Chapter 13 Shloka 30

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा।।३०।।

When the individual perceives

the manifold existence of all beings

 as established in That One, and sees

this entirety as emanating from That One,

then he verily becomes one with Brahm.

Chapter 13 Shloka 30

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा।।३०।।

Now the Lord relates the consequence of perceiving all beings as the One Atma.

When the individual perceives the manifold existence of all beings as established in That One, and sees this entirety as emanating from That One, then he verily becomes one with Brahm.

Dear little one, the Lord says that when the individual:

a) perceives unity in diversity;

b) sees That One form pervading all forms;

c) witnesses indivisible unity in apparent diversity;

d) sees Vaishvanar in the entire creation;

e) witnesses the Atma Essence in the entire creation;

f) then he verily sees the Truth.

­­–  He also then sees this entirety emanating from That One;

­­–  He sees That One in diverse forms;

­­–  He sees That Integral Essence of Truth in the varied forms of the universe;

­­–  He witnesses the One Omkaar in divided constituents;

­­–  He sees That Unmanifest One in all manifest forms.

1. He thus gets established in the Truth.

2. He becomes a knower of the Truth and indeed an embodiment of It.

3. He becomes an Atmavaan and a manifestation of Brahm Himself.

4. He renounces the intellect which was subservient to the body and merges with the Supreme.

5. He is replete with the attributes of the Supreme.

That is, becoming one with the Atma, he becomes an Atmavaan. Alternatively it could be said that he renounces illusion and is absorbed into the Indivisible Truth. First erasing ignorance with knowledge, he then transcends even knowledge.

a) After acquiring all the divine qualities, when he relinquishes attachment even to divinity,

b) Having attained complete knowledge, when he renounces attachment with that knowledge,

c) Having gained establishment in the attribute of Sattva, when he renounces attachment even with that attribute,

then that one:

­­–  transcends both sat and asat – truth and falsehood;

­­–  transcends the body idea;

­­–  transcends the intellect which pertained to the body self.

Little one, at that moment, having renounced the body idea, such a one, knowing himself to be the Atma, realises that all others too are naught but the Atma. He perceives the seemingly divided Atma Essence in all.

It is not easy to understand this: how does the Atmavaan consider others to be the Atma also – when they are fettered by and manifest varied attributes?

Little one, he who knows himself to be the Atma, witnesses only the Atma as omnipresent. He perceives all as akin to himself. He also knows that all qualities being essentially inert, are non-doers; the Atma too is essentially a non-doer. Thus it is the idea of doership which is the real doer. This illusory world is the creation of ‘I’, the mind the intellect and the ego. It is merely one’s internal aberration.

Little one, the qualities will inevitably do what they are designed to do:

1. Qualities will continue to be influenced by other qualities.

2. Qualities will inevitably attract some and repel other qualities.

3. Qualities will be influenced by other qualities and thus keep changing.

However, all this happens spontaneously. And all this transpires within the authority of That Supreme Atma. He who knows this, only he truly knows. He who is ignorant of this truth, knows naught. The knower of this truth attains Brahm.

Little one, all are one in the Atma Self. All are equal in the Atma. All differences lie latent in the qualities. He who perceives all as the Atma, verily attains Brahm.

अध्याय १३

यदा भूतपृथग्भावमेकस्थमनुपश्यति।

तत एव च विस्तारं ब्रह्म संपद्यते तदा।।३०।।

अब भगवान सम्पूर्ण भूतों को एक ही आत्मा समझने का फल बताते हुए कहने लगे :

शब्दार्थ :

१. जब जीव, भूतों के पृथक् पृथक् भाव को एक में स्थित देखता है

२. और उस एक से ही पूर्ण विस्तार देखता है,

३. तब वह ब्रह्म रूप ही होता है।

तत्त्व विस्तार :

नन्हीं प्रिया !

भगवान कहते हैं कि जब जीव,

क) अनेकता में एकता देखता है,

ख) अखिल रूप में एक रूप देखता है,

ग) विभाजन में अखण्डता देखता है,

घ) विश्व रूप देख कर वैश्वानर देखता है,

ङ) सम्पूर्ण सृष्टि में आत्म तत्त्व देखता है, तब वह सत्य को देखता है और उस अखण्ड का विभाजन देखता है।

– उस एक को अनेक देखता है।

– एक सत् स्वरूप को अखिल रूप देखता है।

– अव्यय आत्म तत्त्व को विभिन्न रूप में देखता है।

– एक ओंकार के विभाजित अंग देखता है।

– निराकार को अखिल रूप देखता है।

नन्हूं! तब वह तत्त्व निष्ठ,

1. तत्त्व स्थित होता है,

2. तत्त्व वित् तथा तत्त्व स्वरूप होता है,

3. आत्मवान् ब्रह्म रूप होता है,

4. देहात्म बुद्धि त्याग कर परम में लीन हुआ होता है,

5. परम गुण सम्पन्न भी होता है।

यानि, आत्मा में आत्मा हुआ वह आत्मवान् बन जाता है। या यूँ कहो कि वह मिथ्यात्व का त्याग करके अखण्ड सत्त्व तत्त्व में विलीन हो जाता है। वह ज्ञान के आसरे अज्ञान को मिटा कर फिर ज्ञान से भी परे हो जाता है।

क) जब वह देवत्व गुण सम्पन्न होने के पश्चात् देवत्व से भी संग छोड़ देता है,

ख) जब वह पूर्ण ज्ञान पा लेने के पश्चात् ज्ञान से भी संग छोड़ देता है,

ग) जब वह सतोगुण में स्थित होने के पश्चात् सतोगुण से भी संग छोड़ देता है,

घ) जब वह अपने तन राही हुए श्रेष्ठ कर्मों से भी संग छोड़ देता है,

तब वह,

– सत् असत् से परे हो जाता है।

– तनत्व भाव से परे हो जाता है।

– देहात्म बुद्धि से परे हो जाता है।

नन्हीं! तब ही वह तनत्व भाव को छोड़ कर अपने आप को आत्मा जानता हुआ औरों को भी आत्मा ही जानता है। फिर वह सबमें विभाजित हुआ सा आत्म तत्त्व ही देखता है।

यह समझना ज़रा कठिन है कि आत्मवान् बाकियों को आत्मा कैसे समझ सकता है, क्योंकि बाकी लोग तो विभिन्न गुण ग्रसित होते हैं और विभिन्न प्रकार के गुण प्रमाण होते हैं।

नन्हूं! जो अपने को आत्मा मानता है, वह आत्मा को ही सर्वस्थित देखता है। जो वह आप है, वही वह दूसरों को जानता है। फिर वह जानता है कि गुण जड़ होने के नाते अकर्ता ही हैं, आत्मा नित्य अकर्ता ही है तो कर्तृत्व भाव ही मानो कर्ता है। यह मिथ्या लोक केवल ‘मैं’, ‘मन’, ‘बुद्धि’ और ‘अहंकार’ ही है। यह केवल अपने आन्तरिक विकार ही हैं।

नन्हूं! गुण तो वह करेंगे ही जो उन्हें करना है।

1. गुण गुणों से प्रभावित होते रहेंगे,

2. गुण गुणों से आकर्षित या प्रतिकर्षित होते ही रहेंगे,

3. फिर गुण गुणों से प्रभावित होकर बदलते ही रहेंगे।

किन्तु यह सब स्वत: होता है और यह सब उस परमात्मा की सत्ता में ही है। जो यह जानता है, बस वह ही यथार्थ जानता है, जो यह नहीं जानता वह कुछ नहीं जानता। जो यह जानता है वह ब्रह्म को प्राप्त होता है।

नन्हीं! आत्मा के नाते सब एक ही हैं, आत्मा के नाते सब सम ही हैं। भेद केवल गुणों का है। जो आत्मा के नाते सबके प्रति आत्मा रूपा दृष्टि रखता है, वह ब्रह्म को ही प्राप्त होता है।

यही यहां भगवान ने कहा है।

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