Chapter 13 Shloka 1

श्री भगवानुवाच

इदं  शरीरं  कौन्तेय  क्षेत्रमित्यभिधीयते।

एतद्यो वेत्ति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ  इति  तद्विद:।।१।।

Now the Lord is again elucidating on the knowledge of

the Atma and the anatma – that which is opposed to the Atma:

Arjuna! This body is said to be the kshetra

and he who knows it is called the kshetragya

by the knowers of the Truth.

Chapter 13 Shloka 1

श्री भगवानुवाच

इदं  शरीरं  कौन्तेय  क्षेत्रमित्यभिधीयते।

एतद्यो वेत्ति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ  इति  तद्विद:।।१।।

Now the Lord is again elucidating on the knowledge of the Atma and the anatma – that which is opposed to the Atma:

Arjuna! This body is said to be the kshetra and he who knows it is called the kshetragya by the knowers of the Truth.

Little one, the Lord had promised to explain the essence of the Truth to Arjuna in theory and practice. He begins with explaining about kshetra and kshetragya.

Kshetra (क्षेत्र)

Kshetragya (क्षेत्रज्ञ)

1. The body is the kshetra. 1. The one who knows the truth about this body is the kshetragya.
2. That which has originated from Apara Prakriti is the kshetra. 2. The jivatma – the embodied soul – is the kshetragya.
3. The mind, intellect, sense organs, the five elements and objects of senses are together all called the kshetra. 3. The knower of body, mind and intellect, senses and their objects is the kshetragya.
4. The physical level is called the kshetra. 4. The conscious Atma is the kshetragya.
5. That which is bound by qualities and which is comprised of qualities is the kshetra. 5. The attributeless gunatit – one who is unaffected by all attributes – is the kshetragya.
6. That which is ever changing is the kshetra. 6. That which is ever immutable and equipoised is kshetragya.
7. That which is destructible and mortal constitutes the kshetra. 7. That which is indestructible and immortal is the kshetragya.
8. The source of the seeds of all actions is the kshetra. 8. The kshetragya transcends all bondage of actions.
9. Prakriti is the kshetra. 9. The kshetragya is one who knows the essence of Prakriti.
10. The kshetra, on account of pertaining to the gross sphere, is blind. 10. The kshetragya is the Supreme Witness.
11. The kshetra is replete with aberrations. 11. The kshetragya is devoid of aberrations.
12. The kshetra is never satiated. 12. The kshetragya is one who is ever satiated.
13. The kshetra is the object of some sense perception. 13. The kshetragya is not an object of perception.
14. The kshetra is discernible by the sense organs and the mind. 14. The kshetragya is ever imperceptible.
15. The kshetra constitutes the anatma or that which is not Atma. 15. The kshetragya is the Atma.

The gross body is ever unsatiated

Little one, this bodily kshetra is ever thirsting for food, water and air until life lasts. When the life breath leaves the body, these very elements which once sustained the body, will re-assimilate the various elements of the body back into their fold. The kshetra, in order to exist, is dependent on some aspect or the other of the kshetra itself. The Atma does not require anything else for its existence. The Atmavaan transcends the arena of the kshetra. Such a one witnesses the body from afar. The body never gives up its duties. Bound by the qualities, it continuously interacts within the sphere of the qualities.

Little one, the identification of kshetra with kshetragya is the fulcrum of bondage. To believe them to be the same is ignorance. Only that knowledge which demonstrates their essential dissimilarity leads to salvation. The individual in bondage is fettered by the idea of doership as well as by the body idea. The emancipated individual is devoid of both these ideas.

The Lord says, “So it is said by knowers of the Truth.”

Who are these ‘Knowers of the Truth’?

a) Those who know the truth about Atma and anatma.

b) Those who know the essence of Prakriti and Purusha.

c) Those who comprehend the essential truth about the inert gross and the conscious.

d) Those who understand the essence of vidya, or knowledge that aids the progression of the aspirant on the spiritual path, and avidya, or knowledge of the material sphere.

e) Those who understand the difference between the Atma and the anatma.

अथ त्रयोदशोऽध्याय:

श्री भगवानुवाच

इदं  शरीरं  कौन्तेय  क्षेत्रमित्यभिधीयते।

एतद्यो वेत्ति तं प्राहु: क्षेत्रज्ञ  इति  तद्विद:।।१।।

अब भगवान अर्जुन को आत्मा तथा अनात्मा का ज्ञान फिर से देने लगे और कहने लगे,

शब्दार्थ :

१. अर्जुन! यह शरीर क्षेत्र है, ऐसा कहा जाता है,

२. जो इस क्षेत्र को जानता है,

३. उसे ‘यह क्षेत्रज्ञ है’ तत्त्ववेत्ता जन ऐसा कहते हैं।

तत्त्व विस्तार :

नन्हीं! भगवान ने कहा था कि, ‘मैं तुझे ज्ञान विज्ञान के सहित तत्त्व को समझाऊँगा।’ अब वह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विवेक दे रहे हैं।

क्षेत्र

क्षेत्रज्ञ

1. शरीर को क्षेत्र कहते हैं। 1. शरीर को जानने वाले को क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
2. अपरा प्रकृति की रचना को क्षेत्र कहते हैं। 2. जीवात्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
3. मन, बुद्धि, इन्द्रिय, पंच महाभूत तथा इन्द्रिय विषय मिल कर क्षेत्र कहलाते हैं। 3. इन सबको तत्त्व रूप से जानने वाले को क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
4. जड़ को क्षेत्र कहते हैं। 4. चेतन आत्मा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
5. क्षेत्र गुण बधित तथा गुणपूर्ण है। 5. निर्गुणिया गुणातीत क्षेत्रज्ञ है।
6. क्षेत्र नित्य परिवर्तनशील है। 6. क्षेत्रज्ञ नित्य सम तथा अपरिवर्तन शील है।
7. क्षेत्र क्षर तथा मृत्यु धर्मा है। 7. क्षेत्रज्ञ अक्षर तथा नित्य अमर है।
8. कर्म रूपा बीज की उत्पत्ति का स्थान क्षेत्र है। 8. क्षेत्रज्ञ कर्म बन्धन से नित्य अतीत है।
9. क्षेत्र प्रकृति को कहते हैं। 9. प्रकृति के तत्त्व को जानने वाले को क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
10. क्षेत्र जड़ होने के कारण अन्धा है। 10. परम दृष्टा को क्षेत्रज्ञ कहते हैं।
11. क्षेत्र विकार पूर्ण होता है। 11. क्षेत्रज्ञ निर्विकार होता है।
12. क्षेत्र नित्य अतृप्त ही होता है। 12. क्षेत्रज्ञ नित्य तृप्त को कहते हैं।
13. क्षेत्र किसी न किसी का विषय होता है। 13. क्षेत्रज्ञ किसी का भी विषय नहीं होता।
14. क्षेत्र, इन्द्रिय मन, बुद्धि गोचर है। 14. क्षेत्रज्ञ नित्य अगोचर है।
15. क्षेत्र अनात्म को कहते हैं। 15. क्षेत्रज्ञ आत्म को कहते हैं।

जड़ तन सदा अतृप्त :

नन्हीं! क्षेत्र रूपा तन जब तक जीवित है, वह अन्न के लिए, जल के लिए और वायु के लिए अतृप्त रहेगा ही। फिर जब तन को प्राण छोड़ जाएँगे, तो वही तत्त्व जो इस तन को पुष्टित रखते थे, पुन: तन के विभिन्न तत्वों को अपने में समा लेंगे। क्षेत्र को जीवित रहने के लिये क्षेत्र के ही किसी अंश की आवश्यकता होती है। आत्मा को किसी की भी ज़रूरत नहीं होती। आत्मवान् क्षेत्र से परे होता है। वह तन रूप क्षेत्र को भी मानो दूर से देखता है। तन अपना धर्म नहीं छोड़ता। वह तो गुण बंधा गुणों में वर्तता रहता है।

नन्हूं! क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ को अभेद जानना ही बन्धन कारक है। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ को एक मानना ही अज्ञान है। क्षेत्र क्षेत्रज्ञ के भेद का ज्ञान ही मुक्ति दिला सकता है। बन्धन की दशा में जीव कर्तृत्व तथा तनत्व भाव से बंधा होता है। मुक्त दशा में जीव में कर्तृत्व तथा तनत्व भाव का अभाव होता है।

भगवान ने कहा, “तत्त्व वेत्ता गण यह कहते हैं।”

तत्त्व वेत्ता कौन हैं?

तत्त्व वेत्ता गण वे होते हैं,

क) जो आत्म अनात्म के ज्ञान को तत्त्व से जानते हैं।

ख) जो प्रकृति तथा पुरुष के ज्ञान को तत्त्व से जानते हैं।

ग) जो जड़ तथा चेतन को तत्त्व से जानते हैं।

घ) जो विद्या और अविद्या के सार को जानते हैं।

ङ) जो आत्मा तथा अनात्मा के भेद को समझते हैं।

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