Chapter 18 Shloka 62

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।६२।।

O Arjuna! Seek the refuge

of That Overlord with your whole heart.

By His grace you shall attain

supreme peace and the eternal abode.

Chapter 18 Shloka 62

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।६२।।

The Lord now advises Arjuna to seek the refuge of that Ishwar, that Lord of all.

O Arjuna! Seek the refuge of That Overlord with your whole heart. By His grace you shall attain supreme peace and the eternal abode.

My very own little one, Atma itself! The Lord says that because That Overlord dwells in every being, each one should:

a) seek refuge in Me – the Overlord Who is stationed in his heart;

b) seek the refuge of his own internal essence;

c) approach his own Self;

d) seek union with his own indwelling Atma.

Through the grace of his own Atma and through the grace and subsequent remission of his own egoity, such a one will attain the Supreme state and gain eternal peace.

Little one, actually each and every individual:

a) wants to become good and great;

b) wishes to perform virtuous deeds.

What does an individual seek?

1. An individual wishes to do something good.

2. Each one wishes to earn a good name.

3. He seeks recognition from the world.

4. He desires to leave behind the legacy of a good name.

5. He wishes to be known as noble.

6. He wishes to be known as generous.

7. He wants to be called forgiving and kind.

8. He wishes to be known as one who engages in virtuous deeds.

9. He wishes to be known as the noblest of all men.

10. He wishes to gain a reputation of trustworthiness and large heartedness.

11. He wishes to be known to have a shrewd intellect.

He never wishes to become evil or wicked.

The truth is that the Overlord Who abides in us, is in fact the Lord’s Supreme Energy. The Atma is our essence – it is purity itself.

All problems arise out of our attachment to the external plane. Our mistake lies in letting ourselves be influenced by the external sense objects.

Therefore the Lord says, O Jivatma! Seek the refuge of That Indwelling Overlord! Seek the refuge of the Atma that abides within you. Know yourself and be one with your Atma Essence. Unalloyed bliss lies herein. This is the path to the Truth – this is the route to the Supreme state.

If you seek the refuge of that Lord of maya and of the three attributes,

a) you will cease to constantly struggle with your innate disposition;

b) you will not fight the temperament endowed to you by Prakriti;

c) you will cease to fight against situations and circumstances.

If you truly believe that it is the Lord of maya, That Supreme Overlord Who alone is responsible for all your deeds, then your mind will renounce doership and progress towards silence.

Then you will attain the Supreme state with ease.

अध्याय १८

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।

तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।।६२।।

अब भगवान अर्जुन को उस ईश्वर के शरणापन्न होने को कहते हैं।

शब्दार्थ :

१. अर्जुन! सर्वभाव से,

२. उस ईश्वर की शरण में जा।

३. उसके प्रसाद से,

४. तू परम शान्ति को

५. और शाश्वत स्थान को प्राप्त होगा।

तत्त्व विस्तार :

मेरी अपनी नन्हूं! आत्म स्वरूपा! भगवान कहते हैं, क्योंकि हर प्राणी के आन्तर में ईश्वर वास करते हैं, हर प्राणी को चाहिये कि वह :

क) अपने ही हृदय में स्थित मुझ ईश्वर की शरण में जाये।

ख) अपने ही आन्तरिक स्वरूप की शरण में जाये।

ग) अपने ही आपके पास जाये।

घ) अपनी ही अन्तरात्मा की शरण में जाकर अपनी ही अन्तरात्मा से योग करे।

अपनी ही आत्मा के प्रसाद से, अपनी ही अहं कृपा से वह परम पद पा लेगा, परम शान्ति पा लेगा।

देख मेरी जान्! जीव वास्तव में :

– श्रेष्ठ बनना चाहता है।

– अच्छे काज ही करना चाहता है।

जीव क्या चाहता है?

जीव :

1. कुछ अच्छा करना चाहता है।

2. कुछ नाम कमाना चाहता है।

3. कुछ जग में मान चाहता है।

4. कुछ जग में नाम छोड़ कर जाना चाहता है।

5. श्रेष्ठ कहलाना चाहता है।

6. उदार कहलाना चाहता है।

7. दयावान् तथा क्षमाशील कहलाना चाहता है।

8. शुभ कर्म करने वाला कहलाना चाहता है।

9. पुरुषोत्तम कहलाना चाहता है।

10. विश्वास पात्र बनना चाहता है।

11. विशाल मनी कहलाना चाहता है।

12. तीक्ष्ण बुद्धि कहलाना चाहता है।

बुरा कोई भी नहीं बनना चाहता।

सच तो यह है कि हमारे अन्दर ईश्वर है, जो भगवान की शक्ति है। आत्मा हमारा स्वरूप ही है, जो पावन है। भूल तो केवल बाह्य से संग के कारण हो गई। भूल तो केवल बाह्य से प्रभावित होने के कारण हो गई। भूल तो केवल बाह्य की शरण में जाने से हो गई।

इसलिए भगवान कहते हैं, हे जीव! तू अपने ही आन्तर में स्थित ईश्वर की शरण में जा! अपने ही आन्तर में स्थित आत्मा की शरण में जा! अपने ही आप को जान ले, अपने ही आत्म स्वरूप में एक हो जा! इसी में आनन्द निहित है, इसी में सत् निहित है, इसी में परम पद निहित है।

अपने आन्तर स्थित मायापति तथा त्रैगुणपति ईश्वर की शरण में जायेगा तो :

1. अपने सहज गुण स्वभाव से भिड़ाव छूट जायेगा।

2. अपने प्राकृतिक स्वभाव से भिड़ाव छूट जायेगा।

3. तब तू परिस्थितियों से लड़ना बन्द कर देगा।

यदि तू यह मान लेगा कि यह माया पति ईश्वर ही तुमसे सब कुछ करवा रहे हैं तो तेरा मन भी अपने कर्तृत्व भाव को छोड़ कर मौन की ओर बढ़ जायेगा।

तब तू सहज ही परम पद को पा लेगा!

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