Chapter 7 Shloka 1

श्री भगवानुवाच

मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय:।

असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।१।।

Lord Krishna, explains further:

O Arjuna! Now hear how with mind engrossed in Me,

having taken refuge in Me,

engaged in Yoga and free from doubt,

you can know Me fully.

Chapter 7 Shloka 1

श्री भगवानुवाच

मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय:।

असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।१।।

Little one, that compassionate Lover of His devotees, Lord Krishna, explains further:

O Arjuna! Now hear how with mind engrossed in Me, having taken refuge in Me, engaged in Yoga and free from doubt, you can know Me fully.

The Lord’s Compassion

Little one, witness the Lord’s extreme compassion!

1. He is about to reveal Himself fully before His dear disciple.

2. He is about to disclose to His devotee, the truth about His essential core and His manifest form.

3. He will thus banish all doubts from his devotee’s mind.

The Lord says, “Now hear how you will know Me without doubt:

a) having fixed your mind in Me;

b) depending on Me alone;

c) and practising Yoga.”

Understand this little one, if your mind is fixed in the Lord and you have taken refuge in Him; if your mind contains the sole desire to become an Atmavaan; if you are constantly endeavouring for Yoga with your Atma Self, the Supreme Lord; if you are striving to make That Supreme Essence the very support of your life, you will easily understand the secrets that the Lord is about to reveal about His Essence and His Form.

Faith in the Lord

1. If you have not nurtured any faith in the Lord, it is not only difficult, but impossible to know the Lord.

2. If you have not developed a deep rooted confidence and trust in Him, you cannot comprehend what He says.

3. If you do not believe that you are the Atma, it is impossible to understand the difference between His essential core and His manifest form.

You must at least accept that whatever He says is the Truth.

Remember, it was even more difficult for Arjuna to understand what the Lord was explaining to him. The Lord stood before him as an ordinary person, yet He said that He was not the body but the Atma. And yet He began to explain with such great love, as if He were saying:

Arjuna!

a) You wish to unite with Me;

b) you wish to depend on Me;

c) you seek My refuge;

d) you wish to know Me.

Therefore it is imperative to understand Me first. Witness My true Self!

अथ सप्तमोऽध्याय:

श्री भगवानुवाच

मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय:।

असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु।।१।

देख नन्हीं! करुणापूर्ण, भक्त वत्सल, भगवान कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. हे अर्जुन! मेरे में आसक्त मन वाला,

२. मेरे परायण हुआ,

३. योग में जुड़ता हुआ (तू)

४. बिना संशय के, मुझको जैसे सम्पूर्ण जानेगा, उसे तू सुन।

तत्व विस्तार :

भगवान की करुणा :

देख नन्हीं! भगवान की करुणा पूर्णता देख !

1. वह अपने आपको अपने प्रिय भक्त के सामने निरावरण करने लगे हैं।

2. वह अपने भक्त को अपना ही स्वरूप तथा रूप दर्शाने लगे हैं।

3. वह अपने भक्त को अपने ही आत्म स्वरूप तथा रूप की वास्तविकता समझा कर उसके सन्देह का विमोचन करने लगे हैं।

भगवान कहने लगे हैं कि :

1. मुझ में चित्त लगाकर,

2. मेरे ही आश्रित हुआ,

3. और योग का अभ्यास करता हुआ,

4. जैसे तू मुझे सन्देह रहित होकर जानेगा, उसे सुन।

यह समझ ले नन्हीं! यदि तुम्हारा चित्त भी भगवान में लगा हुआ हो और तुम जीवन में भी भगवान का आश्रय लेती हो, यदि तुम्हारे मन में भी आत्मवान् बनने की एकमात्र चाहना हो, यदि तुम केवल आत्म स्वरूप भगवान से योग के अभ्यास में ही तत्पर रहती हो, यदि तुम भी हर पल भगवान के तत्व को अपने जीवन का आधार बनाना चाहती हो, तब जो भगवान अपना स्वरूप तथा रूप समझाने लगे हैं, उसे तू भी समझ जायेगी।

भगवान में श्रद्धा :

–   यदि तुझे भगवान में श्रद्धा ही नहीं हुई, तब उन्हें समझना कठिन ही नहीं, असम्भव है।

–   यदि तुम्हारी भगवान में दृढ़ निष्ठा ही नहीं हुई, तब उन्हें समझना कठिन ही नहीं, असम्भव है।

–   यदि तुम अभी इतना भी नहीं माने कि तुम आत्मा हो तो भगवान के इस स्वरूप तथा रूप को समझना नामुमकिन है।

कम से कम इतना तो मान लो कि भगवान जो कहते हैं, सत्य ही कहते हैं।

याद रहे, अर्जुन के लिये भगवान की बातों को समझना और भी कठिन था। भगवान एक साधारण तनधारी के समान सामने खड़े थे और कह रहे थे कि वह तन नहीं हैं बल्कि आत्मा है। फिर भी भगवान इतने प्रेम से उन्हें समझाने लगे, मानो वह कह रहे हों, कि अर्जुन!

1. तू मुझ से योग करना चाहता है, तो पहले मुझे समझ ले।

2. तू मेरे परायण होना चाहता है, तो पहले मुझे समझ ले।

3. तू मेरा आश्रय लेना चाहता है, तो पहले मुझे समझ ले।

4. यदि तू मुझे जानना चाहता है, तो ले देख कि मैं क्या हूँ?

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