Chapter 13 Shloka 32

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।

सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते।।३२।।

As the all-pervading ether remains

untainted because of its subtlety,

so also the Atma Self which pervades

the body remains unaffected.

Chapter 13 Shloka 32

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।

सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते।।३२।। 

Through an analogy the Lord clarifies the undefileable nature of the Atma thus:

As the all-pervading ether remains untainted because of its subtlety, so also the Atma Self which pervades the body remains unaffected.

Little one, just as the ether, although all-pervading, remains ever untainted and pure, just as the dream witness remains unaffected even though he himself comprises the entire dream, so also the Atma, pervading the entire manifest form of the individual, remains uninfluenced and untainted.

The connotation of ‘subtle’ in this shloka

1. Unmanifest;

2. That which cannot be seen;

3. That which cannot be experienced.

Atma

The Atma is not bound by qualities, nor is it susceptible to modification. Neither is It the doer, nor is It the enjoyer; yet, It comprises this entirety.

Little one,

1. Just as clouds appear and fall as rain;

2. Just as dust fills the atmosphere and causes a storm;

3. Just as the sun comes out and sunshine prevails;

4. Just as redness pervades the sky at sunset, yet, the sky remains ever unaffected;

– so also, this entire creation is pervaded by the Atma and abides in It – yet the Atma remains ever untainted and unaffected. Myriad bodies, minds and intellects along with their modifications come and go within the sphere of the Atma, yet the Atma Itself remains ever uninfluenced and unattached.

The Atma permeates everybody equally and is omnipresent. Remember, the Atma abides in each body. Thus, all are the Atma. Yet, the Atma is not touched by the body. The body born of Prakriti and the Atma are incompatible and thus cannot be united. The intellect, although having gained consciousness from the Atma, believes itself to be synonymous with the body. In fact, the intellect is inert and a product of Prakriti; thus it is but natural that it identifies itself with the gross body. If the intellect only pauses to reflect as to the cause of its luminescence, it may be able to discern the authority of the Atma to some small extent. Perhaps it may also discern its own essence thus!

Little one, just as when electricity is turned on:

a) an electric bulb burns and yields light;

b) a heater emanates heat;

c) an air conditioner yields cool air in the heat of summer;

d) machines and tools work through its energy;

e) and many types of tasks are accomplished with its help;

– in short, just as all electric machines do their work when electricity flows through them, in accordance with their particular attributes, and cease to work when electricity no longer courses through them, similarly the Atma activates the body and its three gunas. Just as the modifications and aberrations of machinery cannot be attributed to the electricity, so also the modifications of the body self cannot be attributed to the Atma Self.

Just as electricity has not created the objects that work by it, so also the Atma has not created the bodies nor their attributes. Just as man, knowing the efficacy of electricity, has invented the instruments that can be activated by it, so also the mortal being, through his attachment to the body and its attributes, has created the myriad bodies.

Thus man has used the energy of the Atma in the same way as he has taken advantage of the power of electricity. The Atma creates the world through the cycle of karma and with the help of Prakriti; however, those karmas or actions that bear fruit are the handiwork of the jivatma or the mortal being.

अध्याय १३

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।

सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते।।३२।। 

अब भगवान आत्मा की निर्लिप्तता की उपमा देकर समझाते हैं और कहते हैं:

शब्दार्थ :

१. जैसे सर्वत्र व्यापी आकाश सूक्ष्म होने के नाते लिप्त नहीं होता,

२. वैसे ही देह में सर्वस्थित आत्मा लिप्त नहीं होता !

तत्त्व विस्तार :

नन्हीं! ज्यों आकाश सर्व व्यापक होते हुए भी नित्य निर्लिप्त तथा निर्मल रहता है, ज्यों स्वप्न में दृष्टा पूर्ण रूप से एक होते हुए भी निर्लिप्त रहता है, वैसे ही आत्मा, जीव में पूर्ण रूप से स्थित होते हुए भी निर्लिप्त रहता है।

सूक्ष्म से अभिप्राय :

क) अव्यक्त से है,

ख) जो दिख नहीं सकता, उस तत्त्व से है,

ग) जिसका अनुभव भी नहीं होता, ऐसे तत्त्व से है।

आत्मा :

आत्मा न गुण बधित होता है, न विकार ग्रहण करता है, न कर्ता है, न भोक्ता है, फिर भी सब कुछ वह आप है।

नन्हूं!

1. ज्यों आकाश में बादल आते हैं और बरस जाते हैं,

2. ज्यों आकाश में माटी उठती है, अंधेरी आ जाती है,

3. ज्यों आकाश में सूर्योदय से रोशनी आ जाती है,

4. ज्यों आकाश में लालिमा छा जाती है, किन्तु आकाश लिप्त नहीं होता है, उसी प्रकार आत्मा में सम्पूर्ण सृष्टि छा जाती है, किन्तु आत्मा लिप्त नहीं होता। आत्मा में विकारों सहित मन, बुद्धि, तन, इत्यादि आते जाते रहते हैं, किन्तु आत्मा नित्य निर्लिप्त ही रहता है।

नन्हीं जान्! आत्मा हर देह में सामान्य रूप से सर्वत्र स्थित है। ध्यान रहे, आत्मा हर देह में है। इस नाते, सब ही आत्मा हैं। चाहे आप जितना भी चाहो, आत्मा तन से लिपायमान नहीं हो सकता। प्राकृतिक रचना तन और आत्मा विजातीय हैं, इस नाते इनका मिलन नहीं हो सकता। बुद्धि आत्मा से चेतनता पाकर, अपने आप को तन मान लेती है। असल में बुद्धि जड़ ही है और प्राकृतिक रचना है; इस कारण इसका अपने आपको तन मान लेना सहज ही है। यदि बुद्धि यह सोचे कि उसमें प्रकाश किससे आता है, तब शायद इसे उस आत्म सत्ता की कुछ कुछ समझ आने लगे। तब शायद उसे अपने स्वरूप की कुछ कुछ समझ आने लगे!

नन्हीं!

1. ज्यों बिजली से बत्ती जलती है और रोशनी होती है;

2. हीटर में बिजली आती है तो गर्मी होती है;

3. वातानुकूलित यन्त्र में बिजली जाती है तो सर्दी होती है;

4. बिजली से मशीनें भी चलती हैं,

5. बिजली से अनेकों ढंग के कार्य होते हैं।

जैसे बिजली की हर मशीन बिजली के आने से अपने अपने गुणों के अनुसार चलती है और बिजली के ख़त्म हो जाने पर बिजली से चलने वाली हर वस्तु अपने गुण त्याग देती है; वैसे ही आत्मा विभिन्न तनों में गुणों को मानो सप्राण कर देता है। ज्यों यन्त्र का गुण दोष बिजली का नहीं होता, वैसे ही तनो गुण दोष आत्मा के नहीं होते।

ज्यों बिजली ने बिजली के विषय नहीं बनाये, वैसे ही आत्मा ने तन या तनो गुण नहीं बनाये। बिजली को जानते हुए जिस प्रकार जीव ने बिजली के यंत्र बनाये हैं, इसी तरह जीवात्मा ने मानो गुणों तथा तन से संग करके लाखों तन घड़ दिये हैं।

आत्म तत्त्व की शक्ति का फ़ायदा जीव ने उसी तरह उठाया है, ज्यों बिजली की शक्ति का फ़ायदा जीव ने उठाया है। आत्मा कर्म चक्र की राह, प्रकृति के आसरे संसार रचता है; किन्तु कर्म, जो फल लाते हैं, वे जीवात्मा के हैं।

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