Chapter 18 Shloka 27

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।

हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।।२७।।

One who is laden with attachment,

who seeks the fruits of action,

who is greedy and malevolent,

who is impure and ridden with the

duality of joy and sorrow, is a rajsic doer.

Chapter 18 Shloka 27

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।

हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।।२७।।

Now Bhagwan describes the rajsic doer.

One who is laden with attachment, who seeks the fruits of action, who is greedy and malevolent, who is impure and ridden with the duality of joy and sorrow, is a rajsic doer.

My little one, the Lord now speaks of the rajsic doer. That doer:

a) who is full of attachment;

b) who is attached to sense objects;

c) who is attached to objects of enjoyment;

d) who seeks the fruits of action;

e) who acts only after he is assured of the fruits of his deeds, who is therefore impelled only by the fruits that would accrue from the deed performed;

f) who does nothing if it does not satiate his selfish ambitions;

is indeed a rajsic doer.

1. He is greedy;

2. He is insatiable;

3. His desire and covetousness is ever on the increase.

He seeks to attain every object that he likes or which he is attracted to; and having gained his desired object, he seeks it in greater ratio. His appetite is never satiated and only keeps growing. The impulse to injure is also aroused by his insatiable desire.

Hinsatmak (हिंसात्मक) – Injurious

Such an individual seeks only to fulfil his desire:

1. Even though such fulfilment may destroy the home of another.

2. Even though it may cause a country wide uproar.

3. Even though the sick may be left in agony due to spurious medicines.

4. Even though orphans may be left sobbing.

How does it matter to such people?

Lubdh (लुब्ध) – Greedy

Such people only seek to satiate their greed:

1. If somebody’s reputation is ruined in the bargain, how does it matter to them?

2. What do they care if another’s life is ruined?

3. They are dire enemies of humanity.

4. They are demons in the guise of human beings.

Apavitra (अपवित्र) – Impure

Their deeds, values, nature, mental trends, behaviour, interaction, indeed their very life is defiled and impure.

Enmeshed in joy and sorrow

What else can be expected of such people who are enmeshed in joy and sorrow?

1. They seek to destroy those whom they hate.

2. They seek to escape from those whom they detest.

3. They will even resort to violent means to attain that which has caught their fancy and is the object of their attachment.

And listen my little one, the surprising secret is that such individuals manage to absolve themselves of all blame with the help of false justifications.

Such is the rajsic doer.

अध्याय १८

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।

हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः।।२७।।

अब भगवान राजसिक कर्ता के विषय में कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. आसक्ति से युक्त हुआ,

२. कर्मों के फल को चाहने वाला,

३. लोभी हिंसात्मक,

४. अपवित्र और हर्ष शोक से युक्त कर्ता,

५. राजस कहलाता है।

तत्त्व विस्तार :

मेरी नन्हीं जान्! अब भगवान राजस कर्ता की बात कहते हैं।

आसक्ति युक्त

जो कर्ता :

1. राग पूर्ण है,

2. विषय आसक्त है,

3. उपभोगों से संग करने वाला है,

4. कर्मों के फलों को चाहने वाला है,

5. जो कर्म फल को सामने रख कर कर्म करता है, यानि कर्म फल ही जिसकी प्रेरक शक्ति है,

6. जो स्वार्थ के बिना कोई भी काम आरम्भ नहीं करता,

वह राजसिक कर्ता है और फिर :

क) जो लोभी भी है,

ख) जो तृप्त होता ही नहीं,

ग) जिसकी चाहना बढ़ती ही जाती है,

घ) हर चीज़ जो पसन्द आये, उसे वह पाना चाहता है और जब मिल जाये तब और अधिक मात्रा में पाना चाहता है,

यानि जिसकी चाहना का उदर और बढ़ जाता है, अपनी चाहना पूर्ण करने के लिए उसमें हिंसात्मक वृत्ति का जन्म होता है, वह राजसिक कर्ता है।

हिंसात्मक :

इस गुण वाले कर्ता को तो अपनी रुचि पूरी करनी है, चाहे :

1. कोई तबाह हो जाये, चाहे कितने घर नष्ट हो जायें,

2. चाहे देश में हाहाकार मच जाये, लोग भूखे मर जायें,

3. चाहे बीमार ग़लत औषधि के कारण तड़पते रहें,

4. चाहे बच्चे बिलखते रहें,

भाई! इन लोगों को क्या!

लोभी :

इन्हें तो अपना लोभ पूरा करना है।

क) किसी की आबरू लुट गई तो इन्हें क्या?

ख) किसी की ज़िन्दगी तबाह हो गई तो इन्हें क्या?

ग) ये इनसानियत के भीषण दुश्मन होते हैं।

घ) ये इनसान के रूप में असुर होते हैं।

अपवित्र :

इनके कर्म, इनके भाव, इनका स्वभाव, इनकी मानसिक वृत्ति, इनका आचरण, इनका व्यवहार और इनका जीवन, सब ही अपवित्र होता है।

हर्ष शोक युक्त :

हर्ष शोक से लिपायमान हुए लोग और करेंगे भी क्या?

द्वेष :

क) जहाँ द्वेष हो, उसे मिटा देना चाहते हैं।

ख) जहाँ द्वेष हो, उससे भाग जाना चाहते हैं।

ग) जहाँ राग हो, उसे पाने के लिए कोई भी अत्याचार करना पड़े तो कर देते हैं।

और सुन मेरी जान्! राज़ की तो बात यह है कि फिर भी अपने आपको, भावना और मिथ्या सिद्धान्तों के आसरे दोष विमुक्त कर लेते हैं।

भाई! रजोगुणी कर्ता ऐसा ही होता है।

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