Chapter 18 Shloka 43

शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।४३।।

Valour, brilliance, a resolute determination,

shrewdness, a nature which does not flee from battle,

charity, the attitude of a master; all these attributes

are born from the nature of a Kshatriya.

Chapter 18 Shloka 43

शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।४३।।

The Lord now discusses the attributes that spontaneously spring from a Kshatriya’s disposition and the resultant actions.

Valour, brilliance, a resolute determination, shrewdness, a nature which does not flee from battle, charity, the attitude of a master; all these attributes are born from the nature of a Kshatriya.

Little one, now understand the actions of a Kshatriya which spring from his basic disposition.

Shaurya (शौर्य) – Valour

1. Courage is equivalent to shaurya.

2. To do battle justly, in accordance with the rules, is shaurya.

3. To face every situation with a just attitude is shaurya.

4. Immeasurable fearlessness and valour is shaurya.

5. Unlimited energy and prowess is shaurya.

Tej (तेज) – Effulgence

1. That one whose virtue is invincible is said to be full of effulgence.

2. That one whose powerful influence causes every negative trait to be crushed, is said to possess such effulgence.

3. One who is not influenced by another and thus diverted from doing his duty, is indeed full of effulgent energy.

4. A visionary possesses this spiritual effulgence.

5. An adherence to justice has an effulgence of its own.

(For a further elaboration on Tej, refer to Chp.16, shloka 3)

Dhriti (धृति) Resolute determination

1. A firm resolution is dhriti.

2. To retain one’s resolute forbearance for a sustained period of time isdhriti.

3. Dhriti connotes giving support to another.

4. Dhriti is patient endurance.

5. One who possesses the attributes of a Kshatriya has a special mental determination.

6. The mind’s resolve is dhriti.

(For an elaboration on Dhriti, refer to Chp.18, shloka 29 and Chp.16, shlokas 3, 5, 6)

Daakshyam (दक्षता) – Shrewdness

One who is:

a) extremely careful,

b) extremely clever,

c) worldly wise,

d) proficient in action,

e) alert,

f) thoughtful,

g) dextrous and skilful at work,

h) adept at many jobs,

i)  fearless in all situations,

– is said to be daksha.

Apalayanam (अपलायनकर) – To seek no escape from any situation

1. Such a one is devoid of the tendency to flee.

2. He faces all adversity with fortitude.

3. He does not run away from a difficult situation.

4. He does not wash his hands off a difficult task.

5. He does not shirk duty in order to win esteem.

6. He does not find ways to hide when adversity strikes.

7. He never withdraws his friendship.

8. He does not relinquish his loyalty to attain any advantage.

9. He does not maintain silence in order to be dubbed ‘good’, but is straightforward and true.

10. He does not wish to gain freedom from an unpleasant situation.

11. He does not seek to renounce the situation given to him by the Lord.

Daan (दान) – Charity

1. Such people are charitable by nature.

2. The Kshatriya gives of his body-self for the protection of the other.

3. The Kshatriya gives his body in charity for the protection of his nation.

4. Because of his innate protective attitude, he also gifts large quantities of wealth.

5. He is generous by nature.

6. He is compassionate.

7. He recognises the other’s pain.

Thus he gives varied types of charity.

Ishwar bhav (ईश्वर भाव) – Possessing the attitude of a liege

The Kshatriya possesses the qualities of sovereignty.

1. He is like a master.

2. It is his nature to rule.

3. He is a ruler and seeks dominion. These days, most people seek a kingdom to dominate over, but do not possess the attributes of a ruler.

4. Such a one rules over his subjects, but nurtures them like his progeny.

5. He enjoys comfort and gives others the capacity to earn their comforts and pleasures.

6. He is extremely strong and powerful.

7. He never relinquishes justice.

The Lord says, these are the natural deeds of a Kshatriya. He who possesses these qualities is verily a Kshatriya. He who does not possess these qualities but calls himself a Kshatriya is merely an impostor.

अध्याय १८

शौर्य तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।

दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम्।।४३।।

भगवान क्षत्रिय के स्वभाव जम गुण और उनके परिणाम रूप कर्मों के विषय में कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. शौर्य, तेज, धृति, दक्षता,

२. युद्ध से पलायन न करने का स्वभाव,

३. दान, स्वामिभाव,

४. ये सब क्षत्रिय के स्वभाव से पैदा हुए कर्म हैं।

तत्त्व विस्तार :

नन्हूं! क्षत्रिय के स्वभाव जम कर्म समझ ले!

शौर्य :

क) शूरवीरता को शौर्य कहते हैं।

ख) न्याययुक्त विधि से युद्ध करना शौर्य है।

ग) न्याययुक्त विधि से हर परिस्थिति का सामना करना शौर्य है।

घ) अनन्त निर्भयता और पराक्रम शौर्य है।

ङ) अनन्त वीर्य को शौर्य कहते हैं।

तेज :

(तेज के विस्तार के लिये 16/3 देखिये।)

1. तेजपूर्ण वह होता है जिसका सतीत्व कोई न झुका सके।

2. तेजपूर्ण वह होता है जिसकी शक्ति के प्रभाव से हर दुर्वृत्ति कुचली जाये।

3. तेजपूर्ण वह होता है जो किसी के प्रभाव से प्रभावित हेकर कर्तव्य से पलायन नहीं करता और अपना कर्तव्य नहीं छोड़ता।

4. देदीप्यमानता को तेज कहते हैं।

5. न्याय पूर्णता का अपना ही तेज होता है।

धृति :

(धृति के विस्तार के लिये 18/29, 16/31 देखिये।)

1. दृढ़ संकल्प को धृति कहते हैं।

2. धैर्य में दीर्घकाल तक स्थिर रहने को धृति कहते हैं।

3. दूसरे को सहारा देने को धृति कहते हैं।

4. सहिष्णुता को धृति कहते हैं।

5. क्षत्रिय गुण पूर्ण में मानसिक धृति भी होती है।

6. मनोधारणा को भी धृति कहते हैं।

दक्षता :

दक्ष वह होता है जो :

– अतीव सावधान हो।

– अतीव चतुर हो।

– अतीव सयाना हो।

– काज करने में योग्य हो।

– सुचेत हो।

– विचारवान् हो।

– निपुणता से काम करे।

– अतीव कार्य कुशल हो।

– परिस्थिति से घबराये नहीं।

अपलायनकर :

क) जो भागने वाली वृत्ति के रहित हों,

ख) जो मुश्किलों का सामना करते हैं,

ग) जो कठिन परिस्थिति से भागना नहीं चाहते,

घ) जो कठिन समस्या का परित्याग नहीं करते,

ङ) जो अपना मान बनाने के लिए कर्तव्य से च्युत नहीं होते,

च) जो आफ़त पड़ने पर छुपने के तरीके नहीं ढूँढते,

छ) जो कभी दोस्ती से पीछे नहीं हटते,

ज) जो अपना फ़ायदा न देख कर भी वफ़ा को नहीं छोड़ते,

झ) जो अपने आपको अच्छा बनाये रखने के लिए चुप नहीं रहते तथा सीधी बात कर देते हैं,

ञ) जिनमें छुटकारा पाने की भावना नहीं होती,

ट) जो अपनी परिस्थिति से विमुक्त नहीं होना चाहते,

वे अपलायनकर लोग होते हैं।

दान :

ये लोग,

1. महा दानशील होते हैं।

2. दूसरे के संरक्षण के लिये क्षत्रिय ने अपना तन ही दान दे दिया होता है।

3. देश के संरक्षण के लिए क्षत्रिय ने अपना तन ही दान दे दिया होता है।

4. संरक्षण कर वृत्ति होने के नाते वे धन का भी बहुत दान देते हैं।

5. ये उदार दिल वाले होते हैं।

6. करुणापूर्ण भी होते हैं।

7. लोगों के दर्द को पहचानने वाले होते हैं।

इस कारण दान देते हैं।

ईश्वर भाव युक्त :

क्षत्रिय प्रभुत्व भाव पूर्ण होते हैं। यानि,

क) मालिक के समान होते हैं।

ख) शासन करना इनका स्वभाव है।

ग) वे राजा भी हैं और राज्य भी चाहते हैं। आजकल अधिकांश लोग राज्य चाहते हैं, राजा नहीं बनते।

घ) यानि, प्रजा पर राज्य भी करते हैं, किन्तु पिता के समान पालन पोषण भी करते हैं।

ङ) स्वयं भी ऐश्वर्य पसन्द होते हैं, दूसरे को भी ऐश्वर्य पूर्ण होने की सामर्थ्य देते हैं।

च) महा शक्ति शाली होते हैं।

छ) न्याय कभी नहीं छोड़ते।

भगवान कहते हैं कि ये क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म होते हैं; यानि जिसके पास ये गुण हैं, वह क्षत्रिय ही है, अन्यथा वह नाहक अपने आपको क्षत्रिय कहता है, वह मिथ्याचारी ही है।

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