Chapter 17 Shloka 28

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।

असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।२८।।

That oblation which is offered without faith,

that charity which is endowed without faith,

that forbearance which is devoid of faith,

and whatever is done without faith is asat,

so it is said. Such acts accrue no profit –

whether in this life or in the life hereafter.

Chapter 17 Shloka 28

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।

असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।२८।।

The Lord says, O Arjuna!

That oblation which is offered without faith, that charity which is endowed without faith, that forbearance which is devoid of faith, and whatever is done without faith is asat, so it is said. Such acts accrue no profit – whether in this life or in the life hereafter.

All acts devoid of faith are asat

‘Om Tat Sat’ – if these words are spoken with faith, whatever one does thereafter will comprise sat. If faith is lacking, they comprise asat.

Kamla! Reflect on this carefully.

1. If the Lord is the doer, all is sat.

2. Whichever act one performs devoid of doership, is sat.

3. When one engages in action for the Lord, with the Lord as one’s mainstay, that action is sat.

4. Whatever deed is done in self-forgetfulness is sat.

Shraddha – Faith

One’s faith must be anchored in ‘Om Tat Sat’.

1. One’s faith must be focused in Brahm.

2. One must have abiding faith in the nature of the Supreme.

3. One must have faith that all is Om.

4. Noble and virtuous thoughts all belong to the Lord; in such thoughts inheres tapas or forbearance. Such thoughts constitute the armour of the Lord’s Name. These are also the mainstay of forbearance. They arise only when one has faith in the conviction ‘All is He.’

5. Faith comprises the essence of yagya, forbearance and charity – and conversely, yagya, forbearance and charity have faith as their mainstay.

6. Faith is the vessel in which the spiritual aspirant collects the Lord’s divine love.

7. Faith is the strength by which the spiritual aspirant is enabled to attain all he aspires for.

8. Faith invokes the Lord.

9. The Lord Himself is nurtured in the cradle of faith.

10. Faith is that food which nourishes the deities.

11. Faith is that potion which purifies one’s mental intake.

12. Faith is that potion which stabilises the intellect.

Faith changes man from a demon to a human being.

a) Faith changes man from a human being to a divine being.

b) Faith changes man from a divine being to God Himself.

c) All that is done with faith is true, it is sat.

d) All that is done without faith is untrue, it is asat.

Kamla, listen carefully! Do you have faith? The nature of your faith can be known through:

a) the proof of yagya, forbearance and charity in your life;

b) the proof of a stable intellect and the ability to love and to give one’s body in the service of others;

c) your ability to be uninfluenced by all qualities – others’ as well as your own.

d) Your ability to be uninfluenced by all qualities is the result of your faith.

e) Your ability to be uninfluenced by all qualities is the proof of your faith.

f) If your faith is true, divine qualities will necessarily flow through you.

g) Your adherence to duty is proof of your faith.

h) Joy, the absence of mental disturbance, indifference to self, all these are proof of faith.

i)  An attitude of equanimity in the face of acclaim and insult is the consequence of faith.

j)  The success of yoga is the boon of faith.

This faith is the mainstay of Truth;
And Truth is the call of faith;
Truth is the epitome of faith –
And Truth is the manifest form of faith.

Whatever one does devoid of faith is asat or untrue. Whatever one does in the Lord’s Name is sat or the Truth. If one is devoid of faith, whatever one does will neither yield joy in this life, nor bear fruits of joy for one’s future lives.

Therefore little one:

1. Acts devoid of faith are futile.

2. Such acts can never be successful.

3. Such acts become seeds of unhappiness within oneself.

अध्याय १७

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।

असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह।।२८।।

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन!

शब्दार्थ :

१. अश्रद्धा से जो आहुति दी हो,

२. (अश्रद्धा से) दान जो दिया हो,

३. (अश्रद्धा से) तप तपा हुआ,

४. और जो कुछ भी किया होता है,

५. वह असत् है, ऐसा कहते हैं।

६. वह कर्म न ही मर कर,

७. और न इस जन्म में (लाभदायक) होता है।

तत्त्व विस्तार :

श्रद्धा रहित कर्म असत्

भाई! ‘ओम् तत् सत्’ यदि श्रद्धा सहित कहते हो तो तत्पश्चात् जो भी करो, वह सत् है। गर श्रद्धा नहीं तो जो भी करो वह असत् है।

कमल! इस बात पर ज़रा ध्यान लगा कर समझ ले!

क) गर कर्ता भगवान है तब सब सत् है।

ख) यानि जब कर्तृत्व भाव अभाव से कोई कर्म करो, तो वह सत् है।

ग) जब भागवत् परायण होकर, भगवान के लिए कर्म करो तो वह सत् है।

घ) अपने आप को भूल कर कर्म करो तो वह सत् है।

श्रद्धा :

श्रद्धा ‘ओम् तत् सत्’ में होनी चाहिये। यानि, श्रद्धा:

1. ब्रह्म में चाहिये।

2. परम के स्वभाव में चाहिये।

3. पूर्ण ओम् ही है, इसमें चाहिये।

4. सद्भावना, साधुभाव भगवान के हैं, सद्भावना साधुभाव ही तप है, इनमें भागवद् नाम कवच है। सद्भावना, साधुभाव ही तप के आधारभूत हैं। ये तब ही उत्पन्न हो सकते हैं जब ‘सब वही है’, इसमें श्रद्धा हो।

5. श्रद्धा में यज्ञ, तप, दान निहित रहते हैं और यज्ञ, तप, दान का आधारभूत श्रद्धा है।

6. श्रद्धा ही वह पात्र है जिसमें साधक भगवान का प्रेम ग्रहण करता है।

7. श्रद्धा में वह बल है, जिसके राही साधक सब कुछ ग्रहण करता है।

8. श्रद्धा ही भगवान का आह्वान करती है।

9. श्रद्धा के ही पलने में भगवान पलते हैं।

10. श्रद्धा ही वह अन्न है जिसे खाकर देवत्व पुष्टि पाता है।

11. श्रद्धा ही वह औषध है जो मानसिक आहार पावन करती है।

12. श्रद्धा ही वह औषध है जो बुद्धि को स्थिर कर देती है।

भाई! श्रद्धा ही जीव को असुरों से इन्सान बनाती है।

– श्रद्धा ही जीव को इन्सान से देवता बनाती है।

– श्रद्धा ही जीव को देवता से भगवान बनाती है।

– श्रद्धा सहित जो भी किया हो, वह सत् ही किया होता है।

– श्रद्धा रहित जो भी किया हो, वह असत् ही किया होता है।

ध्यान रहे कमला! ज़रा सावधान होकर सुन!

आपमें क्या श्रद्धा है, इसे जानने के लिये,

क) यज्ञ, तप, दान ही प्रमाण हैं।

ख) स्थिर बुद्धि, प्रेम तथा तनोदान प्रमाण हैं।

ग) गुणातीतता श्रद्धा का परिणाम है।

घ) गुणातीतता श्रद्धा का प्रमाण है।

ङ) गर तेरी श्रद्धा सच्ची है, दैवी गुण तुझमें से बहेंगे ही।

च) कर्तव्य परायणता श्रद्धा का प्रमाण है।

छ) सुख, मनो व्याकुलता का अभाव, अपने प्रति उदासीनता, सभी श्रद्धा के प्रमाण हैं।

ज) मान अपमान में समचित्तता श्रद्धा का परिणाम है।

झ) योग की सफलता श्रद्धा का वरदान है।

यह श्रद्धा ही सत् का आधार है,

और सत् ही श्रद्धा की पुकार है।

यह सत् ही श्रद्धा का स्वरूप है,

और सत् ही श्रद्धा का रूप है।।

अश्रद्धा से जो भी करो, असत् है। भगवान के नाम पर जो भी करो सत् है। यदि श्रद्धा न हो तो जो भी किया जाये, वह अन्त में न तो इस जन्म में ही सुख देता है और न ही अगले जन्म में ही सुख देने वाले फल देता है।

नन्हूं!

– श्रद्धा रहित कर्म व्यर्थ हैं।

– श्रद्धा रहित कर्म सफलता रहित होते हैं।

– श्रद्धा रहित कर्म आन्तर दुःख के बीज बन जाते हैं।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुन संवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम

सप्तदशोऽध्याय: ।।१७।।

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