Chapter 18 Shloka 26

मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।

सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।।२६।।

One who is free from attachment,

who is devoid of ego,

equipped with resolution and enthusiasm

and unaffected by success or failure,

is deemed a sattvic doer.

Chapter 18 Shloka 26

मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।

सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।।२६।।

Now the Lord elucidates on the three kinds of doers, differentiated by their varied attributes.

One who is free from attachment, who is devoid of ego, equipped with resolution and enthusiasm and unaffected by success or failure, is deemed a sattvic doer.

My little one, first understand the connotation of mukta sang – or one who is free of attachment.

Mukta Sang (मुक्तसंग)

1. One who is devoid of attachment to action.

2. One who does not seek to enjoy the fruits of action, such as wealth, renown etc.

3. One who is not attached to any individual whatsoever.

4. One who is devoid of a possessive attitude where others are concerned.

5. One who is devoid of desire.

That one is mukta sang or free of the fetters of attachment.

Little one, it is only the selfless being who can be said to be mukta sang. Such a one is also devoid of ego.

Anahamvaadi (अनहंवादी) – One whose speech is devoid of ego

1. One who has no pride of doership.

2. One who does not speak egoistically.

3. One who speaks without conceit or vanity.

4. One who does not eulogise his or her own attributes.

5. One whose speech does not reek of his or her gross status.

6. One whose speech never derides another.

7. One who never criticises another.

8. One who never proclaims ‘I am this’ or ‘I am that’.

Such a one can be defined as anahamvaadi.

Dhriti (धृति) – Resoluteness

1. Dhriti connotes a state of imperturbability.

2. Dhriti connotes firm unity.

3. Dhriti is the ability to remain unmoved despite adversity.

4. Dhriti connotes infinite endurance and a satiated state.

5. To persevere in a job that demands great forbearance is dhriti.

Little one, if an individual is devoid of pride of doership, and if he engages in selfless deeds, he is bound to be of firm resolve. He will remain uninfluenced by any hindrances that may obstruct his path.

(For a further elucidation of dhriti, see Chp.16, shloka 2)

Utsah (उत्साह) – Enthusiasm

1. Utsah depends on one’s capability.

2. Utsah is capability.

3. The energy that does not permit one to get dejected and give up, despite hindrances and obstructions, is utsah.

The Lord says, the sattvic doer remains uninfluenced and untouched by success or failure.

Nirvikaar (निर्विकार) – Devoid of aberrations

Vikaar connotes:

a) aberration;

b) disease;

c) that which causes a change in one’s actual nature or form;

d) twists or knots which cause an abnormality in the otherwise pure mind-stuff;

e) the arousal of confusion in the mind;

f) dissatisfaction, remorse, greed – all these are aberrations;

g) ego is an aberration;

h) the perception of duality is also a mental aberration;

i)  mental concepts are aberrations too.

All these aberrations veil the intellect and deprive the individual of his humane inclinations. Devoid of aberrations that cause duality, the sattvic doer performs elevated and pure, sattvic deeds.

Whilst performing such deeds:

1. He remains free from both excessive joy and sorrow.

2. He is not affected by adversity.

3. He is ever uninfluenced by ego or any idea of ‘me’ and ‘mine’.

Since he himself is ever satiated, he is unfettered by desire. Therefore his actions are ever selfless and to a great extent, devoid of doership. Such a one is indeed a sattvic doer.

अध्याय १८

मुक्तसंगोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।

सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते।।२६।।

अब भगवान तीन प्रकार के कर्ता के विषय में गुण भेद दर्शाते हुए कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. मुक्त संग, अनहंवादी,

२. धृति तथा उत्साह से युक्त

३. और सिद्धि असिद्धि से निर्विकार कर्ता,

४. सात्त्विक कहा जाता है।

तत्त्व विस्तार :

मेरी नन्हूं जान्! पहले ‘मुक्तसंग’ का अर्थ समझ ले!

मुक्तसंग :

जिस जीव का :

क) कर्मों से संग न रहे,

ख) कर्म फल रूप भोग से, धन मान इत्यादि से संग न रहे,

ग) किसी भी जीव से तनिक भी संग न रहे,

घ) किसी भी जीव के प्रति ममत्व भाव न रहे,

ङ) कोई भी कामना न रहे,

वह मुक्तसंग होता है।

नन्हूं! मुक्तसंग निष्काम कर्म वाला होगा, वह अनहंवादी होगा।

अनहंवादी :

अर्थात्,

1. जिसमें कर्तापन का अभिमान न हो,

2. जो अहंकार पूर्ण वाक् न कहे,

3. अभिमान शून्य वचन बोलने वाला,

4. जो नित्य अपने गुणों की तारीफ़ नहीं करता,

5. जिसके वाक् में से उसकी स्थूल स्थिति की दुर्गन्ध न आती हो,

6. जो दूसरों को गिराने वाली बातें कभी नहीं करता,

7. जो दूसरों की निन्दा कभी नहीं करता,

8. ‘मैं यह हूँ,’ ‘मैं वह हूँ,’ जो यह कभी नहीं कहता, वह अनहंवादी है।

धृति :

(धृति के विस्तार के लिये 16/3 देखिये।)

क) धृति अविचलित रहने को कहते हैं।

ख) धृति दृढ़ एकता युक्त रहने को कहते हैं।

ग) धृति विपरीतता में भी स्थिर रहने की शक्ति को कहते हैं।

घ) धृति महान् धैर्य को, तृप्ति को भी कहते हैं।

ङ) धीरता से काज में लगे रहने को धृति कहते हैं।

नन्हूं! यदि जीव में कर्तापन का अभिमान नहीं होगा तथा वह निष्काम कर्म करने वाला होगा तो वह धृतिपूर्ण होगा ही; वह राह में आये हुए विघ्नों से विचलित नहीं होगा।

उत्साह

– उत्साह योग्यता पर आधारित है।

– उत्साह योग्यता को भी कहते हैं।

– किसी भी बात से न उकताने वाली शक्ति को उत्साह कहते हैं।

फिर भगवान कहते हैं, ‘सात्त्विक कर्ता सिद्धि तथा असिद्धि में निर्विकार रहता है।’

नन्हूं! यहाँ निर्विकार समझ ले।

निर्विकार

विकार का अर्थ :

1. विकार का अर्थ है विकृति।

2. रोग को विकार कहते हैं।

3. जो वास्तविक प्रकृति तथा रूप में परिवर्तन ले आये, उसे विकार कहते हैं।

4. निर्मल चित्त में जड़ ग्रन्थियाँ विकार होती हैं।

5. मन में विक्षेप का उत्पन्न होना विकारों का उत्पन्न होना है।

6. अतृप्ति, क्षोभ, लोभ इत्यादि सब विकार हैं।

7. अहंकार भी विकार है।

8. द्वन्द्व भी मनोविकार है।

9. मान्यतायें भी विकार हैं।

ये सम्पूर्ण विकार बुद्धि को आवृत करते हैं और जीव को उसकी इनसानियत से वंचित कर देते हैं। सात्त्विक कर्ता द्वन्द्व पूर्ण विकारों से रहित होने के कारण सात्त्विक कर्म करता है।

वह कर्म करते हुए :

क) हर्ष या शोक से नित्य अप्रभावित रहता है।

ख) कष्ट इत्यादि से नित्य अप्रभावित रहता है।

ग) अहंकार या ममत्व भाव से नित्य अप्रभावित रहता है।

वह स्वयं नित्य तृप्त होने के कारण कामना रहित होता है, इस कारण उसके कर्म निष्काम होते हैं तथा उनमें कर्तृत्व भाव का भी बहुत हद तक अभाव होता है। वह सात्त्विक कर्ता है।

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