THE THREEFOLD CLASSIFICATION OF FAITH

Chapter 17 Shloka 1

अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।

तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।१।।

Arjuna asks Lord Krishna:

Those who offer worship with full faith

but without observing scriptural injunctions,

of what nature is their faith

sattvic, rajsic or tamsic?

The Threefold Classification of Faith

Chapter 17 Shloka 1

अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।

तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।१।।

Arjuna asks Lord Krishna:

Those who offer worship with full faith but without observing scriptural injunctions, of what nature is their faith – sattvic, rajsic or tamsic?

In chapter 16, shloka 24 the Lord has stated:

1. Scriptures are the criterion for judging actions as dutiful or devoid of duty.

2. Only such actions should be done as are in accordance with scriptural decree.

Arjuna asks, “Several people worship with great faith but are ignorant of the method prescribed by the Scriptures. Is this wrong?”

Worship devoid of scriptural sanction

Many people worship the Lord in many different ways. Despite great faith:

1. Their methods of spiritual practice differ.

2. Their perspective differs.

3. There is a difference in their code of life.

4. There is a difference in their understanding.

Yet, they all worship with faith. The aspirant of spirituality proceeds with his spiritual practice with faith. He worships the Gods, or Brahm Himself with complete faith. However, because the Lord has said that only those actions are worth performing which are in conformity with scriptural decree, therefore the question arises, “If one has faith and one engages in worship, but if that worship is devoid of spiritual sanction, how can such faith be categorised? Does it belong to the category of sattva, rajas or tamas?”

My little one,

1. Shraddha or deep faith changes one’s perspective of life.

2. Faith changes the values of the individual.

3. Where there is faith the individual becomes a worshipper of the qualities of the Supreme.

4. Faith kindles the individual’s yearning for those qualities.

5. Faith changes a man into a servitor of the Supreme qualities.

6. Faith leads him to serve those who possess the qualities of the Supreme.

7. Imbued with faith, the individual imbibes those qualities of the Supreme.

8. In faith, man forgets himself and learns to live for the other.

9. Faith transforms the life of man into a veritable yagya – a selfless offering to the Lord.

10. Imbued with faith, man follows the path of selfless deeds.

a) Faith is reflected in a man’s perspective of life.

b) Faith is reflected in a man’s outlook towards other men.

c) Faith epitomises a man’s true essence.

However, faith too has three classifications – sattvic, rajsic and tamsic.

Arjuna asks the Lord, “He who renounces the method prescribed in the Scriptures, yet worships with faith, how is such faith to be categorised?”

अथ सप्तदशोध्याय:

अर्जुन उवाच

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः।

तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः।।१।।

अर्जुन पूछते हैं भगवान श्री कृष्ण से,

शब्दार्थ :

१. जो पुरुष शास्त्र विधि त्याग कर,

२. श्रद्धा से युक्त हुए पूजा करते हैं,

३. हे कृष्ण! उनकी निष्ठा कौन सी है – सात्त्विक, राजसिक, या तामसिक?

तत्त्व विस्तार :

भगवान ने 16/24 में कहा था कि,

क) कर्तव्य अकर्तव्य में शास्त्र प्रमाण हैं।

ख) शास्त्र में विधान किये हुए कर्म ही करने योग्य हैं।

अर्जुन पूछते हैं कि अनेकों लोग बहुत श्रद्धा से पूजा करते हैं किन्तु वे शास्त्र विधि को नहीं जानते, क्या वे ग़लत हैं?

शास्त्र विधि रहित पूजन :

विभिन्न लोग, विभिन्न ढंग से पूजा करते हैं भगवान की! बहुत श्रद्धा होते हुए भी उनकी :

क) साधना विधि में भेद होता है।

ख) दृष्टिकोण में भेद होता है।

ग) जीवन प्रणाली में भेद हो जाता है।

घ) समझ में भी भेद हो जाता है।

पूजा तो यह सब श्रद्धा से ही करते हैं; साधक साधना करता है, तो श्रद्धा से ही करता है। वह देवी, देवता, भगवान या ब्रह्म की उपासना तो श्रद्धा से ही करता है; परन्तु, क्योंकि भगवान ने कहा है कि शास्त्र में विधान किए हुए कर्म ही करने योग्य हैं और शास्त्र में विधान की हुई विधि का अनुसरण करना चाहिये, इस कारण यह प्रश्न उठता है कि, “यदि श्रद्धा हो और पूजा हो, परन्तु शास्त्र विधि अनुकूल न हो, तो यह श्रद्धा कैसी हुई; सात्त्विक, राजसिक, या तामसिक?”

मेरी जान्! एक बात समझ ले।

1. श्रद्धा से दृष्टिकोण बदलना है।

2. श्रद्धा से भाव बदलना है।

3. श्रद्धा से जीव परम गुण उपासक बनता है।

4. श्रद्धा से जीव परम गुण याचक बनता है।

5. श्रद्धा से जीव नित्य परम गुण का चाकर बनता है।

6. श्रद्धा से जीव परम गुण पूर्ण जीवों का नौकर बनता है।

7. श्रद्धा से जीव अपने में परम गुण लाता है।

8. श्रद्धा से जीव अपने आप को भूल कर दूसरे के लिये जीना सीखता है।

9. श्रद्धा से जीव का जीवन यज्ञमय बनता है।

10. श्रद्धा राही जीव निष्काम कर्म पद्धति का अनुसरण करता है।

श्रद्धा को,

– जीव का जीवन की ओर दृष्टिकोण कह लो।

– जीव का दूसरे जीवों की ओर दृष्टिकोण कह लो।

– जीव का वास्तविक स्वरूप कह लो।

किन्तु यह श्रद्धा भी तीन प्रकार की होती है, सात्त्विक, राजसिक, तथा तामसिक।

अर्जुन पूछते हैं, “जो पुरुष शास्त्र विधि त्याग कर, श्रद्धा युक्त होकर पूजन करते हैं, वह कैसा पूजन होता है?”

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