Chapter 18 Shloka 44

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।४४।।

Farming, cow rearing and trade

are the natural activities of a Vaishya

and the natural activity of a Shudra

is the service of all.

Chapter 18 Shloka 44

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।४४।।

The Lord now describes the natural actions of the Shudras and the Vaishyas. He says:

Farming, cow rearing and trade are the natural activities of a Vaishya and the natural activity of a Shudra is the service of all.

Little one, the Lord now explains the activities of the Vaishyas and the Shudras, which stem from their natural dispositions.

The activities of a Vaishya

1. Grows grain for the whole world.

2. Produces physical comforts for all.

3. Produces medicines to keep the body strong and healthy.

4. Participates in industrial progress.

5. Does business.

6. Transports varied consumer items from one country to another.

7. To sell at a profit is his natural acumen.

8. Business men belong to the class of Vaishyas.

The Lord then specifies that this class of people also rear and protect the gau’.

Gau (गौ)

The widely prevalent meaning of the word gau is a cow. However, this word has many other connotations. Gau also means:

a) heaven,

b) earth,

c) the Goddess Saraswati,

d) mother,

e) speech,

f) Lord Indra’s thunderbolt,

g) a ray of light,

h) an arrow – a weapon.

Little one, understand from this that the natural dharmaof a Vaishya is not only to nurture his own family but to nourish and sustain all beings.

Vanijya (वाणिज्य) – Commerce

1. Trade,

2. Buying and selling,

3. To measure out,

4. Whatever is traded in the world, comes under the sphere of vanijya.

This natural tendency to earn wealth and nourish and sustain all with that wealth is innate in the Vaishya class.

Little one, one must remember, this class comprises of:

a) those who earn wealth and protect the Brahmins who lay the foundations of dharma;

b) those who endow wealth even upon the Kshatriyas who protect all;

c) those who give wealth even to the Shudras.

The Shudras

The natural tendency of the Shudras is:

a) to serve others;

b) to attend on others;

c) to make provision for the entertainment of others;

d) to follow others;

e) to aid in the fulfilment of others’ dreams;

f) to protect the physical being of the other;

g) to serve the sick;

h) to be of help to people of every class and community.

These Shudras are helpful in the programmes of every community and aid them in their every task.

Little one, actually each one possesses all these attributes. Individually everyone possesses some proportion of the tendencies of the four classes.

1. Each individual should be akin to a Brahmin intellectually.

2. Each individual should be akin to aKshatriya where the protection of his family is concerned.

3. Each individual is a Vaishya inasmuch as he earns for the sustenance of those who depend on him.

4. Each being is a Shudra insofar as he serves his kith and kin.

The dharma of the varied classes

1. On a universal scale, the Pandits, who are the creators of the constitution, should be uninfluenceable and free from the constant concern and greed for wealth to sustain their daily life.

2. The Kshatriyas should be the protectors of the nation and of the constitution and should not involve themselves in politics.

3. The Vaishyas – the business community should remain disengaged from matters concerning politics and the protection of the constitution.

4. The Shudras should be ever ready to serve all the other communities.

If true Brahmins draw up the constitution, that constitution will apply to all. They will make such laws:

a) which will protect all;

b) which will provide food and grain for all;

c) which will ensure that all receive the necessities of life.

They will be devoid of greed; justice will predominate in all their decisions. They will possess the state of a sthit pragya. They will not be swayed by desire and self interest. Their job will be to make the laws that will govern all beings.

The true Kshatriya will engage himself in the protection of the constitution. The police service and the army constitute the Kshatriyas. The administrative officers who protect the constitution also belong to this category.

The Shudras should be servitors of all and aid the culmination of each one’s tasks. The Vaishyas should be entrusted with the task of sustenance and nourishment of the aforesaid communities with their earned and accumulated wealth. The protection of the Vaishyas lies in the progress and well being of the other communities. They too, need the Brahmins and the Kshatriyas for their protection and security. They need the Shudras for success in their activities.

1. Therefore they have to share their wealth.

2. Therefore they must provide for the welfare of the other communities and classes.

All these classes are imperative for a smoothly running society. These four communities are to be found in every corner of the world – no matter what they are called. The Lord says here that the world is comprised of four sections:

1. The law makers;

2. Those who provide for ruling the land and who are the protectors of all;

3. Those who manage the economic organisation of the society;

4. The workers.

The beneficial interaction of these four communities and the correct use of their respective attributes can yield happiness to society; the same attributes, if misused, lead the society into regression and decline.

अध्याय १८

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम्।।४४।।

अब भगवान शूद्र और वैश्य लोगों के स्वाभाविक कर्म के विषय में कहते हैं कि:

शब्दार्थ :

१. खेती, गौ पालन तथा व्यापार,

२. वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं।

३. (और) सबकी सेवा करना ही शूद्र का स्वाभाविक कर्म है।

तत्त्व विस्तार :

नन्हूं! अब भगवान वैश्य तथा शूद्र लोगों के सहज स्वाभाविक कर्मों को विस्तार पूर्वक समझाते हैं।

वैश्य के कर्म :

वैश्य लोग पूर्ण संसार के लिए,

1. अन्न पैदा करते हैं।

2. शारीरिक सुविधायें उत्पन्न करते हैं।

3. तन पुष्टित रखने के लिए औषधि उत्पन्न करते हैं।

4. औद्योगिक विकास करते हैं।

5. व्यापार करते हैं।

6. विभिन्न इस्तेमाल की चीज़ों को देश देशान्तर में पहुँचाते हैं।

7. ख़रीद कर ऊपर के दामों पर चीज़ों को बेचना इनका स्वाभाविक कर्म है।

8. व्यापारी लोग वैश्य होते हैं।

भगवान कहते हैं कि गौ रक्षा यही लोग करते हैं।

गौ :

नन्हीं! सर्वप्रथम गौ का अर्थ समझ ले।

गौ धेनु को कहते हैं।

गौ का अर्थ :

क) स्वर्ग भी है।

ख) पृथ्वी भी है।

ग) सरस्वती भी है।

घ) माँ भी है।

ङ) वाणी भी है।

च) इन्द्र का वज्र भी है।

छ) प्रकाश की किरण भी है।

ज) तीर भी है यानि अस्त्र शस्त्र भी है।

इससे समझ ले नन्हीं कि धन को कमाने वाले वैश्य का स्वाभाविक धर्म है – केवल अपने कुल के व्यक्तियों का ही नहीं, बल्कि अन्य सभी का पालन करना।

वाणिज्य :

वाणिज्य,

1. व्यापार को कहते हैं।

2. क्रय विक्रय को कहते हैं।

3. तोल कर देने को भी कहते हैं।

4. संसार में जिसका भी सौदा किया जाये, उसे वाणिज्य कहते हैं।

यह सम्पूर्ण धन कमाने तथा सबका धन से पालन करने का धर्म वैश्य लोगों का स्वाभाविक गुण होता है।

नन्हूं! ध्यान रखना!

1. धन कमाने वाले, धर्म का उपार्जन करने वाले ब्राह्मण का संरक्षण करते हैं।

2. सबका संरक्षण करने वाले क्षत्रियों को भी धन देते हैं।

3. शूद्रों को भी धन देते हैं।

शूद्र गण :

शूद्रों का स्वभाव जन्य कर्म :

क) दूसरों की सेवा करना है।

ख) दूसरों की टहल करना है।

ग) दूसरों के मनोरंजन की व्यवस्था करना है।

घ) दूसरों के पीछे चलना है।

ङ) दूसरे के स्वप्न पूरे करने में सहयोग देना है।

च) दूसरों की नौकरी करना है।

छ) दूसरों की अंग रक्षा करना है।

ज) रोगियों की सेवा करना है।

झ) हर श्रेणी तथा वर्ग के लोगों की सहायता करना है।

ये शूद्र लोग हर वर्ण के कार्यक्रम में सहायक होते हैं और हर वर्ण के कार्यक्रम करने में उन्हें मदद देते हैं।

नन्हूं! वास्तव में ये सम्पूर्ण गुण सब में होते हैं, व्यक्तिगत रूप में चारों वर्णों के अंश प्रत्येक जीव में हैं।

– हर जीव को बुद्धि के स्तर पर ब्राह्मण होना चाहिए।

– हर जीव को कुल के लिये संरक्षक रूप में क्षत्रिय होना चाहिये।

– हर जीव कुल के लिए वैश्य भी होता है और कमाता है।

– कुल की सेवा करता है, तो वह शूद्र होता है।

वर्ण के धर्म :

क) संसार में समष्टिगत रूप में विधान रचयिता, पंडितगण को उदासीन होना चाहिये तथा अपनी दिनचर्या के लिए हर पल धन के लोभ में लिप्त नहीं होना चाहिये।

ख) क्षत्रिय लोगों को विधान तथा देश का संरक्षक होना चाहिए और राजनीति में नहीं पड़ना चाहिए।

ग) फिर व्यापारी गण तथा वैश्य गण को राजनीति तथा नीति संरक्षण में दख़ल नहीं देना चाहिए।

घ) शूद्र वर्ण को सभी वर्णों की सेवा करनी चाहिये।

ब्राह्मण के कर्म :

यदि ब्राह्मण विधान बनायेंगे तो सबके लिए बनायेंगे।

वे तो ऐसा विधान बनायेंगे,

1. जिसके राही सबका संरक्षण हो सके।

2. जिसके राही सबको अन्न मिल सके।

3. जिसके राही सबको जीवन की ज़रूरतें पहुँचाई जा सकें।

वे लोभी नहीं होंगे, वे तो न्याय प्रधान होंगे। वे स्थित प्रज्ञ होनें चाहियें, वे चाहना तथा रुचि प्रधान नहीं होनें चाहियें। उनका काम विधान बनाना है।

क्षत्रिय का काम विधान की रक्षा करना है। पुलिस और सेना क्षत्रिय होते हैं। एडमिनिस्ट्रेटिव अफ़सर भी क्षत्रिय होते हैं। उन्हें तो विधान का संरक्षण करना होता है।

शूद्र गण सम्पूर्ण लोगों के सेवक तथा इनकी कार्य सिद्धि में सहायक होते है। नन्हूं! इनका संरक्षण तथा पालन पोषण वैश्यगण के धन से होता है। वैश्यगण का संरक्षण इसी में है कि सम्पूर्ण लोग अपने अपने वर्ण में उन्नति पायें। इन्हें अपने बचाव के लिए भी ब्राह्मण और क्षत्रिय की आवश्यकता होती है।

इन्हें अपनी कार्य सिद्धि के लिए शूद्र की भी आवश्यकता होती है।

– इस कारण इन्हें अपना धन बांटना ही पड़ता है।

– इस कारण इन्हें अन्य वर्ण वालों के सुख का विधान करना ही चाहिये।

संसार में ये पूर्ण अंग अनिवार्य हैं। संसार में ये पूर्ण वर्ण हर जगह ही हैं, चाहे लोग इन्हें किसी भी नाम से पुकारें। यहाँ तो भगवान ने कहा है कि पूर्ण संसार के चार अंग हैं :

1. संविधान और कानून बनाना;

2. शासन का प्रबन्ध और लोगों व कानून की सुरक्षा;

3. आर्थिक व्यवस्था; तथा

4. श्रमिक।

संसार में इन सबका सहयोग और उचित प्रयोग ही सुख दिला सकता है वरना संसार प्रगति की ओर जाने की बजाय अवनति की ओर चला जाता है।

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