Chapter 16 Shloka 22

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।

आचरत्यामनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्।।२२।।

Arjuna! Freed from these three gates of tamas,

man conducts himself in a manner

conducive to his salvation.

Then he attains the Supreme Goal.

Chapter 16 Shloka 22

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।

आचरत्यामनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्।।२२।।

Speaking of the fruits of renunciation of desire, anger and greed, the Lord says:

Arjuna! Freed from these three gates of tamas, man conducts himself in a manner conducive to his salvation. Then he attains the Supreme Goal.

O aspirant of Truth, Abha! The Lord has described desire, anger and greed as the three gates of tamas.

Tamas

1. Tamas is that sheet which conceals the Truth.

2. Tamas is that cloak which does not allow one to perceive the Truth.

3. Tamas distorts the attributes and features of objects.

4. Tamas does not allow the intellect to function correctly.

5. Tamas gives rise to the intellect that is subservient to the body.

6. Tamas identifies the individual with the body-self.

Little one, the attribute of rajas increases after tamas has taken birth. Tamas in turn, increases with the occurrence of rajas. Desire, anger and greed emerge from the gateway of tamas and then expand.

The Lord says, “If these gateways of tamas are closed, man will tread the path which is beneficial for him. He will travel the shreya path, the path of spiritual advancement.”

If there is no desire, anger or greed in the individual:

a) the gates of hell will automatically be sealed;

b) cruel actions will cease;

c) false and deceitful conduct will end;

d) tyrannical deeds, actions motivated by desire, ego, hatred, rejection – all these will be nullified;

e) injustice, venom against others and the cause for deceit will cease;

f) absorption in the unreal will cease.

Little one, these gateways of tamas are actually the basis of demonic interaction. If desire, anger and greed are terminated, divinity will automatically be attained. The attribute of sattva submerges because of these three.

Desire is the seed of demonism. Selflessness is the seed of divinity. If desire no longer exists, the actions of the individual will naturally become devoid of selfishness.

1. Selfless deeds are the path of shreya – the northward path.

2. Selfless actions are the route towards union with the Supreme.

3. Selfless actions pave the path of a life of yagya.

4. The spirit of duty predominates in selfless deeds.

5. Selfless deeds are the deeds of the Supreme Himself.

If desire is annihilated:

a) one’s worship will become devoid of desire and hence selfless;

b) one’s knowledge will become devoid of desire, and hence selfless;

c) one’s actions too, will be free of desire, and hence selfless.

It is then that the individual’s gyan or knowledge will immediately be converted to vigyan – the scientific application of that knowledge in deeds. Whatever knowledge he receives or encounters will at once flow into his life. He will become an embodiment of that knowledge that very moment. He will attain That State.

अध्याय १६

एतैर्विमुक्तः कौन्तेय तमोद्वारैस्त्रिभिर्नरः।

आचरत्यामनः श्रेयस्ततो याति परां गतिम्।।२२।।

अब भगवान काम, क्रोध तथा लोभ के त्याग का फल कहते हुए कहने लगे कि :

शब्दार्थ :

१. हे अर्जुन! तम के इन तीन द्वारों से छूटा हुआ,

२. पुरुष अपने कल्याण का आचरण करता है।

३. फिर वह परम गति को प्राप्त होता है।

तत्त्व विस्तार :

सत्य अभिलाषिणी नन्हीं आभा!

भगवान ने काम, क्रोध और लोभ को तम के द्वार कहा है।

तम :

क) तम वह चादर है जो सत्त्व को छिपा देती है।

ख) तम वह आवरण है जो सत्य को देखने नहीं देता।

ग) तम वह आवरण है जो गुणों को विकृत कर देता है।

घ) तम वह आवरण है जिसके कारण जीव की बुद्धि काम नहीं करती।

– तम ही देहात्म बुद्धि को जन्म देता है।

– तम ही जीव को देह के तद्‍रूप कर देता है।

नन्हूं! तम के जन्म के बाद ही रजो गुण का वर्धन होता है और रजोगुण के बढ़ने पर तमोगुण और बढ़ जाता है। तम के द्वार से ही काम, क्रोध और लोभ निकलते हैं और बढ़ते हैं।

भगवान कहते हैं, ‘यदि ये तम के द्वार बन्द हो जायें तो मनुष्य अपने कल्याणमय पथ का आचरण करेगा। तब वह स्वतः श्रेय पथ का आचरण करेगा।’ क्योंकि नन्हीं जान्!

यदि जीव में, काम, क्रोध और लोभ न हों तो :

1. नरक के द्वार स्वतः बन्द हो जाते हैं।

2. क्रूर कर्म स्वतः बन्द हो जाते हैं।

3. मिथ्यात्व पूर्ण आचरण स्वतः बन्द हो जाते हैं।

4. सकाम कर्म, अहं प्रेरित कर्म, घृणा, द्वेष और अत्याचार करने का कारण ही नहीं रहेगा।

5. अन्याय, किसी के प्रति वैमनस्य और किसी को धोखा देने का कारण ही नहीं रहेगा।

6. अवास्तविकता में रमण बन्द हो जायेगा।

नन्हूं! वास्तव में, असुरत्व पूर्ण व्यवहार की नींव ये तम के द्वार काम, क्रोध और लोभ ही हैं। यदि काम, क्रोध और लोभ न रहें तो देवत्व स्वतः सिद्ध हो जायेगा। सतोगुण, काम क्रोध और लोभ के कारण डूबता है।

काम ही बीज है असुरत्व का, निष्कामता ही बीज है देवत्व का। काम न रहे तो कर्म निष्काम हो जाते हैं। निष्काम कर्म ही तो,

क) श्रेय पथ है।

ख) परम मिलन का पथ है।

ग) यज्ञमय पथ है।

घ) कर्तव्य प्रधान कर्म है।

ङ) परम के अपने कर्म हैं।

च) यज्ञ रूप हैं।

कोई कामना ही न रही तो :

– पूजा भी निष्काम हो जायेगी।

– ज्ञान भी निष्काम हो जायेगा।

– कर्म भी निष्काम हो जायेंगे।

तब ही तो जीव जो भी ज्ञान पायेगा, तत्काल विज्ञान में परिणित हो जायेगा। या यूँ कह लो, ज्ञान के मिलते ही, ज्ञान के समक्ष आते ही जीव उसे जीवन में ला सकेगा। तब जीव इक पल में उसकी प्रतिमा बन जायेगा। परम गति तो तब वह पा ही लेगा।

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