Chapter 13 Shloka 31

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय:।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।३१।।

O Arjuna! That Indivisible Supreme Atma,

without beginning and devoid of attributes,

is established in the bodies of all beings,

yet does nothing, and does not

get tainted by anything.

Chapter 13 Shloka 31

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय:।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।३१।।

Explaining the Atma Self further, the Lord proceeds:

O Arjuna! That Indivisible Supreme Atma, without beginning and devoid of attributes, is established in the bodies of all beings, yet does nothing, and does not get tainted by anything.

The Lord thus clarifies:

1. The Purusha is without beginning, timeless;

2. That Kshetragya, too, is devoid of origin;

3. The Atma is also without beginning.

That is, the Atma is beyond creation and destruction.

Nirguna (निर्गुण)

The Lord further specifies:

a) The Supreme Lord of all transcends the qualities of Prakriti.

b) The Supreme Atma is not bound by the qualities of Prakriti.

c) That Supreme Atma is uninfluenced by the qualities ofPrakriti.

d) That Supreme Atma is not the handiwork of these qualities of Prakriti.

The Supreme Atma is ever blemishless, devoid of form and detached. Thus the Atma is never born; the Atma is devoid of form; the Atma has no name; the Atma does naught. It is merely the qualities interacting amidst themselves that cause all deeds to be done. The cycle of karma is self-propelling. The entire creation is a handiwork of Prakriti. It is also sustained and nourished by Prakriti and then re-absorbed into Prakriti and its primordial elements. The ‘I’ fruitlessly becomes attached to all this.

Look Kamla! The Atma is devoid of attributes and the attributes are inert.

1. It is the ‘I’ which causes attachment and the resultant delusion.

2. It is the ‘I’ which becomes uselessly attached to the qualities and causes attachment to the body.

3. The attachment of ‘I’ with the body is the root of moha and ignorance.

The consequences of invoking the qualities of the Supreme

The invocation of the qualities of the Lord into one’s own being can banish ignorance and help the individual to transcend the body idea. When the Atmavaan, in identification with the Atma, renounces the body idea, his body continues to dispense all its duties; the only difference is that all the actions of such a one are devoid of doership, pride and the arrogance of the intellect which is subservient to the body. Since such an individual does not claim the body self, he cannot even claim the attributes of the body.

The qualities of Prakriti expand and grow within this body, mind and intellect unit. It is this unit which is affected by this natural growth and evolution. Further, the attributes of one’s body are influenced by the attributes of others. When the body ceases to belong to oneself, the play and interaction of the qualities and their influence both begin to wane and become meaningless.

All actions are performed through the means of the body; when the body is no longer ‘mine’ then one is no longer the doer of the actions performed by the body.

Little one, the Atma which abides in the body is a mere witness. It perceives all, yet remains uninfluenced. The mind and intellect of the Atmavaan are completely quiescent. His body performs all actions as that of ordinary mortals, yet despite doing all this, such a one is innately devoid of attributes.

Little one, only the foolish consider themselves to be the doers. In fact they are not the doers. However, even though such people do not know themselves to be the Atma, the truth is that they are. Those who are attached to their attributes are welcome to their conceptions. In actual fact, there is no room for attachment in the Lord’s plan.

Little one, in reality even the belief ‘I believe’ or ‘I do not believe’ is not in your hands. So learn how to smile no matter what is said to you or done to you by the other. Neither are you anybody’s master, nor keeper. Continue to dispense your duty and keep smiling.

अध्याय १३

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्यय:।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते।।३१।।

भगवान अब आत्म तत्त्व के विषय में कहते हुए कहने लगे कि :

शब्दार्थ :

१. अर्जुन! अनादि और निर्गुण होने से,

२. यह अव्यय परमात्मा शरीरों में स्थित हुआ भी,

३. न कुछ करता है,

४. (और) न लिपायमान होता है।

तत्त्व विस्तार :

यहाँ भगवान कह रहे हैं कि :

1. पुरुष तत्त्व अनादि है,

2. क्षेत्रज्ञ तत्त्व अनादि है,

3. आत्मा अनादि है,

यानि उत्पत्ति और लय से रहित है।

निर्गुण :

फिर भगवान कहते हैं कि :

क) परमात्मा प्रकृति के गुणों से सर्वथा अतीत हैं।

ख) परमात्मा प्रकृति के गुणों से बधित नहीं होता।

ग) परमात्मा प्रकृति के गुणों से प्रभावित नहीं होता।

घ) परमात्मा प्रकृति के गुणों का कार्य नहीं है।

परमात्मा तो नित्य निर्विकार हैं, परमात्मा तो नित्य निराकार हैं, परमात्मा तो नित्य उदासीन हैं। इस नाते, आत्मा का कभी जन्म नहीं होता, आत्मा का कोई रूप नहीं होता, आत्मा का कोई नाम नहीं होता, आत्म तत्त्व कुछ नहीं करता, सब गुण गुणों में वर्त रहे हैं। सब स्वत: हो रहा है।

वास्तव में कर्म चक्र भी स्वत: चलता है। सम्पूर्ण सृष्टि को प्रकृति ही रचती है और पालती है। सम्पूर्ण सृष्टि को प्रकृति ही अपने में लय कर लेती है। ‘मैं’ इनसे नाहक ही संग करती है।

देख कमला! आत्मा निर्गुण है और गुण जड़ कहे हैं।

– यह ‘मैं’ ही संग करके हमें राहों में भरमा देती है।

– यह ‘मैं’ ही नाहक गुणों से और तन से संग कर बैठा है।

-‘मैं’ का तन से संग ही मोह और अज्ञान का कारण है।

परम गुण आवाहन का परिणाम :

परम गुण आवाहन ही अज्ञान को दूर कर सकता है और जीव को तनत्व भाव से ऊपर उठा सकता है। आत्मवान्, आत्मा के तद्‍रूप होकर जब तनत्व भाव को ही त्याग देता है, तब तन तो सब कुछ करता रहता है, किन्तु कर्तापन गुमान और देहात्म बुद्धि का अभाव होने के कारण वहाँ कर्तृत्व भाव का जन्म ही नहीं होता। तब जीव, क्योंकि तन को ही नहीं अपनाता, वह तन के गुणों को भी नहीं अपना सकता।

प्रकृति गुण विस्तार तो इस तन, मन, बुद्धि इत्यादि में ही होता है। प्राकृतिक उत्पत्ति भी तन, मन, बुद्धि, इत्यादि में होती है और इनको ही प्रभावित कर सकती है। फिर, अपने तन के गुण औरों के गुणों से प्रभावित होते हैं। जब तन ही अपना नहीं रहा, तो गुण खिलवाड़ तथा गुण प्रभाव, दोनो ही निरर्थक हो जाते हैं।

कर्म भी तन के राही ही होते हैं; जब तन ही आपका नहीं रहा तो तन के कर्मों के कर्ता भी आप नहीं रहते।

नन्हीं! शरीर में स्थित हुआ आत्मा केवल दृष्टामात्र होता है। वह सब कुछ देखता है किन्तु नित्य अप्रभावित रहता है। वास्तव में उसके मन और बुद्धि नितान्त शान्त होते हैं, बाक़ी उसका तन साधारण जीवों की तरह सब कुछ करता रहता है। यह सब करते हुए भी वह निर्गुण ही है।

नन्हीं! जो अपने को कर्ता मानते हैं, वे केवल मूर्ख हैं, वास्तव में कर्ता वह नहीं हैं। जो अपने आपको आत्मा नहीं भी मानते, फिर भी सत्य तो यह है कि आत्मा वह हैं! जो अपने गुणों से संग करते हैं, यह उनकी मर्जी है, वास्तव में संग की कोई जगह तो है नहीं।

नन्हीं! वास्तव में ‘मैं मानता हूँ’ या ‘मैं नहीं मानता’ यह भी आपके बस में नहीं है। सो, जो कुछ भी कोई कहे या करे, तुम मुसकरा दो। न तुम किसी के आचार्य हो, न तुम किसी के ठेकेदार हो। अपना कर्त्तव्य करते जाओ और मुसकराते जाओ।

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