Chapter 18 Shloka 7

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।

मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।।७।।

It is not proper

to renounce obligatory deeds;

to relinquish such deeds

due to moha is tamsic tyaag.

Chapter 18 Shloka 7

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।

मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।।७।।

Now Bhagwan explains further:

It is not proper to renounce obligatory deeds; to relinquish such deeds due to moha is tamsic tyaag.

My little one, understand this carefully. The Lord says that the relinquishment of obligatory actions is tantamount to tamsic tyaag.

Niyat karma – Obligatory actions

1. Natural deeds.

2. Imperative actions.

3. Pre-decided actions.

4. Those acts which are self motivated and self controlled.

5. Actions ordained by destiny.

6. Acts which are naturally born of contact.

7. Normal, daily acts.

8. Acts which are certain and will necessarily occur.

9. The universal law.

10. Acts that are enjoined by the Scriptures.

11. Acts that make one noble and elevated.

12. Meritorious deeds.

– All these constitute niyat karma or obligatory actions.

Actions are bound to spring from all external contact – the sadhak or spiritual aspirant must only vigilantly witness his internal self and his values.

Tamsic tyaag

The Lord says that to relinquish action:

a) due to moha;

b) due to sheer foolishness;

c) due to ignorance and the knots of attachment which lie within;

d) due to the fact that one has not gauged the reality;

e) due to the pain or inconvenience it may cause;

f) due to the fact that one is unable to bear adversity;

g) knowing it to be adverse and unpleasant;

– is tamsic tyaag.

The very practice of the Lord’s devotee lies in his success in the realm of obligatory acts. Yagya, tapas and daan – all these are obligatory actions. They are practised in an ordinary atmosphere in one’s everyday life. Adherence to duty is also a part of one’s obligatory deeds.

Moha

Now understand moha.

1. Moha gives rise to delusion.

2. The stupor of intellect that occurs due to ignorance is moha.

3. Moha causes the application of erroneous principles.

4. Moha is also the cause of excessive self confidence.

Due to moha:

1. Man is eternally caught in the web of anxiety.

2. One believes one perceives the truth in the untrue.

3. One suffers from superstition.

4. Man cannot see anything from a new perspective.

5. Man does not know himself, in fact he finds it impossible to do so – and he does not even possess any inclination to do so.

6. A discrepancy occurs between man’s intellectual beliefs, his mental concepts and his practical life.

The intellect holds the Scriptures in reverence whereas the mind does not give them any place, since the Scriptures forbid one to do as one likes! The mind rejects whatever the intellect upholds as the Truth. Thus knowledge and life are at variance. This moha causes many sages, too, to abandon the path of spirituality.

1. Thus they preach duty, but do not fulfil their own obligations!

2. They preach love and forgiveness, but do not practice these qualities in their homes and amongst their loved ones.

3. They preach compassion, but do not practice it in their homes.

4. They preach the renunciation of the body-self, but snatch away the family’s rights over that body! They leave their homes, thus snatching away their father’s son, their children’s father, their wife’s husband, their brother’s sibling and their country’s servitor!

Thus, to desist from obligatory deeds that are born of one’s natural attributes, is indeed tamsic tyaag.

Listen carefully: that renunciation which was not practised by the Lord Himself, can only be categorised as tamsic or rajsic, else, proof of such renunciation would be found in the Lord’s life.

All this is said only to stress that such renunciation or relinquishment is not appropriate. Renunciation should be attempted only after proper consideration and understanding.

1. Know why you have renounced.

2. Know what you have renounced.

3. Understand beforehand, the repercussions of your renunciation and who may suffer on account of it.

4. Consider also whether your renunciation is going to be an aid to your spiritual practice or detrimental to it.

अध्याय १८

नियतस्य तु संन्यासः कर्मणो नोपपद्यते।

मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तितः।।७।।

अब भगवान स्वयं आगे समझाते हैं और कहते हैं :

शब्दार्थ :

१. और नियत कर्म का संन्यास उचित नहीं होता,

२. मोह से उनका त्याग करना तामस त्याग कहा गया है।

तत्त्व विस्तार :

नन्हूं मेरी जान्! ध्यान से समझ! भगवान ने कहा है कि नियत कर्म का त्याग करना तामस त्याग है।

नियत कर्म :

सर्वप्रथम समझ ले नियत कर्म क्या हैं?

जीवन के,

1. सहज कर्म,

2. अनिवार्य कर्म,

3. निश्चित कर्म,

4. स्वत: नियन्त्रित कर्म,

5. विधान रचित कर्म,

6. सहज सम्पर्क से उत्पन्न हुए कर्म,

7. सहज कर्तव्य कर्म,

8. अवश्यम्भावी कर्म, नियत कर्म हैं।

9. बाह्य विधान और कानून,

10. नित्य होने वाले कर्म,

11. शास्त्र विहित कर्म,

12. जीवन को जो श्रेष्ठ बनाते हैं, वे कर्म,

13. श्रेयस्कर कर्म,

ये सब भी नियत कर्म हैं।

हर सम्पर्क के परिणाम रूप कर्म ठीक ही हैं, साधक केवल अपना आन्तरिक भाव देख ले।

तामस त्याग :

भगवान कहते हैं :

क) मोह के कारण,

ख) मूर्खता के कारण,

ग) अज्ञान और मोह की ग्रन्थियों के कारण,

घ) यथार्थ न समझते हुए,

ङ) कष्ट और पीड़ा के कारण,

च) जीवन में विपरीतता न सह सकने के कारण,

छ) विपरीत तथा अरुचि कर जान कर,

नियत कर्म छोड़ देना तामस त्याग है।

भगवान का नाम लेने वाले का तो अभ्यास ही नियत कर्मों की सार्थकता में है। यज्ञ, तप, दान नियत कर्म ही हैं। इनका अभ्यास साधारण वातावरण में होता है।

कर्तव्य परायणता भी नियत कर्मों में आती है।

मोह :

अब मोह को समझ ले!

1. मोह भ्रान्ति कारक होता है।

2. अज्ञान के कारण बुद्धि की मूर्छा को मोह कहते हैं।

3. मिथ्या सिद्धान्त आरोपण मोह के कारण होता है।

4. मोह ही अत्यधिक आत्मविश्वास आरोपण करता है।

मोह के कारण ही :

5. जीव नित्य उद्विग्नता के जाल में फंसा रहता है।

6. असत् में सत् का आभास होता है।

7. अंधविश्वास होता है।

8. जीव नवीन दृष्टिकोण से देख नहीं सकता।

9. जीव अपने आप को नहीं जानता, जान भी नहीं सकता और जानना भी नहीं चाहता।

10. जीव के बुद्धि, मन और जीवन में भेद रह जाता है।

बुद्धि को शास्त्र प्रिय हैं, मन को शास्त्र प्रिय नहीं हैं, क्योंकि शास्त्र मनमानी के विरुद्ध हैं।

बुद्धि जिसे सत् मानती है, मन उसे सत् नहीं मानता। ज्ञान कुछ और होता है और जीवन कुछ और होता है। इस मोह के कारण ही अनेक संतगण भी पथ भूल जाते हैं। जैसे :

– प्रचार कर्तव्य का करते हैं, पर स्वयं कर्तव्य नहीं करते।

– प्रचार प्रेम और क्षमा का करते हैं, पर स्वयं अपने घर वालों को प्रेम और क्षमा नहीं करते।

– प्रचार दया का करते हैं, पर स्वयं अपने घर वालों पर दया नहीं करते।

– प्रचार तनो त्याग का करते हैं, पर स्वयं अपने तन पर जिनका हक़ है, उनसे वे तन छीन लेते हैं। स्वयं घर छोड़ कर मानो अपने पिता का पुत्र, बच्चों का पिता, अपनी पत्नी का पति, अपने भाई का भाई और अपने देश का सेवक छीन लेते हैं।

नियत कर्म, जो स्वाभाविक हैं, इनका त्याग तामस त्याग है।

ध्यान से देख! जो त्याग भगवान ने नहीं किया, वह त्याग तामसिक या राजसिक ही होगा, वरना उसका प्रमाण भगवान के जीवन में मिलना चाहिये।

यह सब कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकार का त्याग ठीक नहीं होता। त्याग सोच समझ कर करना चाहिये।

– क्यों त्याग किया इसे सोच लो,

– क्या त्याग किया इसे सोच लो,

– परिणाम में किसे कष्ट होगा यह सोच लो,

– आपकी साधना सफल होगी या ख़त्म होगी, ज़रा इसका भी ध्यान धर लो।

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