Chapter 18 Shloka 39

यदग्रे चानुबंधे च सुखं मोहनमात्मनः।

निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्।।३९।।

That happiness, which deludes

the individual in the beginning

and subsequently in its outcome,

and which arises from sleep, indolence

and lassitude, such happiness is tamsic.

Chapter 18 Shloka 39

यदग्रे चानुबंधे च सुखं मोहनमात्मनः।

निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्।।३९।।

Now the Lord describes tamsic happiness.

That happiness, which deludes the individual in the beginning and subsequently in its outcome, and which arises from sleep, indolence and lassitude, such happiness is tamsic.

My little one, now learn of the nature of tamsic happiness. One who abides in tamas:

a) dwells in the abysmal darkness of ignorance;

b) takes the support of false principles;

c) avoids involvement in action;

d) does not use his sense organs appropriately nor adequately;

e) deems that which is not his duty to be his duty;

f) considers the truth as falsehood and regards falsehood as the truth;

g) dubs the other as an illusion and considers himself to be the image of Brahm;

h) does not even consider the other to be a human being and deems himself to be godlike;

i)  has no consideration for the other’s mind and desires, yet considers himself to be highly intellectual;

j)  tries to justify his own lies as truth and the other’s truth as falsehood.

Such people are ever mired in the darkness of moha. They are intellectually sightless; they are both deaf and blind. This constitutes the lassitude of the tamsic individual.

1. Such people gain joy in the performance of lowly deeds.

2. They derive joy through escape from duty.

3. They deplete their own energies in wasteful activities.

4. They are oversensitive.

5. They threaten to leave on the minutest issue.

6. The smallest adversity can wipe the smile off their face.

7. They take affront at the smallest excuse.

8. Such people are ever perturbed.

9. They harbour innumerable grudges, real and imagined, against others.

10. They are ever immersed in mental remorse and depression.

11. They criticise others but cannot endure a word against themselves.

12. They ridicule others but cannot endure another’s ridicule.

13. Their humour is filled with sarcasm.

14. Their jokes are poisonous barbs.

15. Actually such people are cowards.

16. They consider themselves to be extremely strong.

17. They are devoid of intellect, yet they consider themselves to be intellectuals.

18. It is this attribute of tamas that makes them extremely stubborn.

19. Such people do not know how to give in to another – even if such arrogance leads to self destruction.

20. They are the epitome of wrath and animosity.

21. They are even capable of setting fire to their own home!

22. Dwelling in utter lethargy, they are immersed in delusionary convictions on account of which they remain ever unacquainted with reality.

Little one, they feel that their happiness lies in causing misery to others. They boast:

1. “I said this, I said that – I hurt him twice as much as he hurt me.”

2. “I really gave him such an earful, it was great fun!”

3. “I beat him up and straightened him out forever!”

These people retain their happiness as long as they bask in this attribute of tamas. This is the happiness of tamas.

Such people inflict pain and remain sorrowful themselves. They are unhappy but get peace only by troubling others. This is their trade – their business is to give sorrow.

अध्याय १८

यदग्रे चानुबंधे च सुखं मोहनमात्मनः।

निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्।।३९।।

अब भगवान तामस सुख की बात कहते हैं।

शब्दार्थ :

१. और जो सुख,

२. आरम्भ तथा परिणाम में भी जीवात्मा को मोहित करने वाला है,

३. तथा जो निद्रा, आलस और प्रमाद से उत्पन्न होता है,

४. वह तामस कहा गया है।

तत्त्व विस्तार :

मेरी नन्हीं जान्! अब तामस गुण से उत्पन्न हुआ सुख क्या करता है, यह समझ ले। ये तामस गुण वाले :

क) नित्य अज्ञान के अन्धेरे में रहते हैं।

ख) मिथ्या सिद्धान्तों का आसरा लेते हैं।

ग) अप्रवृत्ति का आसरा भी लेते हैं।

घ) इन्द्रियों को यथार्थ इस्तेमाल नहीं करते।

ङ) अकर्तव्य को कर्तव्य कहते हैं।

च) सत् को मिथ्या कहते हैं, मिथ्या को सत् कहते हैं।

छ) दूसरे को मिथ्या कहते हैं, अपने को ब्रह्म कहते हैं।

ज) दूसरे को इनसान भी नहीं मानते, अपने को भगवान समान मानते हैं।

झ) दूसरे के मन को देखते ही नहीं, अपने को बुद्धिमान् कहते हैं।

ञ) अपने झूठ को भी सत् कहते हैं, दूसरे के सत् को भी झूठ कहते हैं।

ये लोग मोह पूर्ण अन्धकार में पड़े रहते हैं। ये बुद्धि के अन्धे होते हैं। ये आँख और कान के भी अन्धे होते हैं। यही तमोगुणी का प्रमाद होता है।

1. ऐसे लोग नीच कर्मों में सुख पाते हैं।

2. ऐसे लोग कर्तव्य विमुखता में सुख पाते हैं।

3. ऐसे लोग अपनी ही शक्तियों को निर्बल बना देते हैं।

4. ऐसे लोग नाज़ुक मिजाज़ होते हैं।

5. ऐसे लोग छोटी छोटी बात पर बिछुड़ जाते हैं।

6. छोटी छोटी बात पर मुसकराना भूल जाते हैं।

7. ऐसे लोग नित्य विक्षिप्त रहते हैं।

8. ऐसे लोग औरों के प्रति अनेकों झूठे सच्चे गिले शिकवे रखते हैं।

9. ऐसे लोग नित्य मानसिक क्षोभ में प्रवृत्त रहते हैं।

10. ऐसे लोग दूसरों की निन्दा करते हैं, अपने प्रतिकूल कुछ नहीं सहते।

11. दूसरों का मज़ाक करते हैं, अपने प्रति मज़ाक नहीं सहते।

12. इन लोगों के परिहास में भी व्यंग भरा होता है।

13. इन लोगों के परिहास में भी विष भरा होता है।

14. वास्तव में ये लोग भीरु होते हैं।

15. ये लोग अपने आपको महा बलवान मानते हैं।

16. बुद्धि इन लोगों की गौण होती है, पर अपने आपको यह बुद्धिमान् मानते हैं।

17. ज़िद्दी भी यही गुण बनाता है।

18. झुकना तो ये जानते ही नहीं, चाहे ये स्वयं ही तबाह हो जायें।

19. क्रोध स्वरूप ये होते हैं।

20. अपने ही घर को ये स्वयं आग लगा देते हैं।

21. अपने ही प्रमाद के कारण मिथ्या मान्यताओं में पड़े हुए वास्तविकता से अनभिज्ञ रह जाते हैं।

नन्हीं! ये लोग दूसरे को दुःख देने में सुख मानते हैं। ये कहते हैं,

क) ‘मैंने उसे इतना सुनाया कि मज़ा आ गया।

ख) मैंने उसे मार मार कर सीधा कर दिया।

ग) मैंने यह कहा, मैंने वह कहा। उसने दुःख दिया तो मैंने भी उसे दुःख दिया।’

जब तमोगुण का नशा चढ़ा होता है, तब तक ही ये लोग सुखी होते हैं। यह तमोगुण का सुख है।

ऐसे लोग दुःख देते हैं और दु:खी रहते हैं। वे लोग दुःखी होते हैं, फिर भी दुःख देते हैं। इन्हें चैन भी दुःख देकर मिलता है, यानि ये दुःख के व्यापारी हैं।

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