Chapter 16 Shloka 16

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।१६।।

With their mind-stuff deluded in several ways,

such people are entangled in the mesh of moha,

and addicted to desires and sense enjoyment,

they sink into the most degraded hell.

Chapter 16 Shloka 16

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।१६।।

In respect of such persons the Lord observes:

With their mind-stuff deluded in several ways, such people are entangled in the mesh of moha, and addicted to desires and sense enjoyment, they sink into the most degraded hell.

1. One who is unable to see the Truth is bound to be deluded in many ways.

2. He who cannot see the false to be false is indeed deluded.

3. He who sees the Truth as false labours under an illusion.

4. One who is unable to see reality dwells in darkness.

5. One who is addicted to desire fulfilment and sense gratification:

­­–  is blind indeed;

­­–  is fettered by moha;

­­–  is depraved.

6. A person who cannot see that the other is a human being, is nothing if not blind.

7. A person who cannot understand where his duty lies is indeed blind.

Look Kamla Bhabhi! This applies not only to the common man – even those in the garb of sadhus are addicted to sense gratification. Such people can never speak the truth. They even betray those who come to seek their refuge. They laud even demonic souls and label it as humility. They speak words of knowledge but do not mould their lives in accordance with their words. Their attachment prevents them from doing so.

This attachment could be:

a) with knowledge of the Truth or with the joy derived thereof;

b) with wealth;

c) with any attribute;

d) with their own name or renown.

­­–  Attachment turns one away from the path of Truth.

­­–  Attachment augments greed.

­­–  Attachment blinds one to reality.

­­–  Attachment enmeshes one in illusion.

1. Moha and attachment cause enmities.

2. Jealousy arises due to moha and attachment.

3. The individual then stoops to greed and nefarious deeds.

4. He also becomes capable of robbing others.

5. These qualities cause the individual to find fault and deride others.

6. These attributes cause the individual to stiffen with pride and vanity.

7. They motivate the individual towards anger and sin.

The Lord says, when one harbours a desire or craves gratification of the senses, the intellect becomes indiscriminate and the individual becomes wicked. That individual relinquishes all attributes of divinity and becomes demonic. He descends into hell, he becomes completely corrupt.

अध्याय १६

अनेकचित्तविभ्रान्ता मोहजालसमावृताः।

प्रसक्ताः कामभोगेषु पतन्ति नरकेऽशुचौ।।१६।।

भगवान ऐसे लोगों के बारे में बताते हैं,

शब्दार्थ :

१. अनेक प्रकार से भ्रमित हुए चित्त वाले,

२. मोह रूपा जाल में फंसे हुए लोग होते हैं,

३. काम और भोग में आसक्त हुए,

४. ये लोग अपावन नरक में गिरते हैं।

तत्त्व विस्तार :

भाई!

क) जो सत् न देखे, वह अनेक प्रकार से विभ्रान्त ही होगा।

ख) असत् को जो असत् न माने, वह विभ्रान्त ही होगा।

ग) जो सत् को असत् जाने, वह विभ्रान्त ही होगा।

घ) जो वास्तविकता देख ही न सके, वह विभ्रान्त ही होगा।

ङ) जो वास्तविकता समझ ही न सके, वह विभ्रान्त ही होगा।

च) जो काम उपभोग में अत्यन्त आसक्त हो,

– वह अन्धा ही हो जाता है।

– वह मोह ग्रसित ही होता है।

– वह विभ्रान्त चित्त ही होता है।

छ) जिसे दूसरा इन्सान ही नहीं दिखता, वह अन्धा नहीं तो और क्या है?

ज) जिसे कर्तव्य समझ ही न आये, वह अन्धा ही तो है।

देख कमला भाभी! केवल साधारण जीव ही नहीं, साधु के भेष में भी लोग काम उपभोग आसक्त होते हैं। वे सच नहीं बोल सकते। जो उनकी शरण में आये, वे उन्हें भी धोखा देते हैं। असुर को भी वे श्रेष्ठ कह देते हैं और इसे विनम्रता कहते हैं। वे ज्ञान की बातें करते हैं पर ज्ञान पूर्ण जीवन जी नहीं सकते, क्योंकि इनका कहीं न कहीं संग हो गया है।

संग चाहे :

1. सतोगुण रूप ज्ञान और सुख से हो;

2. धन दौलत से हो;

3. किसी भी गुण से हो;

4. अपने नाम से या अपने मान से हो;

– संग सत् पथ विमुख कर ही देगा।

– संग, प्रलोभन बन ही जायेगा।

– संग, वास्तविकता नहीं देखने देगा।

– संग, भ्रम में डाल ही देगा।

मोह और संग के कारण ही जीव :

क) शत्रुता करते हैं।

ख) ईर्ष्या करते हैं।

ग) धृष्टता और लोभ करते हैं।

घ) दूसरे को लूट लेते हैं।

ङ) दोषारोपण और तिरस्कार करते हैं।

च) अकड़ते और ग़रूर करते हैं।

छ) क्रोध और पाप करते हैं।

भगवान कहते हैं, जब कोई कामना होती है, जब किसी भोग की चाहना होती है, तब अव्यवसायी बुद्धि बनती है और जीव दुष्ट बन जाते हैं। देवत्व छोड़ कर वे असुर बन जाते हैं। फिर वे नरक में गिरते हैं; वे पूर्ण अपावन हो जाते हैं।

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