Chapter 18 Shloka 34

यया तु धर्माकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।

प्रसंङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृति: सा प्रार्थ राजसी।।३४।।

O Arjuna! That determination is said to be

rajsic in nature, whereby an individual,

on account of extreme attachment

to the fruits of action, grasps virtues,

earthly desires and worldly possessions.

Chapter 18 Shloka 34

यया तु धर्माकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।

प्रसंङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृति: सा प्रार्थ राजसी।।३४।।

Now Bhagwan speaks of rajsic determination or dhriti.

O Arjuna! That determination is said to be rajsic in nature, whereby an individual, on account of extreme attachment to the fruits of action, grasps virtues, earthly desires and worldly possessions.

Rajsic dhriti (राजसी धृति)

1. The one who possesses rajsic dhriti endeavours for the fulfilment of his earthly desires.

2. Such a one speaks of dharma only for the fulfilment of some personal desire.

3. He pursues works of dharma also for a similar goal of desire satiation.

4. He engages in incessant worship, yagyas, works of charity and acts of endurance in order to gain his heart’s desire.

5. He even collects sense objects with a view to the fulfilment of selfish goals.

6. He labours hard for the fulfilment of his desires.

7. He endures much to fulfil his selfish aims.

8. He endures people’s barbs and criticisms if it serves his selfish purposes.

9. He also endures many physical hardships for the fulfilment of selfish goals.

10. He tolerates hunger, thirst and many other physical trials to gratify his worldly desires.

He does all this in order to establish his body-self, and he can endure much because:

1. He desires some specific fruit or outcome of his action.

2. He wishes to build up a reputation for himself.

3. He wishes to attain wealth.

4. He wants to make a name in the world.

5. He wants to make a home for himself.

6. He seeks the satiation of his greed.

7. He wants to increase his arrogance.

8. He wishes to secure his world.

9. He wants to make others appear inferior.

10. He seeks his own dominion over all.

He is attached to his body-self and has to endure much if he is to establish it. He possesses a firm resolve, yet, the resolve of such a one is rajsic in character.

A sattvic dhriti or resolve:

a) activates the individual in selfless deeds;

b) involves the individual in selfless worship;

c) endows the individual with selfless knowledge;

d) does not allow the individual to ask the Lord for anything. Such a one endeavours instead to return the body-self to the Lord – the body which was actually His.

Such a one beseeches the Lord to give of Himself to His devotee – this pleading is for his Lord.

One who possesses rajsic dhriti or determination:

a) seeks everything for his personal self;

b) seeks everything for the fulfilment of his likes and pleasure;

c) seeks even the Lord for his personal satiation;

d) is intrinsically selfish – no matter how firm his resolve may be;

e) remains egoistic – no matter how much adversity he is able to endure. The determined resolve of such a one is that of an unsatiated, avaricious being.

– Such a one is said to be of rajsic determination.

अध्याय १८

यया तु धर्माकामार्थान्धृत्या धारयतेऽर्जुन।

प्रसंङ्गेन फलाकाङ्क्षी धृति: सा प्रार्थ राजसी।।३४।।

अब भगवान राजस धृति के विषय में कहते हैं।

शब्दार्थ :

१. हे अर्जुन !

२. जिस धृति के द्वारा मनुष्य प्रसंग (आसक्ति) अनुसार,

३. फल की इच्छा करने वाला,

४. धर्म, काम और अर्थों को धारण करता है,

५. वह धृति राजस है।

तत्त्व विस्तार :

राजसी धृति

राजसी धृति वाला :

क) संसार में अपनी कामनायें पूर्ण करता है।

ख) अपनी किसी कामना पूर्ति अर्थ धर्म की भी बातें करता है।

ग) अपनी किसी कामना पूर्ति अर्थ धर्म के काज भी करता है।

घ) अपनी किसी कामना पूर्ति अर्थ अखण्ड पाठ, यज्ञ, तप, दान करता है।

ङ) अपनी किसी कामना पूर्ति अर्थ विषयों को धारण करता है।

च) अपनी कामना पूर्ति अर्थ बहुत मेहनत करता है।

छ) अपनी कामना पूर्ति के लिए वह बहुत कुछ सहता है।

ज) अपनी कामना पूर्ति अर्थ वह लोगों की बातें भी सहता है।

झ) अपनी कामना पूर्ति के लिए वह तनो कष्ट भी सहता है।

ञ) वह भूख प्यास भी सहता है अपनी कामना पूर्ण करने के लिए।

अपने तन को स्थापति करने के लिए वह सब कुछ करता है, पर वह सब कुछ इसलिए सहता है क्योंकि :

1. उसे कोई वांछित फल पाना है।

2. उसे अपना मान बनाना है।

3. उसे धन पाना है।

4. उसे जग में नाम कमाना है।

5. उसे अपना घर बनाना है।

6. उसे अपना लोभ तृप्त करना है।

7. उसे अपना दम्भ बढ़ाना है।

8. उसे अपना जहान बनाना है।

9. उसे जग को नीचा दिखाना है।

10. उसे अपना राज्य बनाना है।

उसे तो अपने तन से संग है। अपने तन की स्थापति के लिए उसे बहुत कुछ सहना भी पड़ता है। उसे अपने तन की स्थापति के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है। वह बहुत दृढ़ निश्चय भी करता है। उसकी धृति राजसक है।

सात्त्विक धृति के आसरे :

1. जीव निष्काम कर्म करता है।

2. जीव निष्काम उपासना करता है।

3. उसका ज्ञान निष्काम होता है।

4. उसे तो भगवान को भी उनका तन वापिस देना होता है, वह भगवान से क्या मांगेगा?

वह तो भगवान से भगवान को मांगता है और वह भी भगवान के लिए ही मांगता है।

राजसिक धृति वाला :

1. सब कुछ अपने लिए मांगता है।

2. अपनी रुचि पूर्ति के लिए सब कुछ मांगता है।

3. वह भगवान को भी चाहता है अपनी रुचि पूर्ण करने के लिए।

4. वह जितना भी दृढ़ निश्चयी हो जाये, वह स्वार्थी ही है।

5. वह जितना भी विपरीतता सहने वाला हो जाये, वह अहंकारी ही है। उसकी धृति एक अतृप्त लोभ पूर्ण कामी की है, वह राजस धृति पूर्ण है।

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