Chapter 17 Shloka 18

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।

क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।१८।।

That tapas which is performed as a

pretence to gain renown, honour or worship,

such tapas is unstable and capricious.

It is known as rajsic tapas.

Chapter 17 Shloka 18

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।

क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।१८।।

The Lord says, Arjuna!

That tapas which is performed as a pretence to gain renown, honour or worship, such tapas is unstable and capricious. It is known as rajsic tapas.

That tapas which is performed superficially to augment pride and hypocrisy is rajsic tapas.

First understand the word Dambh (दम्भ)

1. Dambh is deceit.

2. Dambh is the utilisation of fraudulent means.

3. Dambh connotes pretence.

4. Dambh creates an illusionary world.

5. Dambh projects the unreal as real out of a false sense of pride.

6. Dambh seeks self praise.

7. Dambh prompts arrogant speech.

8. A life of sin with a noble and innocent face is a play of dambh.

9. Dambh further strengthens the egoistic attitude.

10. Dambh seeks to rob the world and shield itself. Even though one may have no laudable attributes, dambh weaves a fabric of pretence and gains recognition from the world; thus one could say that such recognition and renown is in fact stolen. One did not deserve it since one had no matching qualities.

11. Those who inhere the attribute of dambh are unaware of their duty.

12. When such a one seeks to fulfil some desire, he often uses duty as a ‘front’ for his selfish designs.

13. These are artificial people who live in the unreal.

14. They are exhibitionists.

15. They are untrustworthy and unreliable.

The tapas practised by such people is also artificial, fraudulent and fraught with pride.

1. These are people hungry for recognition and renown.

2. These are people who wish others to worship them.

3. These people perform tapas for their self-establishment.

4. They endure many travails merely to establish themselves.

Such delusory and depraved souls who abide in rajas are veritable hypocrites.

Rajsic Tapas

1. Such people undertake several fasts.

2. They undertake several modes of worship.

3. They endure many physical travails and hardships.

4. They stand in water for hours.

5. They refuse food for several days at a time.

6. They stand out in the sun for hours.

7. They endeavour to brave the cold without adequate clothing.

8. They repeat countless mantras or scriptural verses.

9. They participate in continuous recitation of the Scriptures.

However, they do not let this tapas affect their inner being. They tolerate no opposition. They are afraid to fulfil the requirements of duty and flee from the very thought of having to serve another. In this way they indulge in rajsic tapas.

This tapas is neither practised in continuity for a substantial period of time, nor is it momentary. It is subject to change with the vagaries of the practicant’s mind. Once his desires are fulfilled, he undertakes a temporary practice of tapas as a thanksgiving. If, on the other hand, his desire is not fulfilled, he renounces any such practice. This tapas requires the unison of the mind and the intellect and in this case, it is unfortunately the intellect that follows the mind like a servant. This tapas does not involve the union of the intellect with the Truth because it is devoid of selfless thoughts and acts.

The tapas of the rajsic being is full of hypocrisy. Such a one engages in tapas while clinging to the desire for the fruits of actions in his mind. He seeks respect for his mind, praise for his life, his speech, and worship of his body-self. Such tapas is both temporary and unstable.

अध्याय १७

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।

क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।१८।।

भगवान कहते हैं, अर्जुन!

शब्दार्थ :

१. और जो तप,

२. सत्कार, मान और पूजा के लिए,

३. केवल दम्भ से ही किया जाता है,

४. यह अस्थिर तथा चंचल तप है,

५. यह राजस (तप) कहलाता है।

तत्त्व विस्तार :

जो तप दम्भ और दर्प अर्थ किया जाता है, वह राजसिक तप है।

दम्भ को प्रथम समझ ले।

दम्भ :

1. दम्भ धोखे को कहते हैं।

2. दम्भ छल कपट को कहते हैं।

3. दम्भ ढोंग को कहते हैं।

4. दम्भ पाखण्डी प्रपंच रचवाता है।

5. दम्भ, मिथ्या अभिमान के कारण अवास्तविक को वास्तविक दर्शाता है।

6. दम्भ आत्म स्तुति करवाना चाहता है।

7. दम्भ, दर्प पूर्ण वाक् कहलवाता है।

8. सौम्य तथा उज्ज्वल मुख, परन्तु पापाचारी जीवन दम्भ के कारण होता है।

9. दम्भ ही अहं की मान्यता को दृढ़ करता हैं।

10. दम्भ अपनी कामना पूर्ति के कारण अपने आपको छिपा कर जग से कुछ चुराना चाहता है। जैसे मान जनक गुण कोई है ही नहीं तो ढोंग रच कर जग से मान ले लिया; तो कहेंगे जो मान आपको मिला, वह आपने चुराया है; आपको मिलना नहीं चाहिये था, क्योंकि आपके पास कोई माननीय गुण नहीं था।

11. दम्भ पूर्ण लोग कर्तव्य से बेगाने होते हैं।

12. जब कर्तव्य पूर्ण करने के बहाने कोई चाहना पूरी करनी होती है तो वे कर्तव्य का भी ढोंग रचाते हैं।

13. वे बनावटी और अवास्तविक दर्शन करने वाले होते हैं।

14. वे दिखावे वाले लोग होते हैं।

15. वे विश्वासघाती लोग होते हैं।

ऐसे लोगों का तप भी तो बनावटी होगा; धोखा होगा, घमण्डपूर्ण ही होगा, क्योंकि वे,

– मान सत्कार के लोभी लोग होते हैं।

– अपनी पूजा करवाना चाहते हैं।

– अपनी स्थापति अर्थ अनेकों तप करते हैं।

– अपनी स्थापति अर्थ अनेकों कष्ट सहते हैं।

भाई! ये मिथ्याचारी भ्रष्ट गण होते हैं। रजोगुणी इन्हीं को कहते हैं।

रजोगुणी तप :

1. अनेकों व्रत ये धरते हैं।

2. अनेकों विधि कष्ट पूर्ण पूजा भी करते हैं।

3. शारीरिक कष्ट भी सहते हैं।

4. जल में भी खड़े रहते हैं।

5. कई कई दिन अन्न भी नहीं खाते।

6. धूप में भी खड़े रहते हैं।

7. सर्दी में भी तड़पते हैं।

8. बड़े मन्त्र जाप भी करते हैं।

9. अखण्ड पाठ भी धरते हैं।

पर अपने जीवन में यह सत् रूप तप नहीं करते। अपने जीवन में किसी विपरीतता को नहीं सहते।

यह कर्तव्य करते हुए डरते हैं, सेवा करने से दूर भागते हैं।

भाई! यह रजोगुणी तप है।

भाई! यह तप न तो दीर्धकाल तक रहता है, न ही केवल क्षणिक होता है। मनो चंचलता के साथ साथ यह भी बदलता रहता है। गर कामना पूर्ण हो गई तो फिर कर लिया; गर कामना पूर्ण नहीं हुई तो इसे छोड़ दिया। इस तप में मन और बुद्धि का संयोग होता है और बुद्धि मन के पीछे चाकर बन कर चलती है। इस तप में सत् और बुद्धि का संयोग नहीं होता, क्योंकि इसमें निष्काम भाव नहीं होता।

रजोगुणी का तप केवल दम्भ पूर्ण होता है। फल की चाहना मन में धर कर वह तप करते हैं। यानि, मन का आदर सत्कार चाहते हैं। जीवन या वाणी की प्रशंसा चाहते हैं, अपने तन का पूजन चाहते हैं, यह चंचल और अस्थिर तप होता है।

 

Chapter 17 Shloka 18

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।

क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्।।१८।।

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