Chapter 17 Shloka 7

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।

यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु।।७।।

There are three types of foodstuff

which are dear to all; so also, yagya,

tapas and daan are of three kinds.

Now hear about the differences

in the attributes in terms of these.

Chapter 17 Shloka 7

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।

यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु।।७।।

Elaborating on the differences in the attributes, the Lord now explains to Arjuna:

There are three types of foodstuff which are dear to all; so also, yagya, tapas and daan are of three kinds. Now hear about the differences in the attributes in terms of these.

Look little aspirant of the Truth! It seems as though the Lord is warning the spiritual aspirant by saying all this.

Most spiritual aspirants:

a) consider their faith to be superior;

b) consider their own method of tapas or austerity to be the greatest;

c) consider their own method of yagya to be the most exemplary;

d) consider their own type of charity to be the best.

The Lord is simply saying:

1. See yourself!

2. Recognise yourself.

3. Measure your faith.

4. Examine the motive behind your charity and alms giving.

5. Understand the spirit behind the actions of yagya which you perform.

6. You consider your actions superior – now examine them carefully and ask yourself if they are really superior.

Little one, man never doubts himself. Therefore Arjuna wanted to know that if an individual performed actions of yagya with faith but devoid of scriptural sanction, how could such faith be categorised?

The Lord clarifies that faith which is contrary to the Scriptures can be of three kinds. Having explained these variations, the Lord warns the sadhak, that he should understand his convictions and mental perspectives properly. If he does not pay heed to what the Scriptures say, his every deed will come under one of the three categories, sattvic, rajsic and tamsic.

Little one, it is imperative for the sadhak that:

a) he mould his life in accordance with scriptural injunction;

b) he endeavour to inculcate in himself the qualities described in the Scriptures;

c) he try to measure himself with the measuring rod provided by the Scriptures;

d) he obey the principles enunciated by the Scriptures.

Little one, one should follow those Scriptures whose veracity has been proved over the centuries. Then no matter to which religion they belong, they will be correct. However, you must remember that those Scriptures have been proved through the precept of the lives of the Rishis and sages who authored them. These sages were themselves the embodiment of those Scriptures. Thus they can be described as ‘living Scriptures’.

These days, people are said to be pursuing sadhana as they will. Therefore:

1. Their sadhana is never successful.

2. The present day devotee is devoid of the qualities of true devotion.

3. Even those who possess great knowledge, are not embellished with the qualities of divinity.

4. Even those who perform yagya are devoid of its spirit in their life.

5. Even those who perform austerities do not have the qualities of a tapasvi.

6. Those who practice yoga are not able to achieve perfection and union with the Supreme Object of yoga.

7. Despite renouncing the gross world, the sanyasi is unable to transcend the body.

8. Dharma is being destroyed in the universe.

9. Man is turning away from his duty.

If one moulds one’s life in accordance with scriptural decree:

a) life would be predominantly dutiful;

b) divine qualities would predominate one’s life;

c) virtue would gain precedence;

d) life would become less selfish and the will to do good to the greatest number would increase.

The Lord is explaining the qualities in detail in order to spur the spiritual aspirant to perform deeds in consonance with scriptural command. He is providing this knowledge of the differentiation present in the qualities in order to provide the sadhak with a measure to weigh his own values and convictions.

The Lord says, “O Arjuna, I shall now elucidate for you the three kinds of foods and yagya, tapas and daan.”

अध्याय १७

आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः।

यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं श्रृणु।।७।।

भगवान अब गुण भेद समझाते हुए कहते हैं कि अर्जुन!

शब्दार्थ :

१. आहार भी सबको तीन प्रकार से प्रिय होता है,

२. और वैसे ही यज्ञ, तप और दान भी तीन प्रकार के होते हैं।

३. उनके इस भेद को तू सुन !

तत्त्व विस्तार :

देख सत् याचिका नन्हूं! ऐसा प्रतीत होता है कि भगवान ये सब बातें साधक को सावधान करने के लिये कह रहे हैं।

अधिकांश साधक गण :

1. अपनी श्रद्धा को,

2. अपनी तप विधि को,

3. अपनी यज्ञ विधि को,

4. अपनी दान विधि को,

श्रेष्ठ मानते हैं। भगवान मानों कह रहे हों कि :

क) अपने आपको देख तो लो!

ख) अपने आपको पहचान तो लो!

ग) अपनी श्रद्धा को तोल तो लो!

घ) अपने दान के पीछे जो भाव है, उसे देख तो लो!

ङ) अपने यज्ञ को समझ तो लो!

च) अपने कर्म को तुम श्रेष्ठ कहते हो, तो तनिक ध्यान से देख तो लो कि क्या वह सच ही श्रेष्ठ है?

नन्हूं! जीव अपने पर कभी भी संशय नहीं करता, इस कारण अर्जुन ने पूछा था कि यदि श्रद्धा युक्त हुआ जीव शास्त्र विधि को त्याग कर यज्ञ करे, तो उसकी श्रद्धा कैसी है?

भगवान यह कह रहे हैं कि निष्ठा भी त्रैगुणी होती है। यह गुण समझा कर भगवान साधक को सचेत कर रहे हैं कि वह अपनी मान्यता तथा मानसिक दृष्टिकोण को समझ ले। यदि वह शास्त्र की बात नहीं मानता तो उसका हर कर्म सात्त्विक, राजसिक तथा तामसिक, इन तीनों में से एक है।

नन्हूं जाने जान्! साधक के लिए यह अनिवार्य है कि :

1. वह शास्त्र के अनुसार ही जीवन बनाने का प्रयत्न करे।

2. वह शास्त्र कथित गुणों को अपने में लाने का प्रयत्न करे।

3. वह शास्त्र कथित गुण तुला से अपने को तोलने का प्रयत्न करे ।

4. वह शास्त्र कथित सिद्धान्तों को मान ले।

नन्हूं! शास्त्र भी वे होने चाहियें जो सदियों से सिद्ध हो चुके हों। वे चाहे जिस भी धर्म के हों, ठीक ही हैं। किन्तु याद रहे! वे शास्त्र उनके रचयिता ऋषियों के जीवन के सहयोग राही प्रमाणित हो चुके हैं। उन शास्त्रों की प्रतिमा मानो उनके वक्ता और रचयिता लोग स्वयं ही थे, इस कारण वे शास्त्र सप्राण कहलाते हैं।

आजकल लोग शास्त्र विरुद्ध अपने मनमाने तरीके से साधना करते हैं। इस कारण :

क) साधना सफ़ल नहीं होती।

ख) भक्तों में भक्तिपूर्ण गुण नहीं आते।

ग) बहुत ज्ञान जानने वाले भी दैवी गुण सम्पन्न नहीं होते।

घ) यज्ञ करने वाले भी यज्ञमय जीवन से वंचित रह जाते हैं।

ङ) तप करने वाले भी तपस्वी नहीं बन पाते।

च) बहुत योगाभ्यास करने वाले भी योग सिद्धि नहीं पाते।

छ) स्थूल संन्यास लेकर भी लोग तन से नहीं उठ पाते।

ज) जग में धर्म का नाश हो रहा है।

झ) जग में जीव कर्तव्य विमुख हो रहे हैं।

यदि जीवन शास्त्र विधि अनुकूल यज्ञमय बन जाये, तो जीवन :

1. कर्तव्य प्रधान हो जायेगा।

2. दैवी गुण प्रधान हो जायेगा।

3. साधुता पूर्ण हो जायेगा।

4. स्वार्थी कम हो जायेगा और सर्वभूत हित करने की वृत्ति बढ़ जायेगी; इत्यादि।

साधक को शास्त्र विधि अनुकूल साधना करने के लिए प्रेरित करने को, भगवान गुणों को सविस्तार समझा रहे हैं। यह गुण भेद वह साधक को अपनी मान्यता को तोलने के लिए दे रहे हैं।

भगवान कहते हैं ले अर्जुन! तुझे अब तीन प्रकार का आहार, और ऐसे ही, यज्ञ, तप और दान भी समझाता हूँ।

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