Chapter 18 Shloka 9

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।

संगं त्यक्तवा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।९।।

He who performs his obligatory deeds,

knowing ‘this is my duty’,

having relinquished attachment

and the desire for the fruit of action,

engages in sattvic tyaag.

Chapter 18 Shloka 9

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।

संगं त्यक्तवा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।९।।

Now Bhagwan describes sattvic tyaag.

He who performs his obligatory deeds, knowing ‘this is my duty’, having relinquished attachment and the desire for the fruit of action, engages in sattvic tyaag.

The Lord is unambiguously stating, “The relinquishment of actions is not true renunciation. The relinquishment of the desire for the fruit of action and the severing of attachment comprises sattvic tyaag.”

He who engages in action with the conviction ‘this must be done’, such a one:

a) is oblivious to both nivritti – abstinence from action, and pravritti – pursuance of action;

b) does not reflect upon the merit or demerit of the action;

c) does not dwell upon his glories;

d) does not dwell at all upon his virtues or their praise. Virtues exist, but such a one does not seat himself upon a pedestal of virtue;

e) is not enmeshed by action;

f) is devoid of attachment;

g) is devoid of the pride of doership and smilingly fulfils his duty, knowing the essence of action, that it is qualities that interact with other qualities.

If the meaning of tyaag is the relinquishment of attachment, then the relinquishment of the mind is true tyaag – because attachment is an offspring of the mind.

If attachment and the desire for the fruit of deeds is extinct:

a) who will dwell on likes and dislikes?

b) raag and dvesh – excessive attachment and hatred will be eliminated;

c) equanimity towards both esteem and insult will necessarily be acquired;

d) joys and sorrows will cease to influence one;

e) one will not be agitated by loss and gain;

f) the afflictions of hopes and expectations will not touch one;

g) one can transcend duality;

h) one can be free of both sankalp and vikalp – thoughts and resolutions, both positive and negative;

i)  one’s intellect will remain nirlipt or uninfluenced;

j)  one will be free of aberrations;

k) one will be devoid of moha.

Then the sadhak or spiritual aspirant:

a) will become completely indifferent towards himself;

b) will be eternally satiated;

c) will be a sanyasi or renunciate at heart;

d) will engage in selfless deeds devoid of attachment;

e) will engage in selfless worship, which again is free of attachment;

f) will possess knowledge which he imparts selflessly and without attachment;

g) will be possessed of a stable intellect;

h) will cease to be influenced by any qualities – his own as well as those of others; thus he will become a gunatit;

i)  will be replete with divine qualities.

1. This is the tyaag of a sanyasi or renunciate. It is the highest tyaag.

2. This is true tyaag.

3. This is the tyaag of karma phal or the fruit of actions.

The Lord has stipulated earlier that the Atmavaan pandit, even though he possesses great knowledge, deals with the ignorant as one of them. He does not destroy the other’s convictions, but serves all diligently. At the other’s behest, he even dons the form of a charioteer. Helping others to fulfil their own tasks, such a one accords the credits of those actions to the latter.

अध्याय १८

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेऽर्जुन।

संगं त्यक्तवा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः।।९।।

अब भगवान सात्त्विक त्याग के विषय में कहते हैं।

शब्दार्थ :

१. ‘कर्तव्य ही है,’ ऐसा समझ कर,

२. जो संग और फल का त्याग करके नियत कर्म को करता है,

३. वह सात्त्विक त्याग है।

तत्त्व विस्तार :

यहाँ स्पष्ट कह रहे हैं कि कर्म त्याग त्याग नहीं होता। कर्म फल की चाह और कर्म संग का त्याग ही सात्त्विक त्याग है।

‘यह करना ही है,’ ऐसा समझ कर जो कर्म प्रेरित होता है, वह :

क) निवृत्ति या प्रवृत्ति का ध्यान नहीं करेगा।

ख) कर्म की श्रेष्ठता या न्यूनता पर ध्यान नहीं देगा।

ग) अपनी अभिमान योग्य स्थिति पर चित्त नहीं धरेगा।

घ) अपनी गुण महिमा के आसन पर नहीं बैठेगा, (वहाँ गुण तो हैं, पर आसन नहीं होता। )

ङ) कर्म से लिपायमान नहीं होगा।

च) आसक्ति रहित होगा।

छ) गुण गुणों में वर्त रहे हैं, यह जान कर वह कर्तापन के अभिमान से रहित हो जायेगा और जीवन में मुसकराता हुआ कर्तव्य निभायेगा।

भाई! त्याग का अर्थ संग त्याग है। संग मन का गुण है, सो मनो त्याग ही त्याग है।

गर संग और कर्म फल की चाह न रहे तो :

1. रुचि और अरुचि पर ध्यान कौन धरेगा?

2. राग और द्वेष मिट ही जायेंगे।

3. मान मिले या अपमान मिले, दोनों में समभावी हो ही जायेंगे।

4. तब सुख दुःख विचलित कर नहीं पायेंगे।

5. हानि लाभ से नहीं घबरायेंगे।

6. आशा निराशा के प्रहार छू नहीं सकेंगे।

7. निर्द्वन्द्व हो ही जायेंगे।

8. संकल्प विकल्प रहित हो ही जायेंगे।

9. निर्लिप्त बुद्धि हो ही जायेंगे।

10. निर्विकार हो ही जायेंगे।

11. निर्मोही हो ही जायेंगे।

तब साधक :

क) अपने प्रति उदासीन हो जायेगा।

ख) अपने प्रति नित्य तृप्त हो जायेगा।

ग) वह नित्य संन्यासी हो ही जायेगा।

घ) उसका कर्म निष्काम और निःसंग होगा।

ङ) उसकी उपासना निष्काम और निःसंग होगी।

च) उसका ज्ञान निष्काम और निःसंग होगा।

छ) वह स्थिर बुद्धि हो ही जायेगा।

ज) वह गुणातीत हो ही जायेगा।

झ) वह दैवी गुण सम्पन्न हो ही जायेगा।

–  यही संन्यासी का त्याग है, यानि सर्वश्रेष्ठ त्याग है।

–  यही वास्तविक त्याग है।

–  यही संग का त्याग है।

–  यही कर्म फल का त्याग है।

भगवान ने कहा था कि, ‘आत्मवान् पंडित महा ज्ञानी होते हुए भी अज्ञानी के साथ अज्ञानी सा ही दर्शाता है। वह किसी की मान्यता को भंजित नहीं करता, चाकरवत् वर्तता है, कोई चाहे तो सारथी का रूप धर लेता है। वह दूसरे से काज करवाता हुआ कर्म सिद्धि का सेहरा दूसरे को दिलवाता है।’

Copyright © 2019, Arpana Trust
Site   designed  , developed   &   maintained   by   www.mindmyweb.com .
image01