Chapter 15 Shloka 10

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।

विमूढ़ा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।।१०।।

The foolish cannot perceive the Atma

exiting the body nor its abidance in the body

replete with varied attributes. Only they who

possess the eyes of wisdom realise this reality.

Chapter 15 Shloka 10

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।

विमूढ़ा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।।१०।।

The Lord now speaks of the capability of one who can objectively witness the phenomenon of the Atma donning the body, utilising it and the final relinquishing of the body.

The foolish cannot perceive the Atma exiting the body nor its abidance in the body replete with varied attributes. Only they who possess the eyes of wisdom realise this reality.

Despite witnessing the play of the gunas, the jivatma cannot perceive the complete reality. Little one, each day:

a) one witnesses death;

b) one witnesses birth;

c) one witnesses varied beings comprising myriad attributes;

d) one witnesses people’s enjoyment derived from the interaction of attributes;

e) one perceives self-contradictory attributes within oneself;

f) one notices one’s repulsion from the attributes of others;

g) one views attraction to other attributes;

h) one sees the influence of one’s own attributes on the attributes of others.

Then, the individual also sees that he has no control over his attributes. Despite witnessing all this:

a) he sees nothing;

b) he wishes to see nothing;

c) he wishes to see himself objectively least of all;

d) the truth is that man does not wish to know himself. He is afraid;

e) he does not wish to come face to face with the truth. For if he accepts the Truth as such, where will there be room for the poor ‘I’?

The eye of wisdom versus the vision of the foolish

Therefore the Lord says that such knowledge transcends knowledge gained from the gross. Everybody can gain knowledge from gross happenings. The point of view of the jivatma depends on the meanings he attributes to those happenings and on his basic values.

Little one, when the eyes derive their sight from the mind, they become the vision of the mind. When eyes perceive through knowledge, they become the eyes of wisdom. The luminescence of all vision is derived from the meaning attributed to the phenomena witnessed.

The meaning you attribute to an object will depend on the value you place on it. Love has a very different connotation for one who is attached to sense objects – but it will have a very different meaning for the renunciate who has relinquished the body idea. So also life and death bear very different connotations for the foolish and for the man of wisdom. Their basic understanding will be radically different.

If one witnesses this truth with the eyes of knowledge and with detachment, one will be able to gauge the mysterious depths of the Atma. A detached vision devoid of any aberration will clearly discern the cycle of life and death and the interplay of the attributes. The fusion of the Atma and the seeds of actions is also an integral aspect of the interplay of attributes.

Little one, if you understand the reality of the Atma,

1. You will no longer view life as a distressing problem.

2. You will always smile at life’s happenings.

3. You will also be able to laugh at yourself.

4. Your own body, mind and intellect will become subjects of entertainment.

5. You will never be worried about yourself.

6. Why bother about this body with which you will inevitably part one day?

7. Why this attachment with the body which is not yours and which you are not?

अध्याय १५

उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम्।

विमूढ़ा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः।।१०।।

भगवान की कथनी के अनुसार शरीर को धारण करने, उपभोग करने, व छोड़ने को कौन लोग देख सकते हैं? इसके बारे में भगवान कहते हैं कि :

शब्दार्थ :

१. (देह) से निकलते हुए,

२. (देह में) स्थित हुए, और

३. गुणों से युक्त हुए को भी,

४. मूढ़ नहीं देखते,

५. ज्ञान के नेत्रों वाले देखते हैं।

तत्त्व विस्तार ;

जीव गुण खिलवाड़ देखते हुए भी नहीं देखता। नन्हूं! देख न! जीव रोज़ लोगों को,

1. मरते देखता है।

2 जन्म लेते देखता है।

3. गुणों से युक्त हुआ देखता है।

4. गुणों को भोगते हुए देखता है।

5. उनके अपने ही गुणों से विरोध देखता है।

6. औरों के गुणों से विरोध देखता है।

7. आकर्षण देखता है।

8. औरों के गुणों पर प्रभाव देखता है।

फिर, जीव यह भी देखता है कि उसका गुणों पर वश नहीं है। किन्तु यह सब कुछ देखता हुए भी :

क) जीव कुछ नहीं देखता।

ख) जीव कुछ देखना नहीं चाहता।

ग) जीव अपने आपको बिलकुल ही नहीं देखना चाहता।

घ) सच तो यह है कि वह अपने आपको जानना भी नहीं चाहता, वह सच से डरता है।

ङ) सच को सच जान कर भी वह सच मानना नहीं चाहता।

च) क्योंकि यदि सच को सच मान लेगा तो उपाधि रूपा ‘मैं’ बेचारी किधर जायेगी?

ज्ञान नेत्र तथा मूढ़ की दृष्टि का आधार :

इसलिये भगवान कहते हैं कि स्थूल दर्शन की बात नहीं है, स्थूल दर्शन तो सबको होते हैं। जीव का दृष्टिकोण उसके विषय अर्थ तथा मूल्यों पर आधारित है।

नन्हूं! जब यह नेत्र मन के राही देखते हैं तब नेत्र मन के होते हैं। जब नेत्र ज्ञान के राही देखते हैं तब नेत्र ज्ञान के होते हैं। जिसका दर्शन हो, उस विषय में ज्योति अर्थ की होती है, वह अर्थ किसने दिया, सोच तो लो!

आपके लिये विषय का जो मूल्य होगा, उस पर वह अर्थ आधारित है। तनो संगी विषयासक्त के लिये प्रेम का अर्थ कुछ और है, तनत्व भाव त्यागी निरासक्त के लिए प्रेम का अर्थ कुछ और ही होगा।

इसी विधि मूढ़ और ज्ञानवान् के लिये जन्म मरण का अर्थ भी भिन्न होगा। इन दोनों की समझ भी फ़र्क़ होगी।

ज्ञान के नयन से देखो, उदासीन होकर देखो तो आत्म राज़ समझ आ जाता है। नित्य निर्लिप्त तथा निर्विकारी दृष्टि से देखो तो जन्म मरण का चक्र भी गुण खिलवाड़ ही नज़र आयेगा। आत्मा और कर्म बीज का मिलन भी गुण खिलवाड़ ही है।

नन्हूं! यदि आप आत्मा की बात समझ जायें तो,

1. आप जीवन को गम्भीर समस्या नहीं मानेंगे।

2. आप जीवन के प्रति मुसकराते रहेंगे।

3. आप अपने पर ही स्वयं मज़ाक कर सकेंगे।

4. आप अपने ही तन मन तथा बुद्धि को एक मनोरंजन का विषय ही मानेंगे।

5. आप अपने बारे में चिन्ताशील नहीं होंगे।

6. जिस तन को आपने छोड़ ही देना है, उसकी क्या परवाह करनी।

7. जो तन आपका है ही नहीं और जो आप हो ही नहीं, उसमें आपका संग क्यों?

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