Chapter 18 Shloka 61

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रमयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया।।६१।।

O Arjuna!

The Lord, abiding in the heart of all,

through His power of illusion,

causes all living beings mounted upon

the vehicle of the body, to revolve.

Chapter 18 Shloka 61

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रमयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया।।६१।।

The Lord says to Arjuna:

O Arjuna! The Lord, abiding in the heart of all, through His power of illusion, causes all living beings mounted upon the vehicle of the body, to revolve.

The Lord abides in the hearts of all beings

It is the Lord seated within the core of all mortal beings Who whirls them through life. That Omniscient One abides in all. Each being:

a) is dependent on the power of That Lord of all;

b) is dependent on the Lord’s illusory maya comprised of the three attributes;

c) engages in action, bound by the attributes caused by the energy of That Lord of all;

d) does everything through the energy endowed by the Supreme.

Therefore the Lord says:

1. Whatever be your temperament or disposition, use it with dispassion.

2. Whatever may be your attributes, use them with a detached attitude.

3. Whatever be your temperament or attributes, use them selflessly.

–  This is your dharma.

–  This should be the mainstay of your life.

–  This is your life’s duty.

Develop and expand your capacities and attributes to the fullest. Nothing can be gained through the renunciation of your temperament or your attributes. In fact, it is not in your hands to renounce these – simply use your attributes and your innate nature fruitfully.

The Lord abides in all. Therefore man must:

a) endeavour to know himself;

b) try to understand his inner voice;

c) endeavour to understand the urgings and bidding of his attributes;

d) try to understand the language of his body-self.

Look little one, either a man becomes happy or unhappy when affected by external forces, or he remains unaffected by these, doing what he deems fit, and thus abides in bliss.

He who is unaffected by external factors:

–  is a gunatit;

–  abides in equanimity;

–  is established in yoga.

If the mind remains uninfluenced:

a) attachment to the external plane will cease;

b) there will be no attraction or repulsion as regards the external world;

c) one will not be influenced towards nivritti or restraint from action;

d) one will remain unaffected, regardless of whether one receives acclaim or abuse;

e) one will not desire escape from sorrow;

f) one will not be attached to joy.

Such a one will be a veritable renunciate or sanyasi. He will be ever established in the Truth. The actions of such a one, who has experienced union with the Supreme abiding within his heart, can only be virtuous and beneficial to all.

Little one, the Lord has said:

1. Your right is only to action. (Chp.2, shloka 47)

2. Man endeavours in accordance with his disposition. (Chp.3, shloka 33)

3. This entire universe endeavours within Me. (Chp.10, shloka 8)

4. Prakriti will compel you to engage in action. (Chp.18, shloka 54)

5. Bound by your temperament, you will be constrained to act. (Chp.18, shloka 60)

The Lord now says that the Supreme Master enforces all actions. A natural doubt arises within oneself – Who is it who initiates action? Is it the Lord? Is it one’s disposition? Or is it Prakriti? And how free is man to engage in the action of his choice?

Little one, when the Lord says, “Your right is only to action” He is speaking of actions born of Prakriti. Those actions are not instigated by greed, desire, attachment or hatred. The Lord then says, “Man cannot survive without action even for a moment. He performs deeds, bound as he is by Prakriti.” (Chp.3, shloka 5)

So little one, nowhere in the Gita is freedom of action discussed. In Chapter 3, shloka 6, the Lord has Himself stated, that he who reflects mentally upon sense objects and prevents his sense faculties from partaking of them, is verily a hypocrite.

Little one, one should consider the Lord, Prakriti and nature to be the same. It is sufficient to know that man is not free in action.

1. Therefore man should renounce attachment.

2. Man should forsake the ego.

3. Man should cease to desire the fruits of action.

4. Man should endeavour to know himself and should relinquish both attraction and repulsion.

5. Man should seek the refuge of the Lord.

Little one, if you must do something, engage in spiritual practice or sadhana. It is the mind that takes pride in doership. If the mind is silenced, one will cease to be fettered by actions. In fact, if the mind is silenced, then:

1. The world will become meaningless.

2. Man will abide eternally in bliss.

3. Man will be ever uninfluenced and untouched.

4. The knots of the mind will be cut asunder.

5. The triad of knower, knowledge and the known will be broken.

6. No thoughts, good or evil, will prevail.

7. Then the intellect which is subservient to the body will be annihilated.

8. Then one will unhesitatingly engage in whatever activity the situation one is confronted with demands.

9. There will be no question of restraining one’s body-self from engaging in action.

However, this mind, impelled by ego and attachment, endeavours time and again to restrain one from engaging in action. Then the natural attributes of that being compel him to be drawn towards his basic natural instincts. Man unnecessarily prides himself on being the doer and thus swings constantly between happiness and sorrow.

This is exactly what the Lord is saying here.

1. The individual, fettered by the three attributes of sattva, rajas and tamas, is impelled into action.

2. It is this Prakriti which impels him and sends him whirling around in this world.

3. All these attributes are basically silent.

4. These attributes so to say abide within the heart.

5. Nothing is in the control of the individual.

Everything is happening automatically and spontaneously.

अध्याय १८

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।

भ्रमयन्सर्वभूतानि यंत्रारूढानि मायया।।६१।।

भगवान कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. हे अर्जुन !

२. ईश्वर (शरीर रूप) यन्त्र में आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियों को,

३. अपनी माया से घुमाता हुआ,

४. सब भूतों के हृदय देश में स्थित है।

तत्त्व विस्तार :

प्राणी मात्र के हृदय में ईश्वर हैं।

प्राणी मात्र को उनके आन्तर में स्थित ईश्वर ही नाच नचाता है। सबका अन्तर्यामी ईश्वर सबमें स्थित है। हर जीव :

क) उस ईश्वर की शक्ति के आश्रित है।

ख) उस ईश्वर की त्रैगुणी माया के अधीन है।

ग) उस ईश्वर की शक्ति से गुण बधित हुआ कार्य करता है।

घ) उस ईश्वर की शक्ति से जीवन में सब कुछ करता है।

इसलिए भगवान कहते हैं:

1. जो भी, जैसा भी तेरा स्वभाव है, उसे निरासक्त होकर इस्तेमाल कर।

2. जो भी, जैसा भी तेरा गुण है, उसे निरासक्त होकर इस्तेमाल कर।

3. जो भी, जैसा भी तेरा स्वभाव या गुण है, उसे निष्काम भाव से इस्तेमाल कर।

– यही तेरा धर्म है।

– यही तेरा जीवन का आधार है।

– यही तेरा कर्तव्य है।

अपने गुणों का पूर्ण रूप से विकास कर। इस की विधि भी स्वभाव या गुण त्याग नहीं है। भाई! त्याग तो तू कर ही नहीं सकता, अपने गुण और स्वभाव का इस्तेमाल कर।

भगवान सबके आन्तर में स्थित हैं, तो जीव को चाहिए कि :

क) अपने आप को जानने के यत्न करे।

ख) अपने आन्तर की आवाज़ को समझने का यत्न करे।

ग) अपने गुणों की आवाज़ को समझने का प्रयत्न करे।

घ) अपने तन की आवाज़ को समझने का प्रयत्न करे।

 देख नन्हीं! जीव या बाह्य से प्रभावित होकर दुःखी सुखी होता है, या बाह्य से अप्रभावित रह कर जो उचित समझता है, वह करता हुआ आनन्द में रहता है।

बाह्य से अप्रभावित रहने वाला :

– गुणातीत होता है।

– समता में स्थित होता है।

– योग में स्थित होता है।

क्योंकि यदि मन अप्रभावित रहे तो :

1. बाह्य से संग नहीं रहेगा।

2. बाह्य से राग द्वेष नहीं रहेगा।

3. निवृत्ति से संग नहीं रहेगा।

4. मान मिले या अपमान मिले, वह अप्रभावित रहेगा।

5. दुःख से भागना नहीं चाहेगा।

6. सुख से राग उत्पन्न नहीं होगा।

ऐसा जीव नित्य संन्यासी होगा, नित्य सत्त्व स्थित होगा। ऐसा जीव अपने हृदय में स्थित ईश्वर से एकत्व पाकर जो भी करेगा, वह शुभ ही करेगा।

नन्हीं! भगवान ने कहा है,

क) तुम्हारा कर्मों पर अधिकार है। (2/47)

ख) जीव अपनी प्रकृति के अनुसार चेष्टा करता है। (3/33)

ग) मेरे से ही सब जगत चेष्टा करता है। (10/8)

घ) प्रकृति तेरे से ज़बरदस्ती कार्य करवा लेगी। (18/59)

ङ) स्वभाव के वश में हुआ परवश होकर कार्य करेगा। (18/60)

अब भगवान यहाँ कह रहे हैं कि ‘सम्पूर्ण कर्म ईश्वर करवाते हैं’ तो मन में संशय उठता है कि उन सबमें (ईश्वर, स्वभाव, प्रकृति) कौन है, जो कार्य करवाता है; और जीव अपने कर्म करने में कितना स्वतंत्र है?

नन्हीं! जब भगवान ने कहा, ‘तुम्हारा कर्मों पर अधिकार है,’ तब वह प्रकृति रचित कर्मों की बात कर रहे थे। वे कर्म लोभ, कामना, राग द्वेष से प्रेरित नहीं होते। फिर भगवान ने कहा कि, ‘जीव किसी भी क्षण बिना कर्म किये नहीं रहता, जीव प्रकृति के परवश हुआ कर्म करता है’ (3/5)। सो नन्हूं जान्! कर्मों की स्वतंत्रता गीता में कहीं भी नहीं कही गई है। अध्याय 3 श्लोक 6 में भगवान ने स्वयं कहा है, जो मन से विषयों का चिन्तन करता है और बाहर से इन्द्रियों को रोक लेता है, वह मिथ्याचारी होता है।

नन्हीं! ईश्वर, प्रकृति, या स्वभाव, एक ही बात माननी चाहिये। यहाँ इतना ही जान लेना ठीक है कि कर्मों में जीव स्वतंत्र नहीं है।

– जीव को संग छोड़ देना चाहिये।

– जीव को अहं छोड़ देना चाहिये।

– जीव को कर्म फल चाह छोड़ देनी चाहिये।

– जीव को अपने आप को जानने का प्रयत्न करना चाहिये और राग द्वेष छोड़ देने चाहियें।

– जीव को भगवान के शरणागत होना चाहिये।

नन्हूं जान्! आपने कुछ करना ही है, तो साधना करो। मन ही कर्तापन का गुमान करता है। यानि, मन मौन हो जाये तो आप कर्मों से बन्धायमान नहीं होंगे। वास्तव में यदि मन मौन हो जाये तो:

1. संसार निरर्थक हो जायेगा।

2. जीव नित्य आनन्द में रहेगा।

3. जीव नित्य अप्रभावित रहेगा।

4. चित्त जड़ ग्रन्थियाँ टूट जायेंगी।

5. त्रिपुटी भंजन स्वतः हो जायेगा।

6. जीव नित्य संकल्प विकल्प के रहित हो जायेगा।

7. तब देहात्म बुद्धि का भी नाश हो जायेगा।

8. तब जीव के सम्मुख जैसी भी परिस्थिति आयेगी, वह निस्संकोच कार्य प्रवृत्त हो जायेगा।

9. तब अपने तन को रोक लेने का प्रश्न ही नहीं उठेगा।

किन्तु यह मन, अहं और संग के कारण अपने आप को अनेक बार कार्य प्रवृत्ति से रोकने का प्रयत्न करता है। तब जीव के सहज गुण उसे विवश ही अपनी प्रकृति की ओर खींच लेते हैं। जीव नाहक ही कर्तापन का गुमान करता है और अपने आप को दुःखी सुखी कर लेता है।

भगवान यहाँ वास्तव में यही कह रहे हैं कि :

1. त्रैगुण से बन्धा हुआ जीव विवश कर्म करता है।

2. यह प्रकृति ही इसे घुमाती फिराती रहती है।

3. ये गुण मौन ही हैं।

4. ये गुण मानो हृदय में स्थित हैं।

5. जीव के बस में कुछ भी नहीं है।

सब कुछ स्वतः हो रहा है।

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