Chapter 3 Shloka 1

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।

तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।१।।

Arjuna asks Bhagwan:

O Janardhana! If in Your opinion

knowledge is superior to action,

then O Keshava! Why do You engage me

in this terrible action?

Chapter 3 Shloka 1

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।

तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।१।।

 

Arjuna asks Bhagwan:

O Janardhana! If in Your opinion knowledge is superior to action, then O Keshava! Why do You engage me in this terrible action?

Arjuna says to the Lord, “O Janardhana!

1. You speak of the Atma.

2. You talk of the intellect.

3. You reveal the path of Yoga.

4. You speak of the control of the sense organs.

5. And then You bid me to take refuge in You.

6. You speak of the essential nature of the Atma.

7. You also advocate the elimination of the ego.

8. You speak of renunciation of attachment.

9. You encourage the attainment of equilibrium in pleasure and pain, victory and defeat.

10. You also specify that one’s mind should not be engrossed in the search of pleasure.

11.  You speak of those intellectual Munis who attain the state of immortality.

12. You also describe the state of one established in Samadhi.

13. You warn that one should not be overjoyed at the attainment of pleasure nor repel a distressing situation.

14. Then you clarify that one who has renounced all desires and the ego, and is devoid of the feeling of ‘I’ and ‘mine’, that one is an Atmavaan.

If You consider this knowledge to be of the highest importance, why do You repeatedly urge me to fight this terrible battle, the very imagination of which perturbs the mind?”

अथ तृतीयोsध्याय:

अर्जुन उवाच

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।

तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।१।।

अर्जुन भगवान से कहने लगे :

शब्दार्थ :

.  हे जनार्दन!

.  यदि कर्मों की अपेक्षा आप ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हो,

.  तो फिर हे केशव! मुझे इस भयंकर कर्म में क्यों लगाते हो?

तत्व विस्तार :

अर्जुन भगवान से कहने लगे कि हे जनार्दन!

क) आप मुझे आत्मा का ज्ञान देते हो;

ख) आप बुद्धि की बातें करते हो;

ग) आप योग की विधि बताते हो;

घ) आप इन्द्रिय संयम की बातें कहते हो;

ङ) फिर मुझे कहते हो कि मैं आपके परायण हो जाऊँ;

च) आप आत्म तत्व की बातें भी करते हो;

छ) आप अहं रहितता की बातें करते हो;

ज) आप संग त्याग की बातें करते हो;

झ) आप सुख दु:ख, जय पराजय में समत्व भाव की बातें भी करते हो;

ण) फिर, यह भी कहते हो कि भोगैश्वर्य में चित्त नहीं होना चाहिये;

ट) बुद्धियुक्त मनीषीगण अमृतपद को पाते हैं, यह भी आपने कहा;

ठ) फिर नित्य समाधिस्थ की बातें भी आपने बताईं;

ड) सुख दु:ख, शुभ अशुभ जो भी मिले, उसके प्रति न प्रसन्न होना चाहिये न द्वेष करना चाहिये, यह भी आपने कहा है;

ढ) फिर आपने कहा, जो सम्पूर्ण कामनाओं को और अहंकार को त्याग दे और ममत्व भाव रहित हो जाये, वह आत्मवान् हो जाता है।

आप यदि इस सब ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हो, तो फिर मुझे क्यों बार बार कहते हो कि मैं युद्ध करूँ? और वह भी इतना घोर तथा भयंकर कर्म, जिसे देख कर ही जी घबरा जाता है।

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