Chapter 18 Shloka 50

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।

समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।।५०।।

O Arjuna, now hear from Me in brief,

how having attained perfection,

one can attain Brahm Who is

the pinnacle of knowledge.

Chapter 18 Shloka 50

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।

समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।।५०।।

The Lord now reveals how one can attain union with the Supreme with a detached intellect and a selfless attitude, whilst fulfilling one’s ordained duty and dharma.

O Arjuna, now hear from Me in brief, how having attained perfection, one can attain Brahm Who is the pinnacle of knowledge.

Now the Lord speaks of the state of perfection in selfless deeds.

1. He speaks of the attainment of Brahm.

2. He speaks of the method whereby one who abides in a state of samadhi or absorption in the Self, attains the Supreme state of abidance in Brahm.

3. He describes the means whereby one can reach the pinnacle of knowledge.

So far, He has said the following:

1. Follow your natural attributes.

2. Follow your natural temperament.

3. Follow your natural duty.

4. Follow your natural dharma.

He then states:

1. Having done so, surrender all your deeds to the Lord.

2. Do all this as a worship of the Supreme.

3. Do all this without attachment.

4. Do all this having rid yourself of desire.

5. Do all this with a detached intellect.

6. Do all this with a selfless attitude.

a) Your worship of the Supreme should be selfless in nature.

b) Your deeds should be devoid of selfish interest.

c) Your knowledge should be selfless in essence.

One can explain this in yet another way:

1. This body belongs to the Lord – offer it to Him.

2. This mind belongs to the Lord – offer it to Him.

3. This intellect belongs to the Lord – give to Him what is His.

This is true renunciation – sanyas. This is what gives rise to perfection in selfless deeds.

The Lord explains next, how, one who has attained that perfection in selfless deeds, now attains the Supreme Brahm. The One who abides in samadhi has already attained selflessness in action.

This is the third level of Om.

(For an elaboration of the four stages of Om, refer to the Mandukya Upanishad.)

अध्याय १८

सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे।

समासेनैव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्य या परा।।५०।।

अब भगवान बताते हैं कि अपना धर्म, अपना कर्तव्य निभाते हुए निरासक्त, निष्काम बुद्धि से भगवान को कैसे पाते हैं?

शब्दार्थ :

१. सिद्धि को प्राप्त हुआ,

२. जिस प्रकार ब्रह्म को प्राप्त होता है,

३. तथा जो ज्ञान की पराकाष्ठा है,

४. हे अर्जुन! वह भी मुझसे संक्षेप में सुन।

तत्त्व विस्तार :

अब भगवान नैष्कर्म सिद्धि में स्थिति की कहने लगे हैं। अर्थात,

क) ब्रह्म को प्राप्त होने के विषय में कहने लगे हैं।

ख) जिस प्रकार समाधिस्थ ब्राह्मी स्थिति को पाता है, कहने लगे हैं।

ग) ज्ञान की पराकाष्ठा तक कैसे पहुँचता है, कहने लगे हैं।

अभी तक उन्होंने कहा कि :

1. आप अपने सहज गुणों का अनुसरण करो।

2. आप अपने सहज स्वभाव का अनुसरण करो।

3. आप अपने सहज कर्तव्य का अनुसरण करो।

4. आप अपने सहज धर्म का अनुसरण करो।

फिर कहा :

5. यह सब करते हुए कर्मों को परमात्मा पर अर्पित करो।

6. यह सब परम पूजन जान कर करो।

7. यह सब संग रहित होकर करो।

8. यह सब कामना रहित होकर करो।

9. यह सब निरासक्त बुद्धि से करो।

10. यह सब निष्काम भाव से करो।

यानि,

– आपकी पूजा निष्काम होनी चाहिये।

– आपके कर्म निष्काम होने चाहियें।

– आपका ज्ञान निष्काम होना चाहिये।

इसको दूसरे तरीके से कहें तो यूँ कहेंगे :

क) तन भगवान का है, उन्हें दे दो।

ख) मन भगवान का है उन्हें दे दो।

ग) बुद्धि भगवान की है, उन्हें दे दो।

यही संन्यास है। यही नैष्कर्म सिद्धि उत्पन्न करता है।

अब बताने लगे हैं कि नैष्कर्म सिद्धि पूर्ण जीव ब्रह्म को कैसे पाते हैं? समाधिस्थ नैष्कर्म सिद्धि पाए हुए होते हैं। यह ओम् का तीसरा पाद है। (ॐ के विस्तार के लिए माण्डूक्योपनिषद देखिये।)

Copyright © 2019, Arpana Trust
Site   designed  , developed   &   maintained   by   www.mindmyweb.com .
image01