method whereby he can be established in the Atma Itself.

The Lord’s interaction with Arjuna

It seems as though the Lord is attempting to cajole Arjuna in many ways. He is trying to explain to him, beguile him and thus attract him in various ways towards his Essential Being. He is endeavouring to steal away Arjuna’s mind from him! He is unveiling His very Self before Arjuna in order to rid him of his moha.

Little one, the Lord is identifying with Arjuna and endowing him with that essential knowledge which will annihilate his enemies – ignorance, attachment and sorrow. The Lord is using every ploy to ensure that Arjuna does not flee the battle and turn away from his duty. The Lord then says, “Arjuna! I shall now give to you that extremely secret knowledge.”

The secret knowledge

a) That knowledge which is full of secret insights;

b) That knowledge which is hidden and cannot be seen;

c) That concealed knowledge which transcends words;

d) That knowledge which cannot be understood easily, because it connotes several different meanings.

The Lord says, “I shall impart to you, who are devoid of a fault finding vision, that mysterious knowledge along with its practical connotation. This knowledge is not easily understood. It is so deep that people cannot approach its fundamental essence. Several people believe that they understand it, but in actual fact, their understanding is a mere delusion. The Lord says “I shall impart to you the essence and the manifest connotation of this knowledge. I shall explain the internal state and the external deeds that characterise this knowledge, knowing which, you will be freed from all evil.”

The Lord addresses Arjuna as Ansooya’ in this shloka.

Ansooya (अनसूय) means:

1. To be devoid of a carping vision;

2. To be without hatred;

3. To be free of jealousy;

4. To be void of the tendency of fault finding and criticism.

a) Little one, Arjuna was completely devoid of a fault finding tendency even towards his revered Gurus and his Grandsire Bhishma. In fact he revered them and was ready to adjust his own concepts in order to prove them correct.

b) Arjuna did not criticise anybody.

c) He respected his elders and always obeyed their injunctions unquestioningly, with complete reverence.

d) In fact, his goodness lay in this attitude.

e) His greatness also lay in this attitude.

The complete absence of hatred and a generous attitude are imperative attributes of a sadhak.

In the absence of a critical attitude:

a) divine qualities can be sustained and nurtured;

b) a dutiful attitude can be nourished;

c) yagya can flourish.

अथ नवमोऽध्याय:

श्री भगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे।

ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्।।१।।

भगवान अर्जुन को कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. तुझ दोष दृष्टि रहित भक्त के लिये,

२. मैं इस परम गोपनीय ज्ञान को विज्ञान सहित कहूँगा,

३. जिसको जान कर तू अशुभ से मुक्त हो जायेगा।

तत्व विस्तार :

देख नन्हीं! भगवान की भक्त वात्सल्यता को देख! अपनी शरण में पड़े हुए मित्र को मोह से मुक्त करने के लिये कितने प्रेम से, तत्त्व ज्ञान तथा आत्म तत्त्व में स्थिति की विधि सुझा रहे हैं।

भगवान का अर्जुन से व्यवहार :

ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान विभिन्न विधियों से अर्जुन को मना रहे हैं, समझा रहे हैं, रिझा रहे हैं, अर्जुन को स्वरूप की ओर आकर्षित कर रहे हैं। वे विभिन्न विधि से अर्जुन के मन को उसी से चुरा रहे हैं। अर्जुन के मोह को हटाने के लिये वह अपना ही घूँघट उठा रहे हैं।

नन्हीं! अर्जुन के अज्ञान, मोह तथा क्षोभ रूपा वैरियों के दमन के लिये भगवान अर्जुन के तद्‍रूप होकर उसे ज्ञान दे रहे हैं ताकि वह इस पल युद्ध न छोड़ दे और अपने कर्तव्य से विमुख न हो जाये। फिर देख भगवान क्या कहते हैं, ‘अर्जुन! तुझे मैं अतीव गुह्यतम ज्ञान देता हूँ।’

गुह्यतम ज्ञान का अर्थ है,

क) जो रहस्यपूर्ण ज्ञान हो।

ख) जो गुप्त तथा अदृश्य ज्ञान हो।

ग) जो ज्ञान, शब्दों से परे ‘छिपा हुआ ज्ञान हो।’

घ) जो सहज में समझ न आने वाला ज्ञान हो, क्योंकि उसके अनेकों अर्थ लिये जा सकते हैं।

भगवान कहते हैं, ‘मैं तुझ अनसूय को, अर्थात् दोष दृष्टि से रहित को विज्ञान के सहित ज्ञान कहता हूँ। यह ज्ञान आसानी से समझ नहीं आता। यह इतना गुह्य है कि लोग इसके निहित तत्त्व तक पहुँच ही नहीं पाते। अनेकों यह मानने लग जाते हैं कि उन्हें यह समझ आ गया है, किन्तु वास्तव में उन्हें केवल भ्रान्ति हो जाती है कि वे उस ज्ञान को जान गये हैं।’ भगवान कहते हैं कि, ‘तुझे इस ज्ञान का स्वरूप तथा रूप दोनों ही कहूँगा’, यानि ‘ज्ञान विज्ञान पूर्ण जीव की आन्तरिक स्थिति तथा बाह्य जीवन का ज्ञान भी दूँगा, जिसे जान कर तू अशुभकर जीवन से तर जायेगा।’

भगवान ने अर्जुन को यहाँ ‘अनसूय’ कहा। नन्हीं! प्रथम इसका अर्थ समझ ले।

अनसूय का अर्थ है :

1. दोष दृष्टि से रहित होना।

2. घृणा से रहित होना।

3. ईर्ष्या से रहित होना।

4. निन्दा करने की वृत्ति से रहित होना।

क) नन्हीं जान्! अर्जुन तो अपने गुरुजन तथा पितामह के प्रति भी दोष दृष्टि से रहित थे, बल्कि उन्हें श्रेष्ठ मानते हुए अपने ज्ञान के अर्थ भी बदलने को तैयार थे।

ख) अर्जुन किसी की निन्दा नहीं करते थे।

ग) वह बड़ों का आदर करते थे तथा उनका आदेश वह सदा बिना सवाल तथा जवाब के शिरोधारण करते थे।

घ) वास्तव में इसी में तो उनकी साधुता निहित थी।

ङ) इसी में तो उनकी श्रेष्ठता निहित थी।

साधक के लिये द्वेष रहितता तथा उदारता अनिवार्य गुण हैं।

यदि दोष दृष्टि नहीं होगी,

क) तभी तो आप में दैवी गुण पल सकेंगे।

ख) तभी तो आप में कर्तव्य भाव पल सकेंगे।

ग) तब ही तो यज्ञ का जन्म हो सकेगा।

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