Chapter 18 Shloka 32

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी।।३२।।

O Partha! The intellect veiled by tamas

perceives adharma as dharma and

views all things in a distorted manner.

Such is the tamsic intellect.

Chapter 18 Shloka 32

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी।।३२।।

Bhagwan says to Arjuna:

O Partha! The intellect veiled by tamas perceives adharma as dharma and views all things in a distorted manner. Such is the tamsic intellect.

Little one, try to understand the characteristics of the tamsic intellect.

1. One who is full of the darkness of ignorance possesses a tamsic intellect.

2. The intellect of one who is lazy and filled with moha is tamsic indeed.

3. One who is attached to the body-self and full of pride on account of this gross body, possesses a tamsic intellect.

4. The tamsic intellect can be defined as the intellect of the blind.

5. The tamsic intellect is the intellect of one devoid of discernment.

The one who possesses a tamsic intellect takes great pride in that intellect, but that intellect:

a) takes the wrong view of everything;

b) teaches him false principles;

c) merely spreads darkness;

d) leads him towards pettiness and meanness;

e) engages in deceitful and fraudulent actions;

f) drives the individual to betray the confidence of others;

g) adheres neither to duty nor to dharma;

h) transforms a human being into a demon;

i)  raises its voice against dharma and righteousness;

j)  sponsors hatred in the name of dharma;

k) is responsible for maligning the Lord’s beauteous Name.

Because of such a tamsic intellect:

1. The world is deprived of love.

2. Compassion is completely annihilated.

3. Sincerity is dealt a mortal blow.

4. An attitude of neglecting one’s duty prevails.

5. Homes are bereft of joy.

6. Traitors are created in the world.

7. Forgiveness is non-existent.

8. To seek revenge becomes the prevalent dharma.

9. The truth is ever suppressed.

10. One seeks to destroy whoever speaks the truth.

11. Sin is rampant – such an intellect encourages others too, to abide in sin.

12. Travellers on the path of Truth are not endured.

13. Man can neither engage in virtuous deeds himself, nor trust anyone who performs such deeds.

–  Dishonesty and a lack of integrity are the basis of such an intellect.

–  Such an intellect possesses neither intellectual nor emotional truthfulness; nor is it truthful in actions.

Yet it considers itself to be superior, truthful, replete with love for the country and dutiful to the core!

The tamsic intellect considers only itself to be superior. It may take an oath of loyalty to the country, but it is essentially a traitor to the nation. It swears to speak only the truth, yet abstains from doing so. It lauds duty, yet engages in deeds contrary to duty.

Born of deceit, such an intellect is inherently blind. Yet, bloated with pride, it is extremely treacherous. To malign others is mere play. Destroying others in order to save oneself is the work of such an intellect. Indulging in untruthful talk and behaviour, it wants its contradiction of Truth to be proved as correct and consonant with dharma and duty.

Dharma is constantly on the decline due to this tamsic intellect, and duty is almost non-existent. People who possess such an intellect are to be found in myriad roles in society. However, they are not to be blamed; we must look upon them with sympathy since they are afflicted with such an attribute!

अध्याय १८

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धि: सा पार्थ तामसी।।३२।।

भगवान कहते हैं अर्जुन से :

शब्दार्थ :

१. हे पार्थ!

२. तमोगुण से आवृत हुई बुद्धि,

३. अधर्म को धर्म मानती है

४. तथा सम्पूर्ण अर्थों को विपरीत मानती है,

५. वह तामसी बुद्धि है।

तत्त्व विस्तार :

तामसी बुद्धि के लक्षण समझ ले नन्हीं!

अब भगवान तमोगुण आवृत बुद्धि को कहते हैं। यानि,

क) अंधकार तथा अज्ञानपूर्ण जीव की बुद्धि तमोगुणी है।

ख) मोह तथा प्रमादपूर्ण जीव की बुद्धि तमोगुणी है।

ग) देह आसक्त देह अभिमानी की बुद्धि तमोगुणी है।

घ) क्यों न कहें अन्धे की बुद्धि की बात कर रहे हैं।

ङ) क्यों न कहें बुद्धिहीन की बुद्धि की बात कर रहे हैं।

भाई! यह वह बुद्धि है जो बुद्धि का गुमान तो करती है परन्तु,

1. सब बातें उलटी देखती है।

2. मिथ्या सिद्धान्त बताती है।

3. अंधकार फैलाती है।

4. जीव को तुच्छता की ओर ले जाती है।

5. छल कपट करना इसका काम है।

6. इस बुद्धि के कारण लोग विश्वासघात करते हैं।

7. तमोगुणी बुद्धि न कर्तव्य जानती है न धर्म।

8. यही इनसान के रूप को असुर बना देती है।

9. धर्म के विरुद्ध यही आवाज़ उठाती है।

10. धर्म के नाम पर लोगों से द्वेष करवाती है।

11. भगवान के नाम पर भी ऐसे लोग कलंक लगाते हैं। इस बुद्धि के कारण जग से :

क) प्रेम ख़त्म होने लगता है।

ख) करुणा ख़त्म होने लगती है।

ग) वफ़ा का जनाज़ा उठता है।

घ) कर्तव्य विमुखता होती है।

ङ) घर सूने हो जाते हैं।

च) देश के गद्दार पैदा हो जाते हैं।

छ) क्षमा करना यह बुद्धि जानती ही नहीं।

ज) बदला लेना इसी का धर्म है।

झ) सत्य को यह नित्य दबाती है।

ञ) जो सत् कहे, उसे तबाह करना चाहती है।

ट) यह बुद्धि पाप करती है और दूसरों से पाप करवाती है।

ठ) सत् पथिक को यह सह ही नहीं सकती।

ड) स्वयं शुभ कर्म कर नहीं सकती, दूसरा करे तो उस पर शक करती है।

ढ) बेईमानी ही इसका मूलमन्त्र है।

ण) न इसमें बुद्धि की सत्यता है, न ही मानसिक और न ही कर्म की सत्यता है। फिर भी यह बुद्धि अपने आप को :

– श्रेष्ठतम मानने वाली होती है।

– सत्पूर्ण मानने वाली होती है।

– देशभक्त तथा कर्तव्य परायण मानने वाली होती है।

तामसिक बुद्धि केवल अपने आपको श्रेष्ठ मानती है। देश के लिये जीने की शपथ खाकर देश से गद्दारी करती है। सत् कहने की शपथ खाकर सत् नहीं बोलती। कर्तव्य का ज्ञान बखान करती है और स्वयं कर्तव्य विमुख कार्य करती है।

भाई! झूठ से पैदा होकर यह जन्म से अन्धी होती है, किन्तु अति गुमान के कारण यह महा धोखेबाज़ है। दूसरे पर कलंक लगा देना इसका एक खिलवाड़ है। अपने को बचाने के लिए दूसरे को मिटा देना इस बुद्धि के कारण होता है। किन्तु मुश्किल यह है कि सब सत् विपरीत बातें करके यह उस विपरीतता को सत् सिद्ध करना चाहती है; यह उस विपरीतता को धर्म और कर्तव्य सिद्ध करना चाहती है।

इस तामसिक बुद्धि वाले लोगों के कारण ही धर्म का पतन होता है और कर्तव्य का अभाव होता है। यह तामसिक बुद्धि वाले लोग हर भेष में होते हैं। पर भाई! उनका भी दोष नहीं, यह गुण ही ऐसा है।

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