Chapter 18 Shloka 35

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।

न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।३५।।

O Arjuna! That determination, with which

one with a perverted understanding

is unable to forego sleep, fear, worry,

sorrow and vanity, is called tamsic dhriti.

Chapter 18 Shloka 35

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।

न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।३५।।

The Lord now describes the state of one who possesses tamsic determination or dhriti.

O Arjuna! That determination, with which one with a perverted understanding is unable to forego sleep, fear, worry, sorrow and vanity, is called tamsic dhriti.

Little one, first understand the connotation of durmedha.

Durmedha (दुर्मेधा) – One with a perverted understanding

1. An evil intellect.

2. A perverted understanding.

3. An extremely impure intellect.

4. An intellect that augments corrupt tendencies.

5. An intellect that encourages tyrannical tendencies.

6. An intellect that is ever occupied in finding means of harming others.

The durmedha or evil intellect draws an individual into demonic tendencies.

Nidra (निद्रा) – Sleep

1. Such an intellect induces sleepiness in the individual.

2. It makes the individual inhabit a dream world.

3. It causes the individualto be seized by moha.

4. Such an intellect will not allow the individual to forget grievances and grudges.

5. Such an intellect brings forth from the individual an unending stream of criticism and blame.

6. Such an understanding prevents the individual from relinquishing mental agitation and disquiet.

All this transpires because the individual is asleep towards reality.

Bhaya (भय) – Fear

Bhaya also connotes anxiety, dread, anguish, apprehension, trembling with the anticipation of impending danger.

1. An individual always fears the loss of what he cherishes.

2. He fears meeting with what he considers unfavourable or not to his liking.

3. He is also afraid of what he perceives as adversity.

Fear is the natural outcome of not abiding in the truth.

1. At times, the fear of death causes great mental disturbance.

2. One fears the loss or deprivation of wealth.

3. One fears the loss of a dear one.

4. One fears coming face to face with what one finds undesirable.

5. The apprehension of loss of reputation causes fear.

6. The desire for physical security becomes the cause of anxiety and fear.

7. The possible inability to protect one’s honour causes fear.

8. The thought of the possibility of physical danger causes great fear in one’s mind.

Little one, such apprehensions, worries and delusions are the root of fear.

Shok (शोक) – Sorrow

1. The suffering of the mind is called sorrow.

2. Mental agony is sorrow.

3. Mental pain is sorrow.

4. Mental despondency is sorrow.

5. Mental anxiety is sorrow.

6. When the mind is deluded by worries, that mental state is sorrow.

Vishaad (विषाद) – Dejection

The gross manifestation of sorrow is vishaad.

1. Sadness that arises out of gross situations is vishaad.

2. Loss of enthusiasm and spirit in the face of gross adversity is vishaad.

3. Fatigue that arises out of gross situations is vishaad.

4. That state of numbness, despair and paralysis that arises on account of adverse circumstances is known as vishaad.

Madh (मद) – Drunken stupor

Intoxication, madness, egoity, mad desire, pride, all these constitute madh.

Little one, tamsic people are blinded in the intoxication of moha.

­­–  They are blinded with the intoxication of ego.

­­–  They are blinded by the intoxication of the body idea.

­­–  They ever abide in the drunken stupor of false pride and arrogance.

1. Such tamsic people possess a tamsic determination or dhriti.

2. Their determination is sheer stubbornness.

3. Their determination leads them away from their path of duty.

4. Their resolutions are contrary to scriptural injunction.

5. Their determination induces them to engage in actions contrary to dharma.

6. Such tamsic people with evil intellects may endure great adversity, but attain only sorrow as a consequence. Thus possessed of tamsic determination, such people are of no use to their kith and kin, nor to the world. While tormenting others, they also create much hardship for themselves.

The Lord specifies that such people possess a tamsic determination.

अध्याय १८

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च।

न विमुञ्चति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी।।३५।।

अब भगवान तामस धृति वालों का विवरण देते हुए कहने लगे कि :

शब्दार्थ :

१. हे अर्जुन! दुर्मेधा (दुष्ट बुद्धि वाला पुरुष)

२. धारणा शक्ति के द्वारा,

३. निद्रा, भय, चिन्ता और दुःख को,

४. (और) उन्मत्तता को नहीं त्यागता है, (अर्थात् धारण किये रहता है),

५. वह धृति तामसिक है।

तत्त्व विस्तार :

नन्हीं प्रिय! प्रथम दुर्मेधा को समझ ले!

दुर्मेधा :

क) दुष्ट बुद्धि को कहते हैं।

ख) मूढ़मति को कहते हैं।

ग) अत्यन्त मलिन बुद्धि को कहते हैं।

घ) भ्रष्टाचारी वृत्तियों का वर्धन करने वाली बुद्धि को कहते हैं।

ङ) अत्याचारी वृत्तियों का वर्धन करने वाली बुद्धि को कहते हैं।

च) औरों का अनिष्टकर वर्धन करने वाली बुद्धि को कहते हैं।

दुर्मेधा जीव को असुरत्व की ओर ले जाने वाली बुद्धि होती है।

निद्रा :

1. यह बुद्धि जीव में निद्रा उत्पन्न करने वाली होती है।

2. यह बुद्धि जीव को स्वप्न लोक में स्थिर करने वाली होती है।

3. इस बुद्धि के कारण जीव मोह ग्रसित हो जाता है।

4. इस बुद्धि के कारण जीव गिले शिकवे नहीं छोड़ सकता।

5. इस बुद्धि के कारण जीव औरों की नाहक निन्दा करता है।

6. इस बुद्धि के कारण जीव मनो संकल्प विकल्प नहीं छोड़ सकता।

ये सब बातें इस कारण होती हैं क्योंकि जीव वास्तविकता के प्रति सोया रहता है।

नन्हूँ! अब भय को यमझ ले!

भय :

– डर को कहते हैं।

– त्रास को कहते हैं।

– संकट को कहते हैं।

– ख़तरे को कहते हैं।

– थरथराने को भी कहते हैं।

नन्हूँ!

क) जीव को इष्ट के नाश का भय निरन्तर लगा रहता है।

ख) जीव को अनिष्ट के मिल जाने का भय निरन्तर लगा रहता है।

ग) प्रतिकूलता के आभास से भी जीव डर जाता है।

सत्त्व में न रहने से भय लगा ही रहता है।

1. कभी मृत्यु का भय अशान्त कर देता है।

2. कभी धन के अभाव का भय चिन्तित कर देता है।

3. कभी प्रिय से बिछुड़ने का भय चिन्तित कर देता है।

4. कभी अप्रिय के मिलने का भय शोकयुक्त कर देता है।

5. कभी मान की हानि की शंका भयोत्पादक बन जाती है।

6. कभी तन संरक्षण की चाह तड़पा कर भय उत्पन्न कर देती है।

7. कभी लाज का संरक्षण न हो सकेगा, इसी का भय चिन्तातुर कर देता है।

8. कभी शारीरिक संकट की संभावनाओं की सोच ही भयभीत कर देती है।

नन्हीं! यह व्याकुलता, चिन्ता तथा भ्रमपूर्ण वृत्ति ही भय है।

शोक :

क) मन में होने वाले कष्ट को शोक कहते हैं।

ख) मन में होने वाले संताप को शोक कहते हैं।

ग) मन के वेदना पूर्ण होने को शोक कहते हैं।

घ) मन का दुःखी हो जाना शोक है।

ङ) मन का व्याकुल हो जाना शोक है।

च) मन का भ्रमात्मक चिन्तायुक्त हो जाना शोक है।

विषाद :

शोक का स्थूल रूप विषाद है।

1. स्थूल के कारण उत्पन्न हुई खिन्नता को विषाद कहते हैं।

2. स्थूल के कारण हुई उत्साह हीनता को विषाद कहते हैं।

3. स्थूल के कारण उत्पन्न हुई थकान को विषाद कहते हैं।

4. स्थूल के कारण उत्पन्न हुई संज्ञाहीनता, निराशा और जड़ता को विषाद कहते हैं।

मद :

मद,

क) नशे को कहते हैं।

ख) पागलपन को कहते हैं।

ग) अहंकार को कहते हैं।

घ) उग्र कामुकता को भी कहते हैं।

ङ) घमण्ड को भी कहते हैं।

नन्हूँ!

– तमोगुणी लोग मोह के नशे में अन्धे होते हैं।

– तमोगुणी लोग अहंकार के नशे में अन्धे होते हैं।

– तमोगुणी लोग तन्त्व भाव के नशे में अन्धे हुए होते हैं।

– तमोगुणी लोग दम्भ दर्प की मदिरा रूप मद पीकर नित्य बेहोश रहते हैं।

क) ऐसे तमोगुणी लोगों की धृति भी तमोगुणी होती है।

ख) ऐसे तमोगुणी लोगों की धृति केवल हठ होता है।

ग) ऐसे तमोगुणी लोगों की धृति उन्हें कर्तव्य विमुख करती रहती है।

घ) ऐसे तमोगुणी लोगों की धृति उन्हें शास्त्र विरुद्ध ले जाती है।

ङ) ऐसे तमोगुणी लोगों की धृति उन्हें धर्म विरुद्ध कामों में प्रवृत्त करती रहती है।

च) ऐसे तमोगुणी, दुर्बुद्धि पूर्ण लोग बहुत कष्ट सहते हैं, किन्तु परिणाम में दुःख ही पाते हैं। ये लोग तामसिक धृति के कारण घर वालों और संसार के काम नहीं आते और ये औरों पर अत्याचार करते हुए स्वयं भी अनेकों कष्ट सहते हैं।

भगवान कहते हैं कि उनकी धृति तामसिक है।

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