Chapter 17 Shloka 3

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।

The Lord says:

O Bharat! The faith of each one

depends on his intrinsic disposition.

Man is constituted of his faith.

He is what his faith is.

Chapter 17 Shloka 3

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।

The Lord says:

O Bharat! The faith of each one depends on his intrinsic disposition. Man is constituted of his faith. He is what his faith is.

The basis of faith

Little one, the faith of the jivatma:

a) is dependent on his internal disposition;

b) is determined by his intrinsic character;

c) is dependent on his basic values;

d) is based on his view on life;

e) is the essence of his life;

f) reveals his intention;

g) determines his code of conduct in life.

The internal core of a person, including his conscious, subconscious and unconscious mind-stuff, reveals his intrinsic faith. The thought processes of the mind and his mental aberrations and complexes mould the faith of the person and accord it varied hues and qualities.

Little one, the Lord says that man is what his faith is. Man is not known by his gross actions or words. He is not what he appears to be. He is what he believes – what he basically has faith in. It is that faith which inspires his life’s deeds.

If the aspirant develops faith in the Lord, he will become akin to the Lord.

Faith – the armour against adversity

Faith is the armour that produces mental detachment towards the obstacles in the sadhak’s path and renders him indifferent to his travails. Thus, no adversity can touch such a one. Where there is faith, the capacity to withstand adversity also co-exists; there, patience and intellect also exist; the inclination of the mind is also there; the body and the sense organs also rally around to support the aspirant’s basic yearning.

You are in essence what your mind-stuff is comprised of. You are what your desire is. Even though your visage may be radiant, if there is no luminosity within, you are not really beautiful. Therefore, it is not necessary that your physical appearance will reveal the real you.

O aspirant, listen! The Lord has not spoken of relinquishing the method prescribed by the Scriptures. He simply bids us to measure our own faith. He is revealing to us the varied facets of faith and is silently saying:

1. Gauge your faith!

2. Become aware of the quality of your faith.

3. Know your true self.

If your faith is sattvic:

a) you will conform to the Scriptures;

b) you are truly a pilgrim of the spiritual path;

c) you will not lose your way;

d) no obstacle will be able to stop your progress on the path;

e) you are basically sattvic by nature.

However, if you have faith in the Supreme, you will diligently gauge the viewpoint of the Lord, and seeing His proof in life, you will follow His precept.

अध्याय १७

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।

श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः।।३।।

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन!

शब्दार्थ :

१. सभी मनुष्यों की श्रद्धा,

२. उनके मौलिक आन्तरिक चरित्र के अनुकूल होती है।

३. यह जीवात्मा श्रद्धामय है,

४. इसलिए जो जैसी श्रद्धावाला है,

५. वह वैसा ही होता है।

तत्त्व विस्तार :

श्रद्धा का आधार :

नन्हीं! भगवान कहते हैं कि श्रद्धा जीवात्मा के,

क) आन्तरिक चरित्र पर आधारित है।

ख) आन्तरिक चरित्र के अनुसार होती है।

ग) मौलिक भाव, यानि मौलिक मूल्य पर आधारित है।

घ) जीवन के अभिप्राय पर आधारित है।

ङ) जीवन का सारांश होती है।

च) जीवन का तात्पर्य अभिव्यक्त करती है।

छ) जीवन का आचरण तथा गतिविधि नियुक्त करती है।

अन्तःकरण, यानि चेत, अर्ध चेत, और अचेत तथा चित्त, यह सब श्रद्धा को ही दर्शाते हैं। मनोभाव तथा मानसिक विकार श्रद्धा को विभिन्न गुण पूर्ण करते हैं। मानसिक ग्रन्थियाँ तथा संकल्प विकल्प भी श्रद्धा को प्रभावित करते हैं।

नन्हूं! भगवान कहते हैं कि जैसी जीव की श्रद्धा होती है, वैसा ही वह होता है। देख! स्थूल कार्य से और बातों से जीव नहीं जाना जाता। जो वह दिखता है, वह, वह नहीं होता। भगवान कहते हैं, ‘जैसी उसकी आन्तरिक, सूक्ष्म श्रद्धा है, वह वही होता है।’ वह श्रद्धा ही उसे जीवन में प्रेरित करती है।

गर साधक की भगवान में श्रद्धा हो जाये तो वह भगवान के धर्म वाला हो जायेगा, अर्थात् भगवान जैसा ही हो जायेगा।

श्रद्धा, प्रतिकूलता के प्रति कवच :

श्रद्धा ही वह कवच है जो साधक के पथ में विघ्नों के प्रति उसमें निरपेक्षता तथा उदासीनता ले आता है। तब कोई भी विपरीतता उस पर प्रहार नहीं कर सकती। जहाँ श्रद्धा होती है, वहाँ प्रतिकूलता सहने की शक्त भी होती है, वहाँ धैर्य और बुद्धि भी होती है, वहाँ मन की रुचि भी होती है, वहाँ तन भी आपका साथ देता है और इन्द्रियन् का साथ भी होता है।

जैसे आपका चित्त है, वैसे ही आप हैं। जैसे आपकी इच्छा है वैसे ही आप हैं। आपका चेहरा चाहे उज्ज्वल हो, परन्तु यदि आपका आन्तर उज्ज्वल नहीं, तो आप उज्ज्वल नहीं। यह सत्य नहीं कि आपका चेहरा अवश्य ही आपका अस्तित्व दर्शाये।

साधक देख! भगवान ने शास्त्र विधि त्याग करने की बात नहीं कही, वह कहते हैं, अपनी श्रद्धा तोल लो। वह श्रद्धा के रूप दर्शा रहे हैं और मानो बिन कहे कह रहे हैं कि :

1. अपनी श्रद्धा तोल लो।

2. अपनी श्रद्धा के गुण देख लो।

3. अपने आप को जान लो।

यदि सात्त्विक श्रद्धा है, तो :

– तू शास्त्र अनुकूल ही है,

– तू सत् पथ पथिक ही है,

– तू गुमराह नहीं होगा,

– तुम्हें कोई भी विघ्न पथ से भ्रष्ट नहीं कर सकेगा,

– तू सात्त्विक ही है।

किन्तु गर परम में श्रद्धा है, तब भगवान के दृष्टिकोण को परम को, तोल तोल कर, परम का जीवन में प्रमाण देख कर, तुम उसका अनुसरण करोगे।

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