Chapter 16 Shloka 23

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।२३।।

Those who ignore the dictates of the Scriptures

and act in accordance with their desire,

they neither attain perfection, nor achieve

the supreme goal, nor even happiness.

Chapter 16 Shloka 23

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।२३।।

The Lord says, O Arjuna!

Those who ignore the dictates of the Scriptures and act in accordance with their desire, they neither attain perfection, nor achieve the supreme goal, nor even happiness.

My dear little one, first understand the connotation of relinquishing scriptural decree.

1. One who overlooks the injunctions of the Scriptures, or oversteps the code of life described therein.

2. One who does not understand the injunctions in their true perspective and thus acts contrary to them.

3. One who gives false interpretations to those commands and acts accordingly.

4. One who lives in ignorance of knowledge of the Truth.

5. One who lives in unawareness of the importance of duty and the significance of the karmachakra – the cycle of action.

6. One who conducts his life without giving a thought to what is Truth and what is untrue.

7. One who, oblivious of the commandments of the Scriptures, becomes a slave of his desires.

– Such a one does not attain perfection, nor the Supreme Goal. Such a one can never be happy.

The measuring scale of the cycle of birth and death, and of the wheel of actions

Scriptures connote:

a) A command.

b) A code of life.

c) The law of living.

d) The dharma of life.

e) A method of living life.

f) The justice of Brahm Himself.

Look, it has been said before:

1. The Scriptures are the measure for man’s actions.

2. The fruits of action are based on principles laid down in the Scriptures.

3. Actions are measured by the laws laid down in the Scriptures; thereafter, the individual is meted out the fruits of his actions.

4. The Scriptures delineate the path of shreya – the northward path.

5. The Scriptures describe the one who treads the path of shreya.

6. The Scriptures describe the method for traversing this northward path.

7. The Scriptures elucidate the attributes of the Supreme that are worthy of attainment.

8. The Scriptures also enumerate those demonic qualities which must be renounced.

9. Even the means to attain the qualities of the Supreme are given only in the Scriptures. These are:

­­–  Discrimination between Truth and untruth.

­­–  Discernment of the qualities.

­­–  Discrimination between the gross, inert and the live consciousness.

­­–  Understanding of the state of the sthit pragya.

­­–  Understanding of the body-self and the Atma.

­­–  Understanding of action, duty and yagya.

­­–  An understanding of knowledge, ignorance and the translation of knowledge into life’s practice.

Having explained all these, the Scriptures also reveal the path to union with the Supreme through the practical application of scriptural tenets in life.

In fact:

1. The Scriptures describe a unique attitude of living.

2. They speak of the presence of the Supreme Witness.

3. They speak of the interaction of qualities.

4. They speak of living life in conformity with Lord Krishna’s Word.

5. They tell us how to live like Ram, Krishna, Christ, Nanak and Mohammed.

The Lord clarifies that those who transgress the code of conduct laid down by the Supreme Lord cannot attain perfection.

1. Their well-being is forfeited.

2. They can never prosper.

3. They can never enjoy good repute.

4. They can never be whole.

5. Their life remains unsuccessful.

6. The sum total of their life misses its goal.

Such people do not attain the knowledge of Truth in their entire lifetime. They cannot attain the Supreme Goal nor attain liberation. They neither gain freedom from living this futile life nor attain peace.

Perfection and attainment of the Supreme remain a far cry – such people are bereft of even simple happiness.

a) Truly, how can the demonic be happy?

b) How can one who is dependent on external factors ever be happy?

c) How can one who is imbued with desire, pleasure seeking, greed and anger ever find happiness?

d) Those blind men who do not even consider the other to be a human being, cannot attain happiness.

e) How can those who are devoid of love, mercy, forgiveness and fellow feeling ever be happy?

अध्याय १६

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।

न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्।।२३।।

भगवान कहते हैं, हे अर्जुन!

शब्दार्थ :

१. जो पुरुष शास्त्र की विधि को त्याग कर

२. कामना के कारण वर्तते हैं,

३. वे न सिद्धि पाते हैं, न परम गति पाते हैं और न ही सुख पाते हैं।

तत्त्व विस्तार :

मेरी नन्हीं जान्!

‘शास्त्र विधि त्याग’ का अभिप्राय प्रथम समझ ले। यानि, जो शास्त्र कथित,

1. आदेश का, जीवन नियमों का, प्रशिक्षण का उल्लंघन करते हैं,

2. प्रशिक्षण को यथार्थ न समझ कर, उसके विपरीत आचरण करते हैं,

3. प्रशिक्षण को अनुचित अर्थ देकर वर्तते हैं,

4. तत्त्व ज्ञान न जानते हुए, जीवन व्यतीत करते हैं,

5. कर्तव्य और कर्म राज़ न जानते हुए जीवन में वर्तते हैं,

6. सत् असत् पर चित्त न धरते हुए, जीवन में विचरते हैं,

7. आदेश भूल कर अपनी अपनी कामना का चाकर बन कर विचरते हैं,

वे लोग न सिद्धि पाते हैं और न परम गति; न ही वे सुख पाते हैं।

जन्म मरण कर्म चक्र तुला :

पुनः समझ! शास्त्र का अर्थ ही,

क) आदेश है।

ख) जीवन नियम है।

ग) जीवन का कानून है।

घ) जीवन का धर्म है।

ङ) जीवन की प्रणाली है।

च) ब्रह्म का न्याय शास्त्र है।

देख! ज्यों आगे भी कह आये हैं,

1. जीव के कर्म की तुला भी शास्त्र ही होता है।

2. कर्म फल शास्त्र कथित सिद्धान्तों पर आधारित होता है।

3. जीव के कर्म शास्त्र कथित विधान से तोले जाते हैं; तत्पश्चात् जीव को कर्म फल मिलता है।

4. शास्त्रों में श्रेय पथ प्रदर्शित होता है।

5. शास्त्रों में श्रेय मार्ग अनुयायी की बातें होती हैं।

6. जीवन में उत्तरायण की ओर जाने की विधि उनमें कही होती है।

7. जीवन में प्राप्तव्य परम गुण शास्त्रों में वर्णित होते हैं।

8. जीवन में त्याज्य आसुरी गुण शास्त्रों में विवृत होते हैं।

9. परम गुण पाने की विधि भी शास्त्र ही बताते हैं। यानि,

– सत् असत् विवेक,

– गुण विवेक,

– जड़ चेतन विवेक,

– स्थित प्रज्ञ स्वरूप विवेक,

– तन तथा आत्म विवेक,

– कर्म, कर्तव्य, यज्ञ विवेक,

– ज्ञान, अज्ञान, तथा विज्ञान विवेक, शास्त्रों में निहित होता है।

ये सब कह कर, शास्त्र ही परम में विज्ञानमय स्थिति पाने के पथ भी कहते हैं।

वास्तव में शास्त्र जीवन में,

क) अलौकिक दृष्टिकोण की बात कहते हैं।

ख) परम के साक्षित्व की बात कहते हैं।

ग) गुण वर्तन की बात कहते हैं।

घ) राम के समान जीवन की विधि की बात कहते हैं।

ङ) श्याम के समान जीवन की विधि की बात कहते हैं।

च) राम, कृष्ण, ईसा मसीह, नानक, मुहम्मद के समान जीवन की विधि की बात कहते हैं।

भगवान यह कहते हैं, “जो जीव शास्त्र कथित परम विधान का उल्लंघन करते हैं, वे सिद्धि नहीं पाते” यानि, उन लोगों की,

1. भलाई नहीं होती।

2. समृद्धि नहीं होती।

3. प्रतिष्ठा नहीं होती।

4. सम्पूर्ति नहीं होती।

5. जीवन सफल नहीं होता।

6. जीवन सारांश सफलता नहीं पाता।

वे लोग तत्त्व ज्ञान नहीं पाते जीवन भर। न ही वे परम गति पाते हैं और न ही वे मोक्ष पाते हैं। वे जीवन से मुक्त नहीं होते और न ही जीवन में चैन पाते हैं। भाई! सिद्धि और परम गति तो दूर रही, वे तो सुख भी नहीं पाते! सच ही तो है :

क) आसुरी सम्पदा पूर्ण लोग सुख क्या पायेंगे?

ख) पर आश्रित लोग सुख क्या पायेंगे?

ग) हर पल काम, उपभोग, लोभ और क्रोध पूर्ण लोग सुख क्या पायेंगे?

घ) दूसरे को इन्सान न मानने वाले अन्धे सुख क्या पायेंगे?

ङ) जो प्रेम, दया, क्षमा, सहानुभूति से वंचित हों, वे सुख क्या पायेंगे?

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