Chapter 13 Shloka 34

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।

भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।३४।।

He who, with the eye of wisdom, perceives

the Truth concerning discernment between

kshetra and kshetragya and the means

to obtain freedom from the bonds of Prakriti,

that one attains the supreme state.

Chapter 13 Shloka 34

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।

भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।३४।।

Expanding on the consequence of knowledge of kshetra, kshetragya and Prakriti, the Lord says:

He who, with the eye of wisdom, perceives the Truth concerning discernment between kshetra and kshetragya and the means to obtain freedom from the bonds of Prakriti, that one attains the supreme state.

Knowledge of the kshetra and the kshetragya

One who has realised the truth about the kshetra and the kshetragya:

1. That one has realised the difference between the Atma and the anatma.

2. That one has realised the truth regarding the conscious and the inert.

3. That one knows the Purusha and Prakriti.

4. That one knows of the essential being and its manifestation.

5. That one knows the form of the formless one.

When such a one comes to know of his essential core:

a) the body becomes meaningless for him;

b) he has realised his true Atma Self;

c) he has come to know himself;

d) he has come to know of the delusion caused by the idea of doership;

e) he understands the illusion of the individualistic ‘I’;

f) he recognises the delusion created by the ego.

Having understood the enigma of the interplay of the qualities, the individual then transcends those qualities and becomes a gunatit. Having attained the wisdom to discriminate between the kshetra and the kshetragya, the individual renounces attachment with the kshetra and becomes established in his essential being – the kshetragya.

The consequence of ridding oneself of the body idea

Little one, when the body idea ceases to exist, such a one cannot claim rights over any attribute of that body or any deed performed by it.

1. When the body is no longer his, such a one gains a detached attitude towards his body self.

2. The body ceases to hold any importance for such a one.

3. It matters not to such a one if the body lives or dies.

4. He neither possesses the desire to live nor to die.

5. Thereafter, it does not matter to him whether his body receives anything or not.

6. He is not concerned whether his body attracts credit or discredit.

7. It does not matter to him whether his body engages in action or ceases to perform actions.

8. Personal gain or loss cease to have any meaning for such a one.

Little one, this knowledge bestowed by the Lord is indeed astounding. Having gained this knowledge, nothing remains one’s own. Everything now belongs to Him!

The consequences of the knowledge of renunciation of the body idea

Little one, the Lord says, “They who know the Truth through the means of knowledge, and they who know of the individual’s emancipation from Prakriti:

a) they attain the Truth through the eyes of wisdom;

b) they view everything through the eyes of wisdom;

c) they even look at their own body through these ‘eyes of wisdom’.”

Such people look upon all beings with enlightened eyes. Such a vision is obtained when knowledge predominates and aids one in the perception of the Truth and its essential unity.

As a consequence of such a vision, the individual renounces the anatma and becomes established in the Atma. The Lord says, in this manner the individual relinquishes the idea of individuality and attains the Supreme. Thereafter, all that remains is a non-doer, a non-enjoyer, a pure witness. Such a one then transcends all attributes and becomes a gunatit, devoid of all blemishes and aberrations, eternally detached. His Self merges in the Self of all – Atma in Atma.

अध्याय १३

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा।

भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्।।३४।।

क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ तथा प्रकृति के ज्ञान का फल बताते हुए भगवान कहने लगे :

शब्दार्थ :

१. इस प्रकार क्षेत्र, क्षेत्रज्ञ के अन्तर को

२. और प्रकृति के बन्धन से जीव की मुक्ति के उपाय को,

३. जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा,

४. तत्त्व से जानता है,

५. वह परम गति पाता है।

तत्त्व विस्तार :

क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का ज्ञान :

जिसने क्षेत्र क्षेत्रज्ञ को जान लिया, उसने :

क) उस आत्म अनात्म को जान लिया।

ख) उस चेतन और जड़ को जान लिया।

ग) उस पुरुष और प्रकृति को जान लिया।

घ) उस स्वरूप और रूप को जान लिया।

ङ) उस निराकार के आकार को जान लिया।

जब स्वरूप ही जान लिया,

1. तो तन निरर्थक हो ही गया।

2. आत्म तत्त्व भी जान लिया।

3. अपना आप भी जान लिया।

4. कर्तृत्व भाव के मिथ्यात्व को जान लिया।

5. भोक्तृत्व भाव के मिथ्यात्व को जान लिया।

6. जीवत्व भाव के मिथ्यात्व को जान लिया।

7. अहंकार भाव के मिथ्यात्व को जान लिया।

गुण राज़ के विवेक के पश्चात् जीव गुणातीत हो जाता है। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विवेक हो जाने से जीव क्षेत्र से संग छोड़ कर अपने क्षेत्रज्ञ स्वरूप में स्थित हो जाता है।

तनत्व भाव अभाव परिणाम :

नन्हूं! जब तनत्व भाव ही नहीं रहे, तो तन के किसी गुण या कर्म को वह नहीं अपना सकता।

क) जब तन ही उसका नहीं रहता, तो वह तन के प्रति उदासीन हो ही जाता है।

ख) फिर उसके लिये अपना तन कोई महत्व नहीं रखता।

ग) फिर उसके लिये अपना तन जीये या मरे, एक ही बात है।

घ) फिर वह न जीने की अभिलाषा रखता है, न मरने की।

ङ) तत्पश्चात् उसके तन को क्या मिला या क्या नहीं मिला, उसको फ़र्क़ नहीं पड़ता।

च) तत्पश्चात् उसके तन का मान हुआ या अपमान हुआ, उसको फ़र्क़ नहीं पड़ता।

छ) उसका तन कर्मों में प्रवृत्त हुआ या कर्मों से निवृत्त हुआ, उसे फ़र्क़ नहीं पड़ता।

ज) तत्पश्चात् उसकी हानि हो गई या उसे लाभ हो गया, उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता।

देख ज़रा मेरी नन्हीं जान्! भगवान ने भी क्या ज्ञान बताया। कुछ भी अपना नहीं रहा और सब कुछ उसी का हो गया।

तनत्व भाव अभाव के ज्ञान का परिणाम :

नन्हीं! भगवान कहते हैं, ‘जो ज्ञान की राह से तत्त्व को जान जाते हैं और जो लोग जीव की प्रकृति से मोक्ष को भी जानते हैं,

1. वे लोग ज्ञान नेत्रों द्वारा ही तत्त्व को जानते हैं।

2. वे लोग ज्ञान नेत्रों द्वारा ही हर जगह पर देखते हैं।

3. वे लोग ज्ञान नेत्रों द्वारा ही अपने तन को देखते हैं।’

वे लोग सबकी ओर ज्ञानमय दृष्टि से ही देखते हैं। यानि, जो लोग सबकी ओर ज्ञानपूर्ण दृष्टि रखते हैं; यह ज्ञानपूर्ण दृष्टि, जो ज्ञान की प्रधानता में, ज्ञान के राही, यानि, ज्ञान चक्षुओं के राही सत्त्व के दर्शन कराती है, वह जीव को तत्त्व की एकता के दर्शन कराती है।

इन दर्शनों के परिणाम रूप जीव अनात्म को त्याग कर आत्मा में स्थित हो जाता है। भगवान कहते हैं, इस विधि जीव जीवत्व भाव का त्याग करके परम को प्राप्त होता है। तत्पश्चात् वह नित्य अकर्ता, अभोक्ता, साक्षी मात्र रह जाता है। तत्पश्चात् वह गुणातीत, निर्विकार, नित्य उदासीन हो जाता है। अजी! तब वह आत्मा में आत्मा हो जाता है।

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे

श्रीकृष्णार्जुन संवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग योगो नाम

त्रयोदशोऽध्याय:।।१३।।

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