Chapter 17 Shloka 13

विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम्।

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।१३।।

That yagya which is devoid of any prescribed method,

which is performed without the offering of edibles,

which is bereft of mantras and any gift to the Guru

and which is performed without faith,

is tamsic in nature.

Chapter 17 Shloka 13

विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम्।

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।१३।।

Bhagwan says, ‘Listen Arjuna!’

That yagya which is devoid of any prescribed method, which is performed without the offering of edibles, which is bereft of mantras and any gift to the Guru and which is performed without faith, is tamsic in nature.

The Lord says:

a) Any yagya performed merely to appease the mind;

b) Any yagya performed for the fulfilment of one’s likes;

c) Any yagya which is opposed to scriptural injunction;

d) Any yagya which opposes the basic principles enshrined in the Gita;

e) Any yagya which violates one’s code of duty;

f) Any yagya which diverts one from the divine qualities of the Lord;

g) Any yagya which opposes the Truth;

– is in fact a yagya devoid of scriptural method and correct procedure.

Living a life prescribed by the Scriptures is in fact a life of yagya. The yagya that pervades one’s entire life is the foremost yagya. Tamsic yagya violates this pure spirit of yagya.

That yagya which is performed without the offering of food to others – that is:

a) those actions which are performed only for oneself, whereby the other receives nothing;

b) those actions which are of no use to others;

c) those deeds which do not give any happiness to others;

d) that yagya which accords no respect to the Guru;

e) that yagya which does not provide any mental sustenance to another;

f) that yagya whereby intellectual food is not provided to another;

– all these constitute tamsic yagya.

Look Kamla!

1. To give of one’s qualities in the service of the world is a mark of sattva.

2. To produce any type of food as an offering for others is a mark of sattva.

3. To offer any potential one may have developed in the service of the world is a sign of sattva.

4. To give of one’s mental capacities for the benefit of others is a mark of sattva.

5. To offer one’s intellectual potential in the service of others is a sign of sattva.

Of all these, yagya of the intellect is by far the most superior because:

1. It gives the maximum happiness.

2. It is the most beneficial.

3. It is the most exalting.

One must remember that all we have discussed is an internal matter. Each one participates in action in the external world, but what really matters is the attitude that inspires the action.

The Lord states further that the yagya that is devoid of any mantra, is indeed tamsic in nature.

1. Prayer which is devoid of feeling;

2. Invocation which is devoid of yearning;

3. Yagya which is devoid of humility;

4. Worship which is bereft of a worshipful attitude;

5. Scriptural tenet which is read without any intention of obedience;

6. Conversation with the Lord which is devoid of meaning;

7. Lies which are spoken to the Lord;

– all such attitudes are indicative of tamsic yagya.

Such yagya, devoid of obedience to scriptural tenets and devoid of faith, can never be successful, whereas, a spiritual aspirant who truly chants a mantra, assimilates its meaning into practical life instantaneously.

Adakshinam (अदक्षिणम्)

a) Yagya which is devoid of gifts to the Teacher;

b) yagya which is devoid of truth;

c) yagya which is performed without dexterity and shrewdness;

d) yagya which is devoid of an obedient intellect;

e) when there is no intention of cogitation and subsequent assimilation of the scriptural injunctions in life;

f) yagya which is performed without the offering of the stipulated auspicious gifts;

– such yagya is said to be adakshinam.

Yagya devoid of faith

When tamsic individuals perform yagya:

1. They are not devoted to that yagya.

2. They have no faith in that yagya.

3. They have no interest in the aim of that yagya.

4. There is no intention of proving the mantras chanted during that yagya in one’s personal life.

Such a yagya is nothing but pretence, it is mere hypocrisy.

Tamsic yagya is performed by people filled with aberrations.

1. People enmeshed in moha, desire and anger perform this tamsic yagya.

2. Blinded by hopes and expectations they perform this tamsic yagya in the darkness of ignorance.

3. Their yagya is nothing but a show to accentuate their pride.

4. They perform yagya merely for the establishment of the ‘I’ and to establish the body-self.

Such is the tamsic yagya.

अध्याय १७

विधिहीनमसृष्टान्नं मंत्रहीनमदक्षिणम्।

श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।१३।।

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन :

शब्दार्थ :

१. विधिहीन,

२. बिन अन्न दिये,

३. मंत्रहीन, दक्षिणा रहित

४. और श्रद्धा रहित यज्ञ को,

५. तामस कहते हैं।

तत्त्व विस्तार :

भगवान कहते हैं कि जो यज्ञ विधिहीन होता है, यानि,

क) जो मनमानी करके किया जाये,

ख) जो केवल अपनी रुचि अनुसार किया जाये,

ग) जो शास्त्र कथन के विरुद्ध हो,

घ) जो गीता के मूल सिद्धान्तों के विरुद्ध हो,

ङ) जो कर्तव्य विरुद्ध हो,

च) जो भगवान के गुणों से विमुख करने वाला हो,

छ) जो सत्त्व के विरुद्ध करे,

वह विधिहीन है।

शास्त्रमय जीवन ही यज्ञमय जीवन है। जीवन यज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ यज्ञ है। जो जीवन यज्ञ को भंग करे, वह तामसिक यज्ञ है। जिसमें दूसरों को अन्न न दिया जाये, यानि,

1. जो कर्म केवल अपने ही कारण किया जाये, जिससे दूसरों को कुछ न मिले,

2. जो दूसरों के काम न आ सके,

3. जिसको करते हुए दूसरों को सुख न मिले,

4. जिस यज्ञ में गुरु सत्कार न हो,

5. जिस यज्ञ में दूसरों को मानसिक अन्न न मिले,

6. जिस यज्ञ में दूसरों को बुद्धि का अन्न न मिले,

वह तामसिक यज्ञ है।

देख कमला!

क) किसी भी गुण को उत्पन्न करके जग को देना सतोगुण है।

ख) किसी भी अन्न को उत्पन्न करके जग को देना सतोगुण है।

ग) किसी भी स्थूल गुण को उत्पन्न करके जग को देना सतोगुण है।

घ) किसी मनोगुण को उत्पन्न करके जग को देना सतोगुण है।

ङ) किसी बुद्धि गुण को उत्पन्न करके जग को देना सतोगुण है।

इसमें बुद्धि यज्ञ सर्वश्रेष्ठ कह लो, क्योंकि यह,

क) सर्वाधिक सुखदे है।

ख) सर्वाधिक श्रेयस्कर है।

ग) सर्वाधिक श्रेष्ठ बनाने वाला है।

याद रहे, यह गुण आन्तरिक हैं और आन्तरिक दृष्टिकोण में निहित हैं। बाह्य कर्म तो सब जीव करते ही हैं, उनमें निहित प्रेरक दृष्टिकोण देखना चाहिये।

भगवान कहते हैं कि जो यज्ञ मंत्रहीन हो, वह तामसिक यज्ञ होता है। यानि,

1. जिस प्रार्थना में भाव ही न हों,

2. जिस आरती में आर्त भाव ही न हो,

3. जो यज्ञ तो करे, पर सीस झुका न सके,

4. जो पूजा करे पर पूज्य भाव न हो,

5. जो मंत्र पढ़े, पर मनन की चाहना ही न हो,

6. जो निरर्थक बात करे भगवान से,

7. जो झूठी बात कहे भगवान को,

वह तामसिक यज्ञ है।

भाई! मंत्रहीन और श्रद्धाहीन यज्ञ करने के कारण यज्ञ सफल ही नहीं होता, वरना मंत्र के बोलते ही साधक उस मंत्र की प्रतिमा स्वयं बन जाता।

अदक्षिणम् :

क) जो यज्ञ बिना दक्षिणा दिये किया गया हो,

ख) सच्चाई से रहित किया गया हो,

ग) निपुणता तथा दक्षिणा से रहित किया गया हो,

घ) आज्ञाकारी बुद्धि से रहित किया गया हो,

ङ) जहाँ जीवन में मनन की सलाह ही न हो,

च) जो बिन शुभ दान दिये यज्ञ किया हो,

वह दक्षिणा रहित यज्ञ होता है।

श्रद्धा रहित :

तमोगुणी यज्ञ करने वालों की :

1. यज्ञ से लग्न ही नहीं होती,

2. यज्ञ में श्रद्धा ही नहीं होती,

3. यज्ञ के उद्देश्य में अभिरुचि ही नहीं होती,

4. यज्ञ में जो मंत्र कहे, उन्हें यथार्थ करने की सलाह ही नहीं होती,

यानि, उनका यज्ञ ढोंग ही होता है, धोखेबाज़ी ही होती है।

भाई! ये विभ्रान्त मनी लोग तामसिक यज्ञ करते हैं।

क) ये मोह जाल में फंसे हुए, काम क्रोध परायण लोग तामसिक यज्ञ करते हैं।

ख) ये आशा तृष्णा में अन्धे, अंधकार में फंसे हुए लोग तामसिक यज्ञ करते हैं।

ग) ये घमण्ड के कारण यज्ञ करते हैं, या कहें, घमण्ड के कारण ये यज्ञ का नाटक रचाते हैं।

घ) केवल ‘मैं’ की स्थापनार्थ ये यज्ञ करते हैं, केवल तन को स्थापित करने को ये यज्ञ करते हैं। यह तामसिक यज्ञ है।

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