Chapter 16 Shloka 6

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।

दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु।।६।।

The Lord says:

In this world there are two classifications

of the natures of men – the divine and the demonic.

The divine has already been discussed in detail.

Now hear about the demonic from Me.

Chapter 16 Shloka 6

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।

दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु।।६।।

Promising to elaborate on the demonic qualities, the Lord says:

In this world there are two classifications of the natures of men – the divine and the demonic. The divine has already been discussed in detail. Now hear about the demonic from Me.

The Lord says, “In this world there are two types of natures or sargas.”

Sarga (सर्ग)

a) Creation.

b) Nature.

c) Trends of thought.

d) Rumination.

e) Modes of progression.

f) That which is natural, instinctive.

g) A predetermined and rigid temperament.

Understand sarga in this manner: Man creates two types of realms in this universe wrought by the Lord. One is the realm of divinity and the other the demonic realm. The external creation is wrought by the Lord and the man-made realms are created within that universal creation.

The Lord states, “These man-made realms are of two kinds.”

The divine realm

The demonic realm

1. In this realm people look towards the Lord. 1. They view the world with a demonic vision.
2. Their hearts cherish the divine qualities. 2. Demonic attributes have a predominant position in their hearts.
3. They view the universe from the Lord’s point of view. 3. They view this entirety from the point of view of the ‘I’.
4. They consider only the Lord to be worthy of attainment. 4. They consider only the world to be worthy of attainment.
5. They tread the northward path – the path of virtue. 5. They tread the southward path – the path of descent from spiritual objectives.
6. They seek to renounce the body idea. 6. They are fettered to the body.
7. They worship the virtuous qualities. 7. They worship the degenerate attributes.
8. They are givers of joy to others. 8. They rob others of their happiness.
9. They give their body-self to the Lord. 9. They annihilate every trace of the Lord from their lives.
10. They use their innate potential endowed by the Lord for the manifestation of the Lord’s qualities. 10. They use the potential bestowed upon them by the Lord for purposes of body establishment.
11. They serve others and establish them. 11. They make others insecure and seeking their own establishment, they want others to serve them.

Little one, the two realms – the divine and the demonic – are dependent on the individual’s intrinsic perspective. The external aspect of man is dependent on destiny – however, his internal values and attachment veil his perception and induce him to engage in diverse activities.

The Lord is saying here that He has already described the realm of divinity – now He will elucidate the characteristics of the realm of the demonic.

अध्याय १६

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।

दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे श्रृणु।।६।।

अब भगवान आसुरी सम्पदा को विस्तार पूर्वक समझाने की प्रतिज्ञा करते हुए कहते हैं।

शब्दार्थ :

१. (अर्जुन) इस लोक में भूतों की सृष्टि दो प्रकार की है,

२. दैवी और आसुरी,

३. दैवी विस्तार से कही गई है,

४. अब आसुरी को तू मुझसे सुन।

तत्त्व विस्तार :

भगवान कहने लगे, ‘इस संसार में जीव के दो प्रकार के सर्ग हैं।’

नन्हूं! पहले सर्ग का अर्थ समझ ले।

सर्ग :

क) सृष्टि को कहते हैं।

ख) प्रकृति को कहते हैं।

ग) कल्पना को भी कहते हैं।

घ) प्रगमन को भी कहते हैं।

ङ) बढ़ने की विधि को भी कहते हैं।

च) स्वाभाविक को भी कहते हैं।

छ) नैसर्गिक को भी कहते हैं।

ज) पूर्व निश्चित तथा स्थिरता पाये हुए अन्तःकरण को भी कहते हैं।

इसे यूँ समझना चाहिये, कि भगवान की सृष्टि में, जीव भूत दो प्रकार की सृष्टि रच लेते हैं; यानि, एक देवताओं की सृष्टि है और दूसरी, असुरों की सृष्टि कह लो! बाह्य सृष्टि भगवान रचित है और उसमें देवत्व पूर्ण और असुरत्व पूर्ण भूतों की सृष्टियाँ हैं।

भगवान कहते हैं, ‘यह जीवों की सृष्टि दो प्रकार की होती है।’ पहले इसे समझ ले।

दैवी सृष्टि

1. दैवी दृष्टिकोण पूर्ण लोगों की दृष्टि भगवान को देखती है।

2. इनके हृदय में भागवद् गुण महत्ता रखते हैं।

3. ये लोग भगवान के दृष्टिकोण से संसार को देखते हैं।

4. ये लोग भगवान को ही प्राप्तव्य मानते हैं।

5. ये लोग उत्तरायण पथ का अनुसरण करते हैं।

6. ये लोग तनत्व भाव को भी त्याग देना चाहते हैं।

7. ये लोग सद्गुण उपासक हैं।

8. ये लोग दूसरों को खुशी देते हैं।

9. ये लोग भगवान को अपना तन देते हैं।

10. ये लोग भागवद् देन, आत्म शक्ति का इस्तेमाल भगवान के गुणों के प्राकट्य के लिये करते हैं।

11. ये लोग दूसरों की सेवा करते हैं और उन्हें स्थापित करते हैं।

आसुरी सृष्टि

1. आसुरी गुण पूर्ण लोग सृष्टि को आसुरी दृष्टिकोण से देखते हैं।

2. इनके दिल में आसुरी गुण महत्ता रखते हैं।

3. ये लोग ‘मैं’ के दृष्टिकोण से सब कुछ देखते हैं।

4. ये लोग संसार को ही प्राप्तव्य मानते हैं।

5. ये लोग दक्षिणायन पथ का अनुसरण करते हैं।

6. ये लोग तन से बन्धते जाते हैं।

7. ये लोग दुर्गुण उपासक हैं।

8. ये लोग दूसरों की खुशी चुरा लेते हैं।

9. ये लोग भगवान का नामोनिशान मिटा देते हैं।

10. ये लोग भागवद् देन, उस शक्ति का इस्तेमाल जड़ तन को स्थापित करने के लिये करते हैं।

11. ये लोग दूसरों को असुरक्षित करते हैं और अपनी स्थापति चाहते हुए उनसे सेवा करवाना चाहते हैं।

नन्हूं! आसुरी लोक और दैवी लोक, यह दोनों जीव के आन्तरिक दृष्टिकोण पर ही आधारित हैं। बाह्य दृष्टिकोण तो जैसा है, वैसा ही है, यह आन्तरिक भाव तथा संग ही जीव की दृष्टि को आवृत कर देता है और विभिन्न कामों में प्रेरित करता है।

भगवान यहाँ कह रहे हैं कि दैवी गुण वाले की सृष्टि की तो वह बता आये हैं, अब आगे वह आसुरी गुण वालों की सृष्टि के बारे में कहते हैं।

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