THE CLASSIFICATION OF THE THREE GUNAS

Chapter 12 Shloka 1

अर्जुन उवाच

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।

ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा: ।।१।।

Arjuna asks:

Who are the greater knowers of Yoga?

Those devotees who worship You

in constant unity with You, or those who

worship the Unmanifest, Imperishable Brahm?

THE CLASSIFICATION OF THE THREE GUNAS

Chapter 12 Shloka 1

अर्जुन उवाच

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।

ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा: ।।१।।

Arjuna asks:

Who are the greater knowers of Yoga? Those devotees who worship You in constant unity with You, or those who worship the Unmanifest, Imperishable Brahm?

Arjuna is seeking a clarification from Lord Krishna. “Who knows Yoga better – those who worship the Unmanifest, Eternal Brahm or those who worship You?”

Worship of the Indestructible Brahm

1. This constitutes the worship of the Supreme, Indestructible Brahm and of the Unmanifest Atma.

2. This is the worship of the One devoid of form – the worship of the Supreme Truth.

3. This is a constant practice towards eternal union with the Supreme Essence which cannot be brought within the confines of thought.

4. It is the worship of One who transcends all qualities.

5. It is the worship of One who is beyond our sense faculties.

6. It is the worship of the Divine Essence – of That which is hidden from view.

7. This is the worship of that Essence which is universal and without limit.

8. This is the worship of the Cosmic Manifestation of the Lord.

9. This is the worship of the Supreme Atma – the imperishable embodiment of Truth, Consciousness and Bliss.

10. This is the worship of the Supreme, Conscious Atma Essence.

Arjuna asks, “Tell me Lord, is this worship superior or is it preferable to worship You – the manifest Divine One? Is it preferable that:

a) we focus our thoughts constantly in Thee and thus worship Thee?

b) we seek only Thy company and glorify only Thee?

c) perceive only Thy form and keep Thee as our constant witness in all that we do?

d) make constant endeavours to understand Thee, enthralled by Thy life and deeds?

e) deify Thee and ever glorify Thee through Thy worship?

f) be attached only to Thee and this mind too, be immersed in Thee?

g) we witness naught but Thee, knowing that it is only Thee who abidest in our lives?

Is it preferable to affix our minds in the Unmanifest Atma or in Thy Manifest form? Which is a better method to delve into the depths of yoga?”

Little one, first review the worship of the Unmanifest, Indestructible One.

Through such worship, the sadhak:

a) endeavours to silence the mind;

b) endeavours to distance the sense faculties from their objects;

c) endeavours to renounce the world by calling it an illusion.

Also, it is the ultimate goal of every sadhak to merge in the Indestructible Essence. Therefore Arjuna’s question is but natural.

अथ द्वादशोऽध्याय:

अर्जुन उवाच

एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते।

ये चाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमा: ।।१।।

अर्जुन पूछते हैं भगवान से

शब्दार्थ :

१. जो निरन्तर युक्त हुए आपको उपासते हैं

२. और जो अव्यक्त अक्षर ब्रह्म को उपासते हैं,

३. उनमें से श्रेष्ठ योग वेत्ता कौन है?

तत्त्व विस्तार :

अर्जुन भगवान से अपने संशय के निवारण अर्थ पूछते हैं कि, अव्यक्त अक्षर ब्रह्म की उपासना करने वालों और आपका पूजन करने वालों में से कौन योग को अधिक जानता है?

अक्षर पूजन :

 1.यह परम अक्षर ब्रह्म और अव्यक्त आत्म तत्त्व का पूजन है,

2. यह निराकार, परम सत् का पूजन है,

3. यह अचिन्त्य स्वरूप से नित्य योग करने का अभ्यास है,

4. यह निर्गुण स्वरूप का पूजन है,

5. यह अतीन्द्रिय स्वरूप का पूजन है,

6. यह अलौकिक तत्त्व का पूजन है,

7. यह अप्रत्यक्ष, अप्रकट का पूजन है,

8. यह समष्टि रूप, असीम सत्त्व तत्त्व का पूजन है,

9. यह विराट स्वरूप तत्त्व का पूजन है,

10. यह परमात्म तत्त्व का पूजन है,

11. यह अविनाशी, सत् चित् आनन्द घन का पूजन है,

12. यह परम चेतन आत्म तत्त्व का पूजन है।

अर्जुन पूछते हैं, ‘कहो भगवान! यह पूजन श्रेष्ठ है या तुम्हारी साकार भक्ति श्रेष्ठ है?’ यानि :

क) ‘निरन्तर तुझमें ध्यान रहे और तुम्हारा पूजन करें।

ख) तेरा ही साथ रहे, तुम्हारा ही गुणगान करें।

ग) निरन्तर तेरा ही रूप देखा करें और तुम्हें ही साक्षी बना कर सब करें।

घ) निरन्तर तेरा ही जीवन प्रिय लगे और तुम्हें ही समझने का प्रयत्न करें।

ङ) मन तुझे मूर्तिमान करे और तुम्हारी ही नित्य आरती ले।

च) आसक्ति केवल तुझी से हो और तुझी में मन खो जाये।

छ) बस जीवन में इक तू ही हो, हर जगह तुम्हारे ही दर्शन हों।

भगवन्! तुम्हीं कहो क्या यह श्रेष्ठ है? निराकार आत्मा में ध्यान लगाना श्रेष्ठ है या तुम्हारे साकार रूप में ध्यान लगाना श्रेष्ठ है ? किस राही योग को अधिक जाना जा सकता है?’

नन्हीं! अव्यक्त, अक्षर पूजन के विषय में पुन: समझ ले :

अव्यक्त अक्षर पूजन में साधक गण,

क) मन को मौन करने के प्रयत्न करते हैं;

ख) इन्द्रियों को विषयों से दूर करने के प्रयत्न करते हैं;

ग) संसार को मिथ्या कह कर छोड़ देना चाहते हैं;

फिर हर साधक का अन्तिम लक्ष्य भी तो अक्षर तत्त्व में लय होना है। सो, अर्जुन का प्रश्न स्वाभाविक ही है।

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