Chapter 15 Shloka 15

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।१५।।

Now the Lord elucidates on His far-reaching influence and effect:

And it is I who abides in the hearts of all beings as the Omniscient One; memory, knowledge and the cleansing of the memory (apohan) are all endowed by Me; it is I who am worthy of being known through all the Vedas; I have wrought the Vedanta and I am the knower of the Vedas.

Chapter 15 Shloka 15

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।१५।।

Now the Lord elucidates on His far-reaching influence and effect:

And it is I who abides in the hearts of all beings as the Omniscient One; memory, knowledge and the cleansing of the memory (apohan) are all endowed by Me; it is I who am worthy of being known through all the Vedas; I have wrought the Vedanta and I am the knower of the Vedas.

The Lord says to Arjuna “My abode is in the hearts of all men. In fact, it is Me whom they desire.”

In what form do all beings desire the Lord? The Lord Himself clarifies:

a) If they seek bliss, they seek Me, for bliss resides in Me, bliss is My name.

b) If they seek love, they seek only Me, for love is found only in Me, love is My own name.

c) If they seek light, then I am the luminescence they seek, all luminescence originates from Me, light is My very name.

d) If they seek the nectar of immortality, they will seek Me – for it is I who bestows that nectar of immortality.

e) If they seek redemption from sorrow, they seek it from Me – for it is I who emancipates the sorrowful from their sorrow.

f) If they desire eternal satiation they will seek it from Me, because they can be completely satiated only if they abide in Me.

g) If they seek fearlessness, they seek Me, for fearlessness is My very essence.

Whatever you seek from another is also an attribute of Mine.

1. If you seek sincerity, you seek Me.

2. If you seek gratitude, you seek Me.

3. If you seek the Truth, you seek but Me.

4. If you seek justice, you seek Me.

5. If you seek the wealth of the divine attributes, you desire Me.

6. If you desire greatness and excellence, you seek Me.

The Lord says:

1. I am established in the hearts of all as the Atma.

2. I am established in the hearts of all as internal luminescence.

3. I am the energy in the heart of each being.

Therefore I am the memory, the knowledge and the forgetfulness in the hearts of all living beings.

Smriti (स्मृति) – Memory

First understand the connotation of Smriti’. Smriti means – to remember, to keep in the mind, to cogitate, to remember carefully. This smriti’ which inheres in us is bestowed by the Lord Himself. The power of memory is derived from the Lord. However little one, having received the power of memory from the Lord, man misuses that memory.

The misuse of memory by man

1. He never rids it of hatred.

2. He never banishes aversion from his memory.

3. He never frees it of grudges.

4. His memory is filled with negative feelings even for his near and dear ones.

5. His memory is stuffed with all the sense objects of the world.

6. His memory is filled with feelings of greed and avarice.

Little one, this is misuse of a God given gift. This is misuse of the Lord Himself!

The Lord says that He is knowledge as well. In Chapter 13, Shloka7-11, the Lord has explained in great detail what constitutes knowledge.

Gyan (ज्ञान) – Knowledge

What is knowledge?

1. Knowledge is to become an Atmavaan established in the Atma.

2. Knowledge is to be established in one’s own essence.

3. Knowledge is to imbibe the nature of the Supreme.

4. Knowledge is to be replete with the attributes of the Supreme.

5. Knowledge is to become an embodiment of the Scriptures.

Further, knowledge itself is the Lord. That is:

a) The essence of knowledge is the Lord Himself.

b) It is the Lord who defines and illuminates knowledge.

c) The Lord is proof of Adhyatam – the manifestation of Brahm on earth.

Apohan (अपोहन) – the ‘cleansing’ of memory

The Lord now claims to be ‘apohan’ as well.

1. The obliteration of illusionary doubts after logical reasoning is apohan. It is the Lord who employs varied means to erase ignorance.

2. In fact, apohan means to distance, to remove.

3. To remove ignorance is apohan.

4. The fading away of all ignorance from one’s memory is apohan.

5. In fact, to forget the body self is apohan.

According to the Vedas, that which is worthy of being known is the Lord Himself.

The Lord now says, “I am the One worthy of being known.”

a) That which all the Scriptures decree as worthy of being known, is only the Supreme Embodiment of the Truth.

b) I am the only goal of all the Scriptures.

c) I am the knowledge inherent in all the Scriptures.

d) I am the One whom all the Scriptures endeavour to describe.

e) I am the Atma Essence to be experienced as spoken of in all the Scriptures.

f) I am That Brahm whom all the Scriptures glorify.

g) I am the essence and the manifest form of Brahm as alluded to in the spiritual texts.

I am the author of Vedanta

Vedanta is the culmination of the Vedas. The final state achieved after the perusal of all the Vedas is the state of Vedanta. Vedanta propagates the immutability and indestructibility of the Eternal Atma Essence.

The Lord says, “I Myself am the Vedanta.” He alone is the manifest image of the Vedantic doctrines and He is their living proof.

Vedanta re-establishes the essential unity of the seemingly varied manifestations of Brahm. It integrates the seemingly ambiguous and contradictory statements of various Scriptures and establishes their unified identity.

The Lord claims “I am the author of Vedanta.” It is the Lord who also manifests the knowledge of the Vedanta.

The Lord adds, “It is I who is worthy of being known throughout the Vedas. I am the dharma defined therein.”

Little one, you must understand. The Lord is saying that He Himself is the Knower, the Knowledge and the Known. It is He who constitutes memory and it is He who is the forgetfulness of that which is unreal.

अध्याय १५

सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टो मत्त: स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।

वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्।।१५।।

अब भगवान अपना प्रभाव बताते हुए कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. और मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तर्यामी रूप में स्थित हूँ,

२. मेरे से ही स्मृति, ज्ञान और विस्मृति होती है,

३. सब वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ,

४. मैं ही वेदान्त का कर्ता हूँ

५. और वेद को जानने वाला भी मैं ही हूँ।

तत्त्व विस्तार :

भगवान कहते हैं अर्जुन से, ‘सम्पूर्ण व्यक्तियों के हृदय में मेरा ही वास है। वास्तव में वे मुझे ही चाहते हैं।’

जीव भगवान को किस रूप में चाहते हैं?

देख नन्हीं! भगवान कहते हैं, यदि वे,

क) आनन्द चाहें तो मुझे ही चाहेंगे, क्योंकि आनन्द मुझी में है, वह मेरा ही नाम है।

ख) प्रेम चाहें तो मुझे ही चाहेंगे, क्योंकि प्रेम मुझी में है, वह मेरा ही नाम है।

ग) प्रकाश चाहें तो मुझे ही चाहेंगे, क्योंकि प्रकाश मुझी में है, वह मेरा ही नाम है।

घ) अमृत चाहें तो मुझे ही चाहेंगे, क्योंकि अमृत मुझी में है, वह मेरा ही नाम है।

ङ) शोक विमुक्ति चाहें तो मुझे ही चाहेंगे, क्योंकि शोक विमोचक मैं आप ही हूँ।

च) नित्य तृप्ति चाहें तो मुझे ही चाहेंगे, क्योंकि नित्य तृप्ति मुझी में पा सकते हैं।

छ) निर्भयता चाहें तो मुझी को ही चाहेंगे, क्योंकि निर्भयता मेरे स्वरूप में ही रहती है।

दूसरे से भी तुम जो कुछ चाहते हो, वह मेरा ही कोई गुण चाहते हो।

1. वफ़ा चाहो तो मुझे चाहते हो।

2. कृतज्ञता चाहो तो मुझे चाहते हो।

3. सत्यता चाहो तो भी तुम मुझे ही चाहते हो।

4. न्याय चाहो तो भी तुम मुझे ही चाहते हो।

5. दैवी सम्पदा चाहो तो भी तुम मुझे ही चाहते हो।

6. श्रेष्ठता चाहो तो भी तुम मुझे ही चाहते हो।

भगवान कहते हैं कि :

– सबके हृदय में आत्मा बन कर मैं ही स्थित हूँ।

– सबके हृदय में तेज बन कर मैं ही स्थित हूँ।

– सबके हृदय में शक्ति बनकर मैं ही स्थित हूँ।

इस कारण सम्पूर्ण प्राणियों की स्मृति, ज्ञान तथा विस्मृति भी मैं ही हूँ।

स्मृति : 

प्रथम स्मृति को समझ ले! स्मृति का अर्थ है याद रखना, मन में रखना, चिन्तन करना, ध्यान में रखना। यह स्मृति जो आप में है, भगवान कहते हैं, ‘वह जीव मेरे से ही पाता है।’ जो आप जीवन में याद रखते हैं, उसकी शक्ति आप भगवान से ही पाते हैं। किन्तु नन्हूं! स्मृति की शक्ति भगवान से पाकर जीव स्मृति का कितना दुरुपयोग करते हैं।

जीव द्वारा स्मृति का दुरुपयोग :

जीव की स्मृति में से :

1. घृणा जाती ही नहीं।

2. द्वेष जाता ही नहीं।

3. नफ़रत जाती ही नहीं।

4. गिले शिकवे जाते ही नहीं।

जीव की स्मृति में,

5. अपने नाते बन्धुओं के प्रति भी असत् विचार भरे रहते हैं।

6. विषयों की भरमार लगी रहती है।

7. लोभ तथा तृष्णापूर्ण भाव भरे रहते हैं।

नन्हूं! यह भागवद् देन का दुरुपयोग है। यह भगवान का ही दुरुपयोग है।

भगवान कहते हैं कि, ‘ज्ञान भी वह आप ही हैं।’ नन्हीं ! भगवान ने श्लोक 13/11 में सविस्तार बताया है कि ज्ञान क्या है।

ज्ञान क्या है?

नन्हूं!

क) आत्मा में आत्मवान् होना ही ज्ञान है।

ख) अपने स्वरूप में स्थित होना ही ज्ञान है।

ग) परम स्वभाव को अपना बना लेना ही ज्ञान है।

घ) परम गुण सम्पन्न होना ही ज्ञान है।

ङ) शास्त्रों में जो कहा है, उसकी प्रतिमा बन जाना ही ज्ञान है।

   और फिर ज्ञान ही भगवान हैं।

यानि,

– ज्ञान का स्वरूप भी भगवान ही हैं।

– ज्ञान पर प्रकाश भी भगवान ही हैं।

– अध्यात्म का प्रमाण भी भगवान हैं।

– ब्रह्म की धरती पर प्रतिमा भी भगवान हैं।

अपोहन :

फिर भगवान ने कहा कि अपोहन भी वह आप हैं।

1. तर्क वितर्क करके, मिथ्या शंकाओं का लुप्त हो जाना वह आप ही हैं। युक्तियों के साथ अज्ञान को मिटा देना वह आप ही हैं।

2. वास्तव में ‘अपोहन’ दूर करने को कहते हैं, हटा देने को कहते हैं।

3. अज्ञान को हटा देना अपोहन है।

4. अज्ञान की विस्मृति हो जाना अपोहन है।

5. अपने तन को भूल जाना ही अपोहन है।

वेदों में ज्ञातव्य भगवान ही हैं :

अब भगवान कहते हैं कि, ‘वेदों में ज्ञातव्य भी मैं ही हूँ।’ यानि,

क) सम्पूर्ण शास्त्रों में प्राप्त करने योग्य केवल परम तत्त्व स्वरूप मैं ही हूँ।

ख) सम्पूर्ण शास्त्रों का केवल मात्र लक्ष्य मैं ही हूँ।

ग) सम्पूर्ण शास्त्रों में निहित ज्ञान भी मैं ही हूँ।

घ) सम्पूर्ण शास्त्रों में, जिसका वह वर्णन करना चाहते हैं, वह भी मैं ही हूँ।

ङ) सम्पूर्ण शास्त्रों में अनुभव करने योग्य मेरा ही आत्म तत्त्व है।

च) सम्पूर्ण शास्त्रों में जिस ब्रह्म की महिमा गाई गई है, वह भी मैं ही हूँ।

छ) सम्पूर्ण शास्त्रों में कथित ब्रह्म स्वरूप रूप मैं ही हूँ।

वेदान्त का कर्ता :

वेदों के अन्त को वेदान्त कहते हैं। सम्पूर्ण वेदों से ज्ञान पाकर अन्त में जो स्थिति मिलती है, उसे वेदान्त की स्थिति कहते हैं। वेदान्त अखण्ड आत्मतत्त्व की अखण्डता को प्रतिपादित करता है।

भगवान कहते हैं, ‘वेदान्त भी मैं ही हूँ।’ यानि, वेदान्त की प्रतिमा भी मैं ही हूँ; वेदान्त का प्रमाण भी मैं ही हूँ।

वेदान्त, पूर्ण विभाजित रूप ब्रह्म को पुन: वास्तविक एकत्व में स्थित करने वाला है। वेदान्त, विरोधपूर्ण द्वन्द्वात्मक शास्त्रीय कथनियों को पुन: एकत्व में स्थित करने वाला है।

भगवान कहते हैं कि, ‘उस वेदान्त का कर्ता भी मैं ही हूँ। उस वेदान्त को प्रकट करने वाला भी मैं ही हूँ।’

फिर भगवान ने कहा कि, ‘वेदों द्वारा जानने योग्य भी मैं ही हूँ, यानि, शास्त्र प्रतिपादित धर्म भी मैं ही हूँ।’

नन्हूं समझ! भगवान कह रहे हैं कि ज्ञाता, ज्ञान, और ज्ञेय मैं ही हूँ। स्मृति तथा ज्ञान के परिणाम स्वरूप अपनी विस्मृति मैं ही हूँ।

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