Chapter 18 Shloka 58

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।५८।।

Bhagwan says to Arjuna:

By affixing your mind in Me, 

you shall through My Grace 

remain untouched by dire difficulties.

And if on account of ego you do not pay heed

to My words, you will be destroyed.

Chapter 18 Shloka 58

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।५८।।

Bhagwan says to Arjuna:

By affixing your mind in Me, you shall through My Grace remain untouched by dire difficulties. And if on account of ego you do not pay heed to My words, you will be destroyed.

Look little one, the Lord says these words to that Arjuna:

a) who knew not where his duty lay;

b) who was gripped by moha;

c) from whose hands the Gandiva was dropping;

d) whose limbs were becoming lifeless;

e) whose head was dizzy with uncertainty;

f) for whom it was difficult even to stand;

g) who had forgotten his very nature of a warring Kshatriya.

Now understand why Arjuna had reached such a condition.

1. Such delusions occur within the mind and are also caused by the mind.

2. This duality occurs within the mind because of one’s intrinsic moha.

3. All these aberrations take place in the mind because of attachment and moha.

4. All these aberrations take place in the mind because of the instability of the intellect.

5. Instability of the intellect is caused by its affiliation and subservience to the body-self.

6. Instability of the intellect is the consequence of ignorance of the Truth.

7. Instability in the intellect is created when the individual becomes the servant of his body, mind and sense faculties.

8. For all the above reasons, that individual:

–  becomes greedy;

–  is enmeshed by desire;

–  becomes tyrannical;

–  is ready to snatch away another’s rights;

–  seeks only his own establishment;

–  wishes to live only for himself;

–  desires the safety only of his own desires and knowledge;

–  seeks to become individualistic;

–  indulges in criticism, telling tales, tyrannical behaviour etc. due to lack of intellect.

Actually such a one becomes a servitor of only his own body-self and thus becomes blind. If one places one’s intrinsic essence before one’s mind’s eye, then one’s eyes can open to the Truth. But the one who is blinded by attachment to the body becomes a veritable orphan because:

a) such a one works alone for his own establishment;

b) the intellect of such a one is devoid of any advancement, since such a one does not believe anyone else’s intellect to be superior to his own and consequently, he pays no attention to anyone’s advice;

c) when that individual begins to consider himself to be greater than any other, he is blinded by pride and vainglorious egoism.

Thus does such a one become a complete orphan and is left totally alone.

If one does not suffer from pride of one’s intellect, one will inevitably heed the advice of others; i.e. one will use others’ intellect as well. The intellect of such an aspirant will progress steadily from day to day. It will advance towards purity. It will continue to grow. Or else, an individual simply steals the thoughts of others for self aggrandisement but cannot fully understand them.

1. Therefore, the intellect of such a one cannot understand the Truth.

2. He cannot experience Truth.

3. He feels the necessity of pirating another’s knowledge.

4. He has to take pains to remember that knowledge.

5. He spreads half baked knowledge in the world.

The Lord says, “If you place your mind in Me, you can overcome the most terrible difficulties.”

1. Some difficulties are vanquished with the removal of pride of intellect.

2. Other difficulties can be severed in the process of offering one’s body-self to the Lord.

3. All other remaining difficulties will be vanquished with the voidance of the body idea. Because when one does not claim one’s body-self as one’s own, who remains to claim the difficulties that accrue to the body?

If you repose your mind in the Lord:

1. You shall verily become a gunatit, then the attributes will not distract you.

2. You will become replete with divine attributes; and the mind will then become purity itself.

3. Then that intellect shall become stable because your mind is reposed in equanimity.

4. Knowing the Supreme Essence, and abiding in That Divine Essence, you shall become an Atmavaan.

Then how can any other difficulty remain? You yourself will be the reliever of all difficulties. The Lord then says, “If you do not do as I say, your downfall and destruction is inevitable.”

Little one, for Arjuna, this downfall was inevitable because:

a) he would then not attain the kingdom he had set out to attain;

b) people would have ridiculed him;

c) people would have maligned him;

d) nobody would have ever trusted him again;

e) his courage would have been maligned;

f) those who were tired of Duryodhana’s tyrannical ways and looked to Arjuna with a renewed enthusiasm and hope, those very people would heap curses upon him.

However, Arjuna and the other Pandavas took great pride in their virtue. They took great pride in their goodness too. If they fell from their own esteem, how could they have ever lived in peace?

Little one,

1. Those who are sincere, are sincere to the Lord – therefore they are sincere to all others.

2. Those who love, love the Lord – thus they love everyone. If one is attached to one’s own body-self, demonic traits will inevitably emerge. If one is more attached to others, divine attributes will emerge. He who is attached to the Lord will inevitably become an Atmavaan.

अध्याय १८

मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।

अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि।।५८।।

भगवान कहने लगे अर्जुन से :

शब्दार्थ :

१. मुझमें चित्त लगाने वाला होकर, तू मेरे प्रसाद से भीषण संकटों से तर जायेगा।

२. और अगर अहंकार के कारण (मेरे वचनों को) नहीं सुनेगा,

३. तो नष्ट हो जायेगा।

तत्त्व विस्तार :

देख नन्हीं! भगवान उस अर्जुन से कह रहे हैं जो:

क) किंकर्तव्यविमूढ़ हुआ था।

ख) मोह ग्रसित हुआ था।

ग) जिसके हाथों से गाण्डीव गिर रहा था।

घ) जिसके अंग शिथिल पड़ गये थे।

ङ) जिसके सिर में चक्कर आने लगे थे।

च) जिसके लिए खड़ा होना भी मुश्किल हो गया था।

छ) जो अपना स्वभाव भी भूल गया था।

यह क्यों होता है समझ ले!

1. ये सब भ्रम मन में मन के ही कारण होते हैं।

2. ये सब द्वन्द्व मन में मोह के कारण ही होते हैं।

3. ये सब विकार मन में मोह और संग के कारण ही होते हैं।

4. ये सब विक्षेप मन में बुद्धि की अस्थिरता के कारण ही होते हैं।

5. बुद्धि की अस्थिरता देहात्म बुद्धि के कारण ही होती है।

6. बुद्धि में अस्थिरता सत्य को न जानने के कारण होती है।

7. बुद्धि में अस्थिरता तब होती है, जब जीव तन तथा इन्द्रियों का नौकर बन जाता है।

8. फिर इसी कारण जीव:

क) लोभी बन जाता है।

ख) कामना ग्रसित हो जाता है।

ग) अत्याचार करता है।

घ) दूसरे का हक़ छीन लेता है।

ङ) केवल अपनी स्थापति चाहता है।

च) केवल अपने लिए ही जीना चाहता है।

छ) केवल अपनी चाहना और ज्ञान को सुरक्षित रखना चाहता है।

ज) वह व्यक्तिगत होना चाहता है।

झ) निन्दा, चुग़ली, अत्याचार भी जीव बुद्धि हीनता के कारण ही करता है।

वास्तव में वह केवल अपने तन का नौकर बन जाता है और अन्धा हो जाता है। गर स्वरूप को सामने रख कर देखो तो आँखें खुलती हैं। वह केवल अन्धा ही नहीं, अनाथ भी हो जाता है; क्योंकि :

– वह अकेला ही अपनी स्थापति में लगा रहता है।

– उसकी बुद्धि भी विकास को नहीं पा सकती क्योंकि वह अपनी बुद्धि से श्रेष्ठ किसी को नहीं मानता और उसे किसी की बात का ध्यान ही नहीं रहता।

जब जीव अपने आपको श्रेष्ठ मानने लग जाता है तब वह दर्प और अभिमान से अन्धा हो जाता है। तब वह सच ही अनाथ हो जाता है और बिलकुल अकेला रह जाता है।

गर बुद्धि गुमान न रहे तब जीव अन्य लोगों की बुद्धियों की सलाह लेता है। यानि, अन्य बुद्धियों को भी इस्तेमाल करता है। उसकी बुद्धि का तब दिनोंदिन विकास होता है, तब जीव की अपनी बुद्धि पावन होने लगती है, तब जीव की अपनी बुद्धि बढ़ने लग जाती है। वरना जीव लोगों के विचार चोरी कर लेता है पर उन्हें समझ नहीं सकता।

इस कारण :

1. उसकी अपनी बुद्धि सत्य समझ नहीं पाती।

2. उसको अनुभव नहीं हो सकता।

3. उसे ज्ञान चुराना पड़ता है।

4. उसे ज्ञान याद रखना पड़ता है।

5. वह जहान में अधपके भाव फैलाता है।

अब भगवान कहते हैं, ‘यदि तू मुझमें चित्त धरेगा तो तू महा भीषण संकटों से तर जायेगा।’

क) कुछ संकट तो बुद्धि गुमान के चले जाने से कट जायेंगे।

ख) बाक़ी संकट अपने तन को भगवान को देते हुए कट जायेंगे।

ग) शेष संकट तनत्व भाव का अभाव होते ही कट जायेंगे। क्योंकि जब तन अपनाओगे नहीं, तो तनो संकट कौन अपनायेगा?

फिर भगवान में चित्त धरेगा तो :

1. तू गुणातीत हो जायेगा, तब गुण तुझे विचलित नहीं करेंगे।

2. तू दैवी सम्पदा सम्पन्न हो जायेगा, तब मन पावन हो जायेगा।

3. फिर प्रज्ञा स्थिर हो ही जायेगी, क्योंकि तू समचित्त हो ही जायेगा।

4. तत्पश्चात् परम का स्वरूप जानता हुआ अपने आप स्वरूप में स्थित होकर आत्मवान् हो जायेगा।

तब कोई संकट कहाँ रहेगा? संकट हरने वाला तू स्वयं हो जायेगा। आगे भगवान कहते हैं, ‘यदि तू यह नहीं करेगा, तो तेरा पतन हो जायेगा और तू नष्ट हो जायेगा।’

नन्हूं! पतन तो होगा ही जब :

क) उसे राज्य नहीं मिलेगा।

ख) लोग उसका मज़ाक बनायेंगे।

ग) लोग उस पर तोहमत लगायेंगे।

घ) लोग उसपर पुनः एतबार नहीं करेंगे।

ङ) वीरता पर कलंक लग जायेगा।

च) जो लोग दुर्योधन के अत्याचार से दुःखी हैं, जो आज तुझे एक उत्साह और उम्मीद से देख रहे हैं, वही तुझे आहें भरते हुए बद् असीस देंगे।

किन्तु नन्हूं! अर्जुन तथा अन्य पाण्डवों को अपने सतीत्व पर नाज़ था। अर्जुन तथा अन्य पाण्डवों को अपने साधुत्व पर नाज़ था। यदि वह अपनी ही आँखों से गिर गये तो उन्हें चैन कैसे मिलेगी?

नन्हीं!

– वफ़ा करने वाले वफ़ा भगवान से करते हैं, इस कारण सबसे वफ़ा करते हैं।

– प्रेम करने वाले प्रेम भगवान से करते हैं, इस कारण सबसे प्रेम करते हैं। संग यदि अपने तन से हो तो असुरत्व उत्पन्न होता है; यदि औरों से अधिक संग हो तो देवता बनता है; संग यदि भगवान से हो तो आत्मवान् बनता है।

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