Chapter 15 Shloka 20

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।

एतद्बुद्धवा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।२०।।

O sinless Arjuna! Upon imbibing this

deep and absorbing scripture

which has thus been revealed by Me,

a man becomes wise and infinitely satiated.

Chapter 15 Shloka 20

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।

एतद्बुद्धवा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।२०।।

Lord Krishna now speaks of the benefit derived from understanding the profound knowledge He has just endowed.

O sinless Arjuna! Upon imbibing this deep and absorbing scripture which has thus been revealed by Me, a man becomes wise and infinitely satiated.

The Lord says, “O Arjuna, if you realise this infinitely deep and mysterious knowledge which I have imparted to you, you will become infused with wisdom and completely fulfilled.”

1. Nothing else will remain to be done.

2. Nothing will remain to be achieved.

3. Nothing else will remain to be known.

4. Your individualistic entity will be no more.

5. There will be no more plans or resolves required in your personal life.

6. You will abide in eternal joy.

7. You will then have fulfilled all your duties.

Look my dear Kamla! Smile as you hear these words of the Lord. He says, “He who understands Me to be the Supreme Purushottam:

a) will be completely satiated;

b) whatever his frame of mind, I will be the focus of his thoughts;

c) will become infinitely wise.”

This is quite true.

1. He who knows the Manifest to be in reality Unmanifest he who knows the unmanifest to constitute all the forms of the world, he who knows all forms to be formless in essence, the Lord says, “Such a one will verily know Me. He will reflect only upon Me.”

2. When one knows the one who is bound by attributes to be essentially a gunatit, when one knows that gunatit to be devoid of attributes, when one knows the one who is thus devoid of attributes to be adorned with all qualities, then one may know that Supreme Lord.

3. He who speaks of the one bound by time as one who transcends time, the one controlled by time as one who is time itself, that one can perhaps know the Lord – the Supreme Purushottam.

4. One who recognises that Krishna, who fled Mathura because he could not defeat Jarasandh, to be Omnipotent, who knows That One who fled the battle field as the Master of war, who recognises that Supreme Protector who guided Arjuna towards victory through His shrewd diplomacy as the Lord of all, that one truly knows the Lord in essence.

5. He who enjoined Arjuna, “Fight!” is truly love itself, compassion itself, duty itself. one who realises this truth, knows the Lord truly.

If you understand the secret of this apparent contradiction, you will then know that Purushottam in essence. If not, you will find it impossible to know Him.

However, one who has come to know Him is infinitely satiated. He fulfils every duty. He practices yagya in his day to day life and attains the fruits of his dutiful deeds. He has merged – Atma united in the Atma.

अध्याय १५

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ।

एतद्बुद्धवा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।।२०।।

भगवान कथित गुह्य ज्ञान समझने का फल बताते हुए अर्जुन से कहने लगे :

शब्दार्थ :

१. हे निष्पाप अर्जुन!

२. इस प्रकार से यह गुह्यतम शास्त्र,

३. मेरे द्वारा कहा गया (है);

४. इसे जान कर पुरुष बुद्धिमान तथा कृत् कृत् हो जाता है।

तत्त्व विस्तार :

भगवान कहते हैं, ‘हे अर्जुन! यह अति गुह्य से भी गुह्यतम ज्ञान जो मैंने तुझे कहा, गर तू इसको जान ले, तो ज्ञान सम्पन्न बुद्धिमान हो जायेगा तथा आप्तकाम हो जायेगा।’ यानि, फिर कुछ भी :

क) करने को नहीं रहेगा।

ख) प्राप्तव्य नहीं रहेगा।

ग) ज्ञातव्य नहीं रहेगा।

घ) फिर कोई भी पहचान नहीं रहेगी।

ङ) फिर जीवन में निजी प्रयोजन या योजन नहीं रहेगा।

च) फिर तू नित्य मुदित मनी हो जायेगा।

छ) तब तो मानो तू अपने सब कर्तव्य पूर्ण कर चुका होगा।

देख मेरी रूठी हुई कमल! ज़रा मुसकरा के सुन। भगवान कहते हैं :

जो मेरे इस पुरुषोत्तम तत्त्व को समझ लेगा, वह :

– कृत् कृत् हो ही जायेगा।

– वह हर भाव में मुझे ध्यायेगा।

– वह बुद्धिमान हो ही जायेगा।

हां, भाई ठीक है!

1. साकार को जो निराकार जाने, निराकार को जो अखिल रूप जाने, अखिल रूप को जो रूप रहित जाने, भगवान कहते हैं, ‘वह मुझे जान जायेगा। वह मुझे ही ध्यायेगा।’

2. गुण बधित को जो गुणातीत जाने, गुणातीत को जो निर्गुणिया जाने, निर्गुणिया को जो अखिल गुणी जाने, तब शायद वह भगवान को जान ले।

3. काल बधित को जो कालातीत कहे, कालातीत कह कर काल पति कहे, काल ग्रसित भी देख कर ‘काल आप हैं’, जो कह सके, वह शायद भगवान को जान सके, वह परम पुरुषोत्तम को जान लेगा।

4. जिन्हें मथुरा छोड़ कर जाना पड़ा क्योंकि वह जरासंध को न हरा सके, जो उन्हें सर्वशक्तिमान् जान ले, रण छोड़ कर जो भाग गये, उन्हें रणपति पहचान ले, नीति से अर्जुन को विजय दिलाने वाले, वह अखिल संरक्षक, अखिल पति, अशरण के शरण आप हैं, जो यह जान सके, वही भगवान को पहचान सकेगा।

5. जो अर्जुन को कहते हैं, “तुम युद्ध करो”, फिर भी जो उस प्रेम स्वरूप, करुणापूर्ण, कर्तव्य स्वरूप को पहचान ले, वह ही भगवान को जान सकता है।

इसका राज़ गर समझ पड़े, तब जान सकोगे तुम पुरुषोत्तम को, वरना उन्हें जानना कठिन है।

किन्तु जिसने उन्हें जान लिया, वे कृत् कृत् हो जाते हैं। वे जीवन में सम्पूर्ण कर्तव्यों का फल पा लेते हैं। वे जीवन में सम्पूर्ण यज्ञों का फल पा लेते हैं। वे तो आत्मा में आत्मा हो चुके हैं।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुन संवादे पुरुषोत्तमयोगोनाम

पंचदशोऽध्याय:।।१५।।

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